Monday, 2 November 2026

प्रश्न: जप श्रेष्ठ है या ध्यान?

प्रश्न: जप श्रेष्ठ है या ध्यान?

उत्तर:

देखिए, यह प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है और अक्सर साधकों के मन में उठता है। इसका सीधा सा उत्तर यह है कि न तो जप बड़ा है और न ही ध्यान। दोनों एक ही सीढ़ी के दो अलग-अलग पड़ाव हैं। जप वह प्रारंभिक सोपान है जहाँ से यात्रा शुरू होती है, और ध्यान वह अंतिम अवस्था है जहाँ पहुँचकर साधक अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।

1. जप का अर्थ और उसकी भूमिका

जप का अर्थ है, एक ही ध्वनि या नाम को बार-बार दोहराना। जब कोई साधक जप करता है, तो उसका मन केवल उसी ध्वनि में स्थिर होता है। यह मन को बाहरी दुनिया से हटाकर भीतर लाने का सबसे आसान तरीका है। जप से भीतर की ऊर्जा संचित होती है और मन शांत होता है। लेकिन जप में एक प्रयास होता है, एक कर्ता होता है, जो जप कर रहा है। अर्थात, यहाँ तक साधक और साधना के बीच एक दूरी बनी रहती है।

• जप मन को स्थिर करने का सरल उपाय है।
• जप में एक प्रयास और कर्ता का भाव बना रहता है।
• यह भीतर की ऊर्जा को संचित करता है।

2. ध्यान का अर्थ और उसकी भूमिका

ध्यान का अर्थ है, जो कुछ भी हो रहा है, उसे बिना किसी प्रयास के देखना। ध्यान में कोई करना नहीं होता, केवल होना होता है। जब जप गहरा होता है, तो वह अपने आप ध्यान में बदल जाता है। जब साधक को यह भी भान नहीं रहता कि मैं जप कर रहा हूँ, केवल जप की ध्वनि शेष रह जाती है, वही ध्यान की अवस्था है। ध्यान में कर्ता का भाव विलीन हो जाता है और साधक अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है।

• ध्यान बिना किसी प्रयास के देखने की कला है।
• ध्यान में कर्ता का भाव विलीन हो जाता है।
• यह गहरी शांति और आत्मज्ञान की अवस्था है।

3. जप और ध्यान का संबंध

जप और ध्यान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। जब मन बहुत चंचल हो, तो उसे स्थिर करने के लिए जप आवश्यक है। और जब मन स्थिर हो जाए, तो उसे और गहराई में ले जाने के लिए ध्यान आवश्यक है। जप ध्यान का द्वार है। जो व्यक्ति जप में गहराई तक उतरता है, वह स्वतः ही ध्यान में प्रवेश कर जाता है।

• जप मन को स्थिर करने के लिए है, ध्यान उसे गहराई देने के लिए।
• जप ध्यान का द्वार है।
• जप में गहराई आने पर ध्यान स्वतः घटित होता है।

4. कौन श्रेष्ठ है?।

यह व्यक्ति के स्वभाव और उसकी वर्तमान अवस्था पर निर्भर करता है। यदि मन बहुत भटकता है, तो जप श्रेष्ठ है। यदि मन शांत है, तो ध्यान श्रेष्ठ है। लेकिन अंततः दोनों का लक्ष्य एक ही है — मन की स्थिरता और परमात्मा से जुड़ाव। इसलिए दोनों को एक-दूसरे का विरोधी न मानें, बल्कि एक ही यात्रा के दो पड़ाव मानें।

• मन भटके तो जप, मन शांत हो तो ध्यान।
• दोनों का लक्ष्य एक ही है।
• दोनों एक ही यात्रा के दो पड़ाव हैं।

निष्कर्ष: जप और ध्यान में तुलना करना उचित नहीं है। जप वह नींव है जिस पर ध्यान का भवन खड़ा होता है। पहले जप से मन को स्थिर करें, फिर ध्यान में उतरें। यही पूर्ण और संतुलित साधना है।

Tuesday, 27 October 2026

🌷 अधिष्ठान का माहात्म्य 🌷

🌷 अधिष्ठान का माहात्म्य 🌷 

🙏 मेरी प्यारी धर्म-पुत्रियो! मेरे प्यारे धर्म-पुत्रो! 🙏 

तुम्हारे भीतर जो धर्म जागा है वह पुष्ट होता जाय, बलवान होता जाय! तुम्हारे भीतर जो प्रज्ञा जागी है, वह पुष्ट होती जाय, बलवती होती जाय! 

