Friday, 25 September 2020

अहंकार - आत्मबोध का अभाव


4) भाग- 23  आओ तांत्रिक बनें 

सूत्र:
"किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो;
दूसरे विषय पर मत जाओ।
यहीं विष्‍यय के मध्‍य में—आनंद ।"

किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो…।’

प्रेमपूर्वक में कुंजी है। 
क्या तुमने कभी किसी चीज को प्रेमपूर्वक देखा है ???
तुम नही कह सकते हो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि किसी चीज को प्रेमपूर्वक देखने का क्या अर्थ होता है ???
तुमने किसी चीज को लालसा भरी आंखों से देखा होगा, कामनापूर्वक देखा होगा। वह दूसरी बात है। वह बिलकुल भिन्न, विपरीत बात है।

तुम एक सुंदर चेहरे को, सुंदर शरीर को देखते हो और तुम सोचते हो कि तुम उसे प्रेमपूर्वक देख रहे हो। लेकिन तुम उसे क्यों देख रहे हो ??? 
क्या तुम उससे कुछ पाना चाहते हो ??? 
तब वह वासना है, कामना है, प्रेम नहीं। क्या तुम उसका शोषण करना चाहते हो ??? 
तब वह वासना है, प्रेम नहीं। तब तुम सच में यह चाहते हो कि मैं कैसे इस शरीर को उपयोग में लाऊं, कैसे इसका मालिक बनूं कैसे इसे अपने सुख का साधन बना लूं।

वासना का अर्थ है कि कैसे किसी चीज को अपने सुख के लिए उपयोग में लाऊं। प्रेम का अर्थ है कि उससे मेरे सुख का कुछ लेना देना नहीं है। 

सच तो यह है कि वासना कुछ लेना चाहती है और प्रेम कुछ देना चाहता है। 
वे दोनों सर्वथा एक दूसरे के प्रतिकूल हैं।

वासना में तुम दूसरे को अपना साधन बनाने की सोचते हो, और प्रेम में तुम स्वय साधन बनने की सोचते हो। 
वासना में तुम दूसरे को पोंछ देना चाहते हो; प्रेम में तुम स्वय मिट जाना चाहते हो। 
प्रेम का अर्थ है देना, 
वासना का अर्थ है लेना। 
प्रेम समर्पण है;
वासना आक्रमण है।

इसका उलटा भी सही है। 
जब तुम किसी व्यक्ति को वासनापूर्वक देखते हो तो वह व्यक्ति वस्तु बन जाता है। यही कारण है कि वासना भरी आंखों में विकर्षण होता है, क्योंकि कोई भी वस्तु होना नहीं चाहता है। जब तुम अपनी पत्नी को, या किसी दूसरी स्त्री को, या पुरुष को, वासना की दृष्टि से देखते हो, तो उससे दूसरे को चोट पहुंचती है। तुम असल में क्या कर रहे हो ??? 
तुम एक जीवित व्यक्ति को मृत साधन में, यंत्र में बदल रहे हो। ज्यों ही तुमने सोचा कि कैसे उसका उपयोग करें कि तुमने उसकी हत्या कर दी।

प्रेम किसी को भी अनूठा बना देता है। यही कारण है कि प्रेम के बिना तुम नहीं महसूस करते कि मैं व्यक्ति हूं। जब तक कोई तुम्हें गहन प्रेम न करे, तुम्हें तुम्हारे अनूठेपन का एहसास ही नहीं होता। तब तक तुम भीड़ के हिस्से हो—एक नंबर, एक संख्या। और तुम बदले जा सकते हो।

उदाहरण के लिए, अगर तुम किसी दफ्तर में क्‍लर्क हो या स्‍कूल में शिक्षक हो या विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो, तो तुम्हारी प्रोफेसरी बदली जा सकती है; दूसरा प्रोफेसर तुम्हारी जगह ले लेगा। वह कभी भी तुम्हारी जगह ले सकता है, क्योंकि वहां तुम प्रोफेसर के रूप में काम आते हो। वहां तुम्हारे काम से मतलब है। वैसे ही अगर तुम क्लर्क हो तो कोई भी तुम्हारा काम कर दे सकता है। काम तुम्हारा इंतजार नहीं करेगा। अगर तुम इस क्षण मर जाओ तो अगले क्षण कोई तुम्हारी जगह ले लेगा, और काम चलता रहेगा। तुम एक संख्या थे, दूसरी संख्या से चल जाएगा। तुम एक उपयोग भर थे।

