🌿आत्म परिवर्तन के लिए चाहिए मौन और प्रेम🌿
जो चुप नहीं हो सकता वह जीवन को कभी भी नहीं बदल सकता है। गहरी चुप्पी में ही, गहरे मौन में ही, गहरे साइलेंस में ही मनुष्य के भीतर क्रांति की, आत्म-परिवर्तन की क्षमता के दर्शन होते हैं। इतनी विराट शक्ति का अनुभव होता है कि कुछ भी बदला जा सकता है। इतनी बड़ी आग उपलब्ध हो जाती है कि कचरे को जलाया जा सकता है। उसके पहले तो जिंदगी में कोई क्रांति, कोई ट्रांसफार्मेशन नहीं हो सकता है।
इसलिए पहला ध्यान इस तरफ दें। चैबीस घंटे दौड़ते हैं, आधा घंटा न दौड़ें। चैबीस घंटे मन को काम में रखते हैं, आधा घंटा बेकाम छोड़ दें। चैबीस घंटे उलझे हुए हैं, आधा घंटे केवल साक्षी रह जाएं। यह तो पहला सूत्र है। और आज तक जगत में जिन लोगों ने भी कुछ जाना है, इस सूत्र के बिना नहीं जाना है। जो भी सत्य, जो भी सौंदर्य, जो भी श्रेष्ठ अनुभूतियां उपलब्ध हुई हैं, वे मौन में, एकांत में, शांति में, ध्यान में उपलब्ध हुई हैं। तो जिसकी भी आकांक्षा है, जिसके प्राणों में भी प्यास है उसे मौन की दिशा में कदम रखने होंगे। यह पहला सूत्र है।
दूसरा सूत्र भी इतना ही महत्वपूर्ण, इतना ही गहरा और इतना ही जरूरी है। मन के तल पर चाहिए मौन, हृदय के तल पर चाहिए प्रेम। मन तो हो जाए चुप, शून्य और हृदय भर जाए प्रेम से, हो जाए पूर्ण। लेकिन हम प्रेम को भी जीवन में जीते नहीं। प्रेम भी हमारे जीवन में छिपा ही पड़ा रह जाता है, उसे हम कभी विकसित नहीं करते। प्रेम के बीज भी हमारे जीवन में कभी वृक्ष नहीं बन पाते। पता नहीं किस कारण इतनी बड़ी सम्पत्ति को पाकर भी हम दरिद्र रह जाते हैं?
एक ही डर काम करता है जिससे जीवन में प्रेम विकसित नहीं हो पाता, एक ही भूल काम करती है। वह भूल मैं आपको कहूं, तो शायद प्रेम के द्वार खुल सकते हैं। और वह भूल यह हैः उस आदमी के जीवन में प्रेम कभी विकसित न होगा जो हमेशा दूसरों से प्रेम मांगता रहेगा।
ओशो,
आज इतना ही।
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