लेकिन धर्म कैसे पुष्ट होता है? प्रज्ञा कैसे पुष्ट होती है ? केवल चाहने मात्र से नहीं होती। चाहते तो सभी हैं। हर समझदार आदमी, हर समझदार साधिका/साधक यह चाहता है कि मेरा धर्म पुष्ट हो जाय, मेरी प्रज्ञा पुष्ट हो जाय, मैं प्रज्ञा में स्थित हो जाऊं, स्थितप्रज्ञ हो जाऊं। लेकिन केवल चाहने से तो दो वक्त का भोजन भी नहीं मिलता। दो वक्त के भोजन के लिए भी मेहनत करनी होती है, परिश्रम करना होता है, पुरुषार्थ करना होता है। और धर्म में पक जाय! प्रज्ञा में पक जाय! और चाहे कि कामना करने से ही पक जायगा तो धोखे की बात हुई भाई! मेहनत करनी है, बहुत मेहनत करनी है। 

देखता हूं, अनेक साधक-साधिकाएं किसी शिविर में शामिल होते हैं, बड़े प्रसन्न होते हैं। धर्मरस की एक बूंद भी चख लें तो प्रसन्नता आयेगी ही। धर्म चखा है न! दस दिन के लिए बुद्धिविलास करने नहीं आते, वाणी-विलास करने नहीं आते, छुट्टियां मनाने नहीं आते, पिकनिक करने नहीं आते, तपने आते हैं। तो हर व्यक्ति जो दस दिन के शिविर में आता है, वह कम या अधिक मेहनत करता ही है। और मेहनत करता है तो धर्म का रस चखता है। जो भी धर्मरस चखेगा, उसे बड़ी प्रसन्नता होगी। उसके मन में बड़ा मोद जागेगा। 

लेकिन दस दिन शिविर कर लेने के बाद फिर उसे भुला दें, घर आकर सुबह-शाम, सुबह-शाम जो पुरुषार्थ करना है, वह करना बंद कर दें, तो धर्म कैसे पुष्ट होगा, प्रज्ञा कैसे पुष्ट होगी? कुछ दिनों के बाद कोई साधक मिलता है, कोई साधिका मिलती है, तो मेरे पास तो एक ही प्रश्न होता है - पूछता हूं, क्यों भाई! साधना हो रही है? क्यों बेटी! साधना चल रही है? तो उनमें से अनेक मुँह लटकाकर जबाब देते हैं - नहीं, कुछ दिन तो चली, फिर छूट गयी; कुछ दिन तो चली, फिर छूट गयी। झूठ बोलते हैं। छूट नहीं गयी, छोड़ दिया। कुछ दिन तो किया, फिर छोड़ दिया। सच्चाई यह है - छोड़ दिया, छूटी नहीं। अपने आप नहीं छूटती। हम छोड़ देते हैं तो छूटती है। 

जब शिविर में आते हैं, तो समझते हैं कि भाई, यह जो दिन में तीन बार एक-एक घंटे का अधिष्ठान ले कर बैठते हो, कितना कठिन मालूम होता है। पहले दिन का अधिष्ठान, विपश्यना देते ही पहला-पहला अधिष्ठान कितनी पीड़ा पैदा करता है! एक घंटे निकालना पांव टूट बड़ा कठिन मालूम होता है। सबका अनुभव है। और फिर भी मन को मजबूत करता है - बैठना ही है मुझे घंटे भर। 

और मान लो - नहीं बैठ पाया, पांव खुल गया तो अच्छा, एक बार खुल गया, दो बार खुल गया। अगली बैठक में नहीं खुलने दूंगा। फिर प्रयत्न करता है। फिर कठिनाई आती है। अगली बैठक में फिर प्रयत्न करता है, फिर कठिनाई आती है। यूं करते-करते आंठवें नौवें दिन तक पहुँचते-पहुँचते घंटे भर बैठने लगता है न! पहले ही दिन कह दें कि बहुत कठिन काम है, हमसे नहीं होता, हम तो नहीं करेगें; तो ऐसा व्यक्ति कभी घंटे भर अधिष्ठान में बैठ ही नहीं पायगा, जीवन भर नहीं बैठ पायगा। 