लेकिन फिर कोई इसी क्लर्क या प्रोफेसर के साथ प्रेम में पड़ जाता है। अचानक वह क्लर्क क्लर्क नहीं रह जाता, वह एक अनूठा व्यक्ति हो उठता है। अगर वह मर जाए तो उसकी प्रेमिका उसकी जगह किसी को भी नहीं बिठा सकती। उसे बदला नहीं जा सकता है। तब सारी दुनिया वैसी की वैसी रह सकती है, लेकिन वह व्यक्ति जो इसके प्रेम में था वही नहीं रहेगा। यह अनूठापन, यह व्यक्ति होना प्रेम के द्वारा घटित होता है।

यह सूत्र कहता है. ‘किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो……।

जब तुम प्रेमपूर्वक देखते हो तो कोई भी चीज व्यक्ति हो उठती है। यह देखना ही बदलता है, रूपांतरित करता है।

प्रेम से जब देखते हो तो क्या करना होता है ??? 

पहली बात : अपने को भूल जाओ। अपने को बिलकुल भूल जाओ। एक फूल को देखो और अपने को बिलकुल भूल जाओ। फूल तो हो, लेकिन तुम अनुपस्थित हो जाओ। फूल को अनुभव करो और तुम्हारी चेतना से गहरा प्रेम फूल की ओर प्रवाहित होगा। और तब अपनी चेतना को एक ही विचार से भर जाने दो कि कैसे मैं इस फूल के ज्यादा खिलने में, ज्यादा सुंदर होने में, ज्यादा आनंदित होने में सहयोगी हो सकता हूं। मैं क्या कर सकता हूं ???

इस विचार को अपने पूरे प्राणों में गूंजने दो। अपने शरीर और मन के प्रत्येक तंतु को इस विचार से भीगने दो। तब तुम समाधिस्थ हो जाओगे और फूल एक व्यक्ति बन जाएगा।

‘दूसरे विषय पर मत जाओ।’

तुम जा नहीं सकते। अगर तुम प्रेम में हो तो नहीं जा सकते। अगर तुम इस समूह में बैठे किसी व्यक्ति को प्रेम करते हो तो तुम्हारे लिए सब भीड़ भूल जाती है और केवल वही चेहरा बचता है। 

जब ऐसी स्थिति बन जाए कि तुम अनुपस्थित हो, अपनी फिक्र नहीं करते, अपने सुख—संतोष की चिंता नहीं लेते, अपने को पूरी तरह भूल गए हो, जब तुम सिर्फ दूसरे के लिए चिंता करते हो, दूसरा तुम्हारे प्रेम का केंद्र बन गया है, तुम्हारी चेतना दूसरे में प्रवाहित हो रही है, जब गहन करुणा और प्रेम के भाव से तुम सोचते हो कि मैं अपनी प्रेमिका को आनंदित करने के लिए क्या कर सकता हूं तब इस स्थिति में अचानक, ‘यहीं विषय के मध्य में—आनंद’, अचानक उप—उत्पत्ति की तरह तुम्हें आनंद उपलब्ध हो जाता है। तब अचानक तुम केंद्रित हो गए।

यह बात विरोधाभासी लगती है। क्योंकि सूत्र कहता है कि अपने को बिलकुल भूल जाओ, आत्म—केंद्रित मत बनो, दूसरे में पूरी तरह प्रवेश करो।

बुद्ध निरंतर कहते थे कि जब भी तुम प्रार्थना करो तो दूसरों के लिए करो—अपने लिए नहीं। अन्यथा प्रार्थना व्यर्थ है।

स्मरण रहे, प्रेमपात्र के साथ व्यक्ति बिलकुल असहाय हो जाता है। जब भी तुम किसी को प्रेम करते हो, तुम असहाय हो जाते हो। यही प्रेम की पीड़ा है कि तुम्हें पता ही नहीं चलता कि मैं क्या कर सकता हूं। तुम सब कुछ करना चाहोगे, तुम अपने प्रेमी या प्रेमिका को सारा ब्रह्मांड दे देना चाहोगे। 
लेकिन तुम कर क्या सकते हो ??? 
अगर तुम सोचते हो कि यह या वह कर सकते हो तो तुम अभी प्रेम में नहीं हो। प्रेम बहुत असहाय है, बिलकुल असहाय है। और वह असहायपन सुंदर है, क्योंकि उसी असहायपन में तुम समर्पित हो जाते हो।