जब शिविर में आते हैं तो दसवें दिन समझाते हैं न कि एक बरस का अधिष्ठान लेना पड़ेगा। बड़ी कठिनाई आयगी। फिर भी एक वर्ष का व्रत है मेरा, चाहे जो कुछ हो जाय, दुनियादारी के क्षेत्र में चाहे जितना नुकसान हो जाय - और नुकसान होता नहीं, कभी होता नहीं। केवल मन को दृढ़ करने की बात है। जैसे नया-नया साधक विपश्यना की शाम को पालथी मार कर बैठता है और कहता है - चाहे मेरा पांव टूट ही क्यों न जाय, मैं नहीं बदलता। टूटता नहीं न! आज तक किसी का टूटा नहीं। टूट जाय तो हम बैठाये नहीं न! 

किसी का पांव तोड़ने के लिए थोड़ी विपश्यना सिखाते हैं। जानते हैं, नहीं टूटता इसीलिए कहते हैं - साल भर तक का अधिष्ठान हो और मन में यह दृढ़ संकल्प हो कि चाहे जितनी हानि हो जाय हमारी, दुनियादारी के क्षेत्र में चाहे जितनी हानि हो जाय, हम अपना अधिष्ठान नहीं तोड़ेंगे, बैठेंगे ही। तो जैसे पांव टूटता नहीं, केवल मन के संकल्प करने की बात है; ऐसे ही दुनियादारी में हानि होती नहीं। 

धर्म जब हम धारण करते हैं, तो केवल परलोक के लिए नहीं करते। जो धर्म हमें केवल यह वायदा करता है कि मरने के बाद तुम्हें ये मिल जायगा, तुम्हें वो मिल जायगा; इस जीवन में तो कुछ नहीं मिलेगा, पर मरने के बाद मिल जायगा, तो समझ लेना चाहिए - धर्म-वर्म नहीं, धोखा है। सचमुच धर्म होगा तो पहले लोक सुधरेगा, परलोक बाद में सुधरेगा। 

लोक सुधारने के लिए धर्म। यहीं हमारा जीवन सुधर रहा है कि नहीं? इसी जीवन में सुख-शांति आ रही है कि नहीं? हमारा लोकीय क्षेत्र अच्छा हो रहा है कि नहीं? इस मापदंड से धर्म मापा जाता है। जिसका लोक सुधरने लगा, उसका परलोक अपने आप सुधर जायगा। धर्म भी पालन करें और लोक भी बिगड़े, ऐसा होता नहीं, कभी होता नहीं।

तो बस, मन को दृढ़ करने की बात है कि चाहे जो कुछ हो जाय, यह वर्ष भर का अधिष्ठान है; मुझे वर्ष भर सुबह-शाम साधना करनी ही है। और अनेकों का अनुभव हमारे सामने है। जिस-जिस व्यक्ति ने इस प्रकार अधिष्ठान लेकर के वर्ष भर घर में अभ्यास कायम रखा, वह नहीं कहता कि छूट गया, छूट गया, क्योंकि वह छोड़ता नहीं। फिर छोड़ेगा भी नहीं, कभी नहीं छोड़ेगा। और जिसने छोड़ा उसने यह बारह महीने के भीतर ही छोड़ दिया। 

दस दिन में छोड़ दिया, बीस दिन में छोड़ दिया, महीने में छोड़ दिया, दो महीने में छोड़ दिया ... तो छोड़ ही दिया। तो भाई! यह अधिष्ठान जो वर्ष-भर का लेते हो, ऐसा अधिष्ठान लेकर किसी पर एहसान तो नहीं कर रहे न! न अपने मार्गदर्शक पर एहसान करते हैं, न किसी भगवान बुद्ध पर एहसान करते हैं, न किसी अन्य देवी पर, देवता पर, ईश्वर पर, ब्रह्म पर, अल्लाहमियां पर एहसान करते हैं कि देखो! हम अधिष्ठान पूरा कर रहें हैं। भाई, एहसान अपने आप पर करते हैं न! अपने भले के लिए करना है न! 

हर समझदार आदमी को समझना चाहिए कि जब मैं धर्म धारण करता हूं, तो जो लोक मंगल होगा सो तो होगा ही, मेरा मंगल तो होने ही लगा, तत्काल होने लगा। लोक कल्याण होगा सो तो होगा ही, पर मेरा कल्याण तो होने ही लगा; तत्काल होने लगा। आत्ममंगल होने लगा तो सर्व मंगल होने ही लगेगा। आत्मोदय होने लगा तो सर्वोदय होने ही लगेगा। तो किसी पर एहसान नहीं कर रहे, अपने मंगल के लिए, अपने कल्याण के लिए मन को दृढ़ करना है। 

कल्याण मित्र,
🪷 सत्य नारायण गोयनका 

(लक्खमसी नप्पू हॉल, बम्बई - जुलाई २०, १९८६)
विपश्यना पत्रिका संग्रह, मार्च 2017 में प्रकाशित। 

भवतु सब्ब मगंलं !!

Sunday, 18 October 2026

मरणानुस्मृति का अभ्यास करें, मरणानुस्मृति का अभ्यास हमारे लिए अत्यंत कल्याणकारी है। 🌸

मरणानुस्मृति का अभ्यास करें, मरणानुस्मृति का अभ्यास हमारे लिए अत्यंत कल्याणकारी है। 🌸

मेरे प्यारे साधक-साधिकाओ !

मरणानुस्मृति का अभ्यास मृत्यु की याद बनाए रखने का अभ्यास है।  जब तक मृत्यु की याद बनी रहती है, तब तक चित्त में अनायास विरक्ति पैदा होती है , अनासक्ति पैदा होती है, प्रज्ञा प्रबल होती है।  सही प्रकार से मरणानुस्मृति कैसे की जाय, इसके लिए हमें समझना होगा कि गलत प्रकार की मरणानुस्मृति क्या है और उससे कैसे बचें।  

🌷 यदि मेरी मरणानुस्मृति किसी प्रिय जन की मृत्यु पर आधारित है और मैं उस मरणानुस्मृति से उसी  व्यथित-व्याकुल  हूं, जिस प्रकार कोई माँ अपने इकलौते बेटे की मृत्यु की याद में होती है तो मेरी यह मरणानुस्मृति सही नहीं है, गलत है।  

यदि मेरी मरणानुस्मृति किसी अप्रिय जन की मृत्यु पर आधारित है और मैं उससे वैसे ही प्रमुदित होता  हूं, जैसे  कि कोई व्यक्ति अपने किसी बड़े दुश्मन की मौत पर होता है  तो मेरी यह मरणानुस्मृति सही नहीं है, गलत है।  

यदि मेरी मरणानुस्मृति किसी ऐसे व्यक्ति के मरण पर आधारित है जो कि न मुझे प्रिय है, न अप्रिय  और मेरा मन धर्म संवेग-विहीन अन्यमनस्कता  भरा हुआ यही चिंतन करता है  कि दुनिया में बहुत जन्मते हैं और बहुत मरते हैं, मुझे इससे क्या? ठीक वैसे ही जैसे कि स्मशान भूमि में मूर्दे जलाने वाला डोम अथवा  कब्र खोदने वाला मजदूर  अन्यमनस्क रहता है, तो मेरी मरणानुस्मृति भी सही नहीं है, गलत है।  

यदि मेरी मरणानुस्मृति मेरी अपनी ही आशंकित मृत्यु पर आधारित है और मैं वैसे ही भयभीत होता हूं जैसे की कोई व्यक्ति अपने पर उठे कातिल के खंजर को देखकर होता है तो भी मेरी यह मरणानुस्मृति सही नहीं है, गलत है।  

🌷 सही मरणानुस्मृति का अभ्यास करते हुए मन में उसके प्रति न राग हो न द्वेष हो, न मोहाच्छन्न बेहोशी हो  और न ही भय हो!  मरने की अनुस्मुति जब निर्भयता से भरी हो, जब हर्ष और रोदन विहीन हो, जब अनित्य-बोध-जन्य प्रज्ञा से भरी हो, तभी सही है .