यही कारण है कि प्रेम गहन ध्यान बन जाता है। अगर सच में तुम किसी को प्रेम करते हो तो किसी अन्य ध्यान की जरूरत न रही। लेकिन क्योंकि कोई भी प्रेम नहीं करता है, इसलिए एक सौ बारह विधियों की जरूरत पड़ी। और वे भी काफी नहीं हैं।

ओशो
तंत्र-सूत्र-(प्रवचन-13)

3)🌸 🌼 🌸

🌹 *Osho*  🌹


*अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--12) पार्ट चौथा*




जापान अकेला राष्ट्र है, जिसने कानून बनाया है कि प्रसव—पीड़ा को रोकने के लिए कोई दवा ईजाद नहीं की जा सकती। बड़ी समझदारी की बात है। सिर्फ अकेला राष्ट्र है सारी दुनिया में। क्योंकि प्रसव—पीड़ा बच्चे के जीवन की शुरुआत है। मां को ही पीड़ा होती है, ऐसा नहीं है, बच्चे को भी पीड़ा होती है। लेकिन उस पीड़ा से ही कुछ निर्मित होता है।
मैंने सुना है, एक किसान परमात्मा से बहुत परेशान हो गया। कभी ज्यादा वर्षा हो जाए कभी ओले गिर जाएं, कभी पाला पड़ जाए कभी वर्षा न हो, कभी धूप हो जाए फसलें खराब होती चली जाएं, कभी बाढ़ आ जाए और कभी सूखा पड़ जाए। आखिर उसने कहा कि सुनो जी, तुम्हें कुछ किसानी की अक्ल नहीं, हमसे पूछो! परमात्मा कुछ मौज में रहा होगा उस दिन। उसने कहा, अच्छा, तुम्हारा क्या खयाल है? उसने कहा कि एक साल मुझे मौका दो, जैसा मैं चाहूं वैसा मौसम हो। देखो, कैसा दुनिया को सुख से भर दूं धन—धान्य से भर दूं!
परमात्मा ने कहा, ठीक है, एक साल तेरी मर्जी होगी, मैं दूर रहूंगा। स्वभावत: किसान को जानकारी थी। काश, जानकारी ही सब कुछ होती! किसान ने जब धूप चाही तब धूप मिली, जब जल चाहा तब जल मिला, बूंद भर कम—ज्यादा नहीं, जितना चाहा उतना मिला। कभी धूप, कभी छाया, कभी जल—ऐसा किसान मांगता रहा और बड़ा प्रसन्न होता रहा; क्योंकि गेहूं की बालें आदमी के ऊपर उठने लगीं। ऐसी तो फसल कभी न हुई थी। कहने लगा, अब पता चलेगा परमात्मा को! न मालूम कितने जमाने से आदमियों को नाहक परेशान करते रहे। किसी भी किसान से पूछ लेते, हल हो जाता मामला। अब पता चलेगा।
गेहूं की बालें ऐसी हो गईं, जैसे बड़े—बड़े वृक्ष हों। खूब गेहूं लगे। किसान बड़ा प्रसन्न था। लेकिन जब फसल काटी, तो छाती पर हाथ रख कर बैठ गया। गेहूं भीतर थे ही नहीं, बालें ही बालें थीं। भीतर सब खाली था। वह तो चिल्लाया कि हे परमात्मा, यह क्या हुआ? परमात्मा ने कहा, अब तू ही सोच। क्योंकि संघर्ष का तो तूने कोई मौका ही न दिया। ओले तूने कभी मांगे ही नहीं। तूफान कभी तुमने उठने न दिया। आधी कभी तूने चाही नहीं। तो आधी, अंधड़, तूफान, गड़गड़ाहट बादलों की, बिजलियों की चमचमाहट. तो इनके प्राण संगृहीत न हो सके। ये बड़े तो हो गए लेकिन पोचे हैं।