मरणानुस्मृति के अभ्यास  लिए इस सच्चाई को कभी न भूलूं कि मेरी मेरी मृत्यु अवश्यंभावी  है।  मृत्यु का कारण समय  स्थान भले ही ज्ञात न हो, परंतु कभी भी, कहीं भी,किसी भी  कारण से मेरी मृत्यु हो सकती है।  मैं अपनी मृत्यु के लिए हर क्षण तैयार रहूं, जन्म भले रोते  हुए हुआ, परंतु , मृत्यु तो  हँसते और मुस्कराते हुए ही हो।  इस निमित्त अपने आपको पकता रहूं, पुष्ट करता रहूं, यही सही मरणानुस्मृति है।  यदि मैं धनवान हूं तो सदा इस तथ्य की याद बनाए रखूं की मुझसे कहीं अधिक धनवान भी मृत्यु को प्राप्त हुए ही हैं।  मैं मृत्यु के चंगुल से बच नहीं सकता, मौत किसी पर रहम नहीं करती, राजा हो या रंक, विद्वान हो या अनपढ़, स्त्री हो या पुरुष, मनुष्य हो या इतर जीव, इस लोक का हो या उस लोक का, प्रत्येक प्राणी समय पाकर मृत्यु को प्राप्त होता ही है।  जीवित-इंद्रिय का उपच्छेद होता ही है, हर जन्म लेने वाला मृत्यु का विधान साथ लेकर ही आता है, हर फूल मुरझाने के ले ही खिलता है, हर प्रभात संध्या के लिए ही उदय होता है, हर बसंत पतझड़ के लिए ही पुष्पित होता है, हर पात्र टूटने  के लिए ही बनता है, मृत्यु जीवन की अनिवार्य परिणति है, इससे किसी का छुटकारा नहीं।  मृत्यु किसी का लिहाज नहीं करती की यह ब्राह्मण है या शूद्र है, यह योग्य पात्र है या अयोग्य पात्र है, वह तो समय पाकर  सभी प्राणियों तक पहुँचती ही है; जीवन का हर सांस हमें मृत्यु की और ही तो ले जाता है।  

आरोग्यता रोग के आने तक ही है, यौवन बुढ़ापे  के आने तक हे है, इसी प्रकार जीवन मृत्यु के आने तक यही है।  हर आरोग्य-संपत्ति रोग-विपत्ति में बदल जाती है. हर यौवन- संपत्ति जरा-विपत्ति में बदल जाती है, इसी प्रकार हर जीवन-संपत्ति , मरण-विपत्ति में बदल ही जाती है. किसी विषैले जन्तु  का दंश किसी शस्त्र का प्रहार, भोजन का अपच्य हो जाना, पित्त, वायु या कफ का कुपित हो जाना, श्वांस का  अवरुद्ध हो जाना, गर्मी-सर्दी की अधिकता का होना, आहार का आभाव होना, आदि, आदि , अनगिनत कारण मृत्यु के प्रत्यय बन सकते है।  

मृत्यु की इस सक्कै को जानते रहने का मतलब यह नहीं की हम इस वजह से सदा चिंतित रहें, आशंकित  रहे, व्याकुल रहे, भयभीत रहे, बल्कि उसका अर्थ यही है की हम प्रज्ञापूर्वक इस सके को समझते रहें कि मेरे अनमोल मनुष्य जीवन की आयु बहुत थोड़ी है; मैं कहीं इसके प्रति गहरी आसक्ति में न उलझ जाऊं।  मृत्यु से मेरा छुटकारा नहीं हैं, अतः जितना भी समय मेरे पास है, उसका वैसे ही तत्परतापूर्वक उपयोग  करूं जैसे की सर में आग लगा हुआ व्यक्ति उस आग को बुझाने के लिए तत्पर हो उठता है।  