संघर्ष आदमी को केंद्र देता है। नहीं तो आदमी पोचा रह जाता है। इसलिए तो धनपतियों के बेटे पोचे मालूम होते हैं। जब धूप चाही धूप मिल गई, जब पानी चाहा पानी; न कोई अंधड़, न कोई तूफान। तुम धनपतियों के घर में कभी बहुत प्रतिभाशाली लोगों को पैदा होते न देखोगे—पोचे! गेहूं की बाल ही बाल होती है, गेहूं भीतर होता नहीं। थोड़ा संघर्ष चाहिए। थोड़ी चुनौती चाहिए।
जब तूफान हिलाते हैं और वृक्ष अपने बल से खड़ा रहता है, बड़े तूफानों को हरा कर खड़ा रहता है, आंधिया आती हैं, गिराती हैं और फिर गेहूं की बाल फिर—फिर खड़ी हो जाती है तो बल पैदा होता संघर्षण से ऊर्जा निर्मित होती है। अगर संघर्षण बिलकुल न हो, तो ऊर्जा सुप्त की सुप्त रह जाती
प्रसव—पीड़ा मां के लिए ही पीड़ा नहीं है, बेटे के लिए भी पीड़ा है। लेकिन पीड़ा से जीवन की शुरुआत है—और शुभ है। नहीं तो पोचा रह जाएगा बच्चा। उसमें बल न होगा। और अगर बिना पीड़ा के बच्चा हो जाएगा, तो मां के भीतर जो बच्चे के लिए प्रेम पैदा होना चाहिए, वह भी पैदा न होगा। क्योंकि जब हम किसी चीज को बहुत पीड़ा से पाते हैं, तो उसमें हमारा एक राग बनता है। तुम सोचो, हिलेरी जब चढ़ कर पहुंचा हिमालय पर तो उसे जो मजा आया, वह तुम हेलिकॉप्टर से जा कर उतर जाओ, तो थोड़े ही आएगा। उसमें सार ही क्या है? हेलिकॉप्टर भी उतार दे सकता है, क्या अड़चन है? मगर तब, तब बात खो गई। तुमने श्रम न किया, तुमने पीड़ा न उठाई, तो तुम पुरस्कार कैसे पाओगे?
यही गणित बहुत—से लोगों के जीवन को खराब किए है। मंजिल से भी ज्यादा मूल्यवान मार्ग है। अगर तुम मंजिल पर तत्क्षण पहुंचा दिए जाओ तो आनंद न घटेगा। वह मार्ग का संघर्षण, वे मार्ग की पीड़ाएं, वे इतंजारी के दिन, वे प्रतीक्षा की रातें, वे आंसू वह सब सम्मिलित है—तब कहीं अंततः आनंद घटता है
      हर एक दर्द को, नए अर्थ तक जाने दो!
तो विष्णु चैतन्य! दर्द है, मुझे पता है। आने में भी तुम मेरे पास डरते हो, वह भी मुझे पता है। घबड़ाओ मत, आओ! अपने को बाहर छोड़ कर आओ। बैठो मेरे पास एक शून्य, कोरी किताब की तरह, ताकि मैं कुछ लिख सकूं तुम पर। लिखे—लिखाए मत आओ, गुदे—गुदाए मत आओ; अन्यथा मैं क्या लिखूंगा? तुम मुझे लिखने का थोड़ा मौका दो। खाली आओ ताकि मैं तुममें उंडेलूं अपने को और भर दूं तुम्हें। शास्त्रों से भरे मत आओ। शास्त्र तो मैं तुम्हारे भीतर पैदा करने को तैयार हूं। तुम्हें शास्त्र ले कर आने की जरूरत नहीं। तुम सिद्धातों और तर्कों के जाल में मत पड़ो।
तुम आओ चुप, तुम आओ हृदयपूर्वक, भाव से भरे। मुझे एक मौका दो, ताकि तुम्हें निखारूं, तुम्हारी प्रतिमा गढूं।



(क्रमशः)

*अष्ठावक्र महागीता*


ओशो

*સૌજન્ય - https://oshoganga.blogspot.co*

2) 😌  _*"ध्यान" क्या हैं ?*_    

 *ध्यान है...खेलपूर्ण होना।*
   ध्यान है... सृजनात्मक होना।

 *ध्यान है...सजग होना।*
   ध्यान है.. तुम्हारा स्वभाव।

 *ध्यान है... कुछ ना करना।*
    ध्यान है... साक्षी भाव। 

 *ध्यान है... एक छलांग।*
   ध्यान है... वैग्यानिकता।

 *ध्यान है... एक प्रयोग।*
   ध्यान है... मौन।

 *ध्यान है... स्वर्ग।*
    ध्यान है... स्मरण। 
 
 *ध्यान है... परम स्वतंत्रता।*
   ध्यान है... संवेदनशीलता।

 *ध्यान है... विकसित होना।*
   ध्यान है... पलायनवादी न होना।

 *ध्यान है... एक स्वाभाविक या*
 *निर्दोष विधि (नैक)।*
   ध्यान है... पारदर्शिता।

 *ध्यान है... खाली होना।*
   ध्यान है... जानना।

 *ध्यान है... निर्मल होना।*
  ध्यान है... फूल की खिलावट।

 *ध्यान है... होशपूर्ण होना।* 
  ध्यान है... मजाक व एक हास-
  परिहास।

 *ध्यान है... गहरी समझ।*
  ध्यान है... आनंद को बांटना।

 *ध्यान है... तनावरहित या*
 *विश्रामपूर्ण होना।* 
    ध्यान है... उत्तेजनारहित होना।

 *ध्यान है... एकात्म होना।*
   ध्यान है... पुनर्सृजन ।

 *ध्यान है... विश्रामपूर्ण होना।*
   ध्यान है... मालिक बनना।

 *ध्यान है... अंतराल में बने रहना।*                 
    ध्यान है ...वर्तमान में रहना।

 *ध्यान है... एक घटना।*
  ध्यान है... एक रुपान्तरण।

 *ध्यान है... घर वापस लौटना।*
  ध्यान है... आनंदपूर्ण होना।

 *ध्यान है....होश आना।* 
  ध्यान है .... स्व मै स्थापित होना।

 *ध्यान है..... जन्म मरण से मुक्त*
 *होना।*
  ध्यान है.... बस होना।
 
🌹 _*ओशो*_  🌹

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1) 🍂🍃अहंकार आत्‍मबोध का आभाव है🍃🍂

अहंकार आत्म स्मरण का आभाव है। अहंकार अपने को न जानने का दूसरा नाम है। इसलिए अहंकार से मत लड़ों। अहंकार और अंधकार पर्यायवाची है। हां, अपनी ज्‍योति को जला लो। ध्‍यान का दीया बन जाओ। भीतर एक जागरण को उठा लो। भीतर सोए-सोए न रहो। भीतर होश को उठा लो। और जैसे ही होश आया, चकित होओगे, हंसोगे—अपने पर हंसोगे। हैरान होओगे। एक क्षण को तो भरोसा भी न आएगा कि जैसे ही भीतर होश आया वैसे ही अहंकार नहीं पाया जाता है। न तो मिटाया,न मिटा,पाया ही नहीं जाता है।

 

इसलिए मैं तुम्‍हें न तो सरल ढंग बता सकता हूं। न कठिन; न तो आसान रास्‍ता बता सकता हूं, न खतरनाक; न तो धीमा, न तेज। मैं तो सिर्फ इतना ही कह सकता हूं: जागों और जागने को ही मैं ध्‍यान कहता हूं।

आदमी दो ढंग से जी सकता है। एक मूर्च्‍छित ढंग है, जैसा हम सब जीते है। चले जाते है। यंत्रवत,किए जाते है काम यंत्रवत, मशीन की भांति। थोड़ी सी परत हमारे भीतर जागी है। अधिकांश हमारा अस्‍तित्‍व सोया पडा है। और वह जो थोड़ी सी परत जागी। वह भी न मालूम कितनी धूल ध्वांस, कितने विचारों, कितनी कल्पनाओं, कितने सपनों में दबी है।

सबसे पहला काम है; वह जो थोड़ा सी हमारे भीतर जागरण की रेखा है। उसे सपनों से मुक्‍त करो, उसे विचारों से शून्‍य करो। उसे साफ करो, निखारों,धोआ,पखारो। और जैसे ही वह शुद्ध होगी वैसे ही तुम्‍हारे हाथ में कीमिया लग जाएगी। राज लग जाएगा। कुंजी मिल जाएगी। फिर जो तुमने उसे थोड़ी सी पर्त के साथ किया है। वहीं तुम्‍हें उसके नीचे की पर्त के साथ करना है। फिर से नीचे की पर्त, फिर और नीचे की पर्त....। धीरे-धीरे तुम्‍हारा अंत जगत पूरा का पूरा आलोक से, आभा से मंडित हो जाएगा। एक ऐसी घड़ी आती है। जब भीतर अलोक होता है। और जहां आलोक हुआ भीतर। अंधकार नहीं पाया जाता है। अंधकार नहीं अंहकार नहीं।

🍂🍃आपुई गई हिराय🍃🍂

🍂🍃ओशो🍃🍂

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