यह सारा संसार मरणधर्मा है।  मैं भी मरणधर्मा हूं।  इस सचाई को जानते रहना अच्छा तो है, परन्तु केवल बौद्धिक स्तर पर ही इसका चिंतन होता रहे तो कोरा बुद्धिविलास बन जाने का खतरा है।  यदि ऐसा हो जाये तो श्मशान-ज्ञान की तरह तीर्थक साबित होबा।  अतः इस सच्याई को गहराइयों में उतर कर इसका प्रत्यक्ष अनुभव करना ही कल्याणकारी है।  इसीलिए विपश्यना साधना है, जिसके द्वारा अंतर्मुखी होकर हम इस सच्याई का स्वयं अनुभव करत हैं कि  हमारा यह शरीर-प्रपंच और चित्त प्रपंच कितना नश्वर है, कितना मरणधर्मा है, कितना विनाशधर्म है, क्षण-क्षण परिवर्तनशील है और जो नश्वर है, उसमें यह जो मोह, मूढ़ता है कि "यह मेरा है" "एतं मम" " यह मैं  हूं"  "एसोहमस्मि"  "यह मेरी आत्मा है" "एसो में अत्ता" ये सब विपश्यना द्वारा शनैः शनैः नष्ट होती जाती हैं।  साधक आत्मभाव और अस्मिताभाव की छलन से दूर होता है. अंतर्मुखी होकर इस इंद्रिय  जगत  का निरीक्षण करता हुआ, उसकी सूक्ष्मतम परिधि तक पहुंचकर और उसे भी पार करके उस निर्वाणिक स्थिति का मुक्त अवस्था का साक्षात्कार करता है, जो कि इन्द्रियातीय है, भवातीत, लोकातीत है और जो कि  विनाशधर्मा है और मरणधर्मा न होकर नित्य शाश्वत ध्रुव अमृतधर्मा है।  विपश्यना के इस अभ्यास के दौरान हम अपने ऐसे पूर्व संचित संस्कारों से छुटकारा पाते जाते है, जो कि हमारे अंतर्मन पर पत्थर की लकीर की तरह घरे पड़े हुए हैं और जो कि  हर मृत्यु के क्षण जागृत होकर पुनर्जन्म का कारण बनते है।  इन संस्कारों का उन्मूलन ही मृत्यु के बाद नया जीवन देने वाली इस नैसर्गिक प्रक्रिया का निरोध करता है और इसी से अमृत पद प्राप्त होता है। 

इस प्रकार अमृत तक पहुंचने के लिए संपूर्ण मृत्यु क्षेत्र का अंतरर्साक्ष्य किया जाता है।  यही मरणानुपश्यना है, अनित्य लक्षण की विपश्यना है, जो की मरणानुस्मृति से आरम्भ होती है. इसीलिए मरणानुस्मृति को महान कल्याणकारी माना गया है।  

🌷भगवान ने ठीक कहा; - 

तस्मा हवे अप्पमादं, सुमेधसो सुमेधसो | 
एवं महानुभावाय , मरणस्सतिया सदाति || 

इसीलिए समझदार आदमी को चाहिए कि  वह विणा प्रमाद में पड़े इस मरणानुस्मृति का अभ्यास करे, जो कि  महानुभाववाली है, महा मंगलमयी है | 
    
श्री सत्यनारायण गोयनका 
विपश्यना पत्रिका संग्रह भाग -१ ( पृष्ट ८४, ८५, ८६)


Saturday, 17 October 2026

ऐ मेरे मन!


*उद्बोधन : ऐ मेरे मन! (पहला भाग)

ऐ मेरे मन!
कितना समय बीत गया पर अब तक भी तेरा कुलबुलाना नहीं मिटा। तेरे
भीतर क्रोध के अंगारे अब तक भी सुलग रहे हैं। अरे अबोध! इन अंगारों में तू
किस कदर जल रहा है? कितना संतापित है तू इस जलन से ? फिर भी, कितना
दुर्बोध है रे तू? अपने भीतर धीरे-धीरे इस आग को सुलगाए ही जा रहा है। जब
तक इसे शांत करने का कोई उपाय नहीं करेगा, तब तक तो यह आग अपने
स्वभाव से शनैः शनैः बढ़ती ही जायगी। किसी ने ठीक ही तो कहा है: -
_सिने सिप्पं सिने धनं, सिने पब्बतमाहं।_
_सिने कामस्स कोधस्स, इमे पञ्च सिने सिने॥_
(लोकनीति गाथा १)

शनैः शनैः ही शिल्पज्ञान बढ़ता है। शनैः शनैः ही धन बढ़ता है। शनेः शनैः
ही पर्वतारोहण होता है। शनै: शनेः ही काम और क्रोध बढ़ता है। ये पांचों शनेः
शनैः ही बढ़ते हैं।
जैसे आग स्वयं अपने लिए नया-नया जलावन लेकर शनैः शनैः बढ़ती ही
रहती है, वैसे ही स्वयमेव बढ़ते रहना इस क्रोध का सहज स्वभाव है।
_अप्पो हुत्वा बहु होति, वड्ठते सो अखन्तिजो।_
वह जो अशांति से उत्पन्न होने वाला क्रोध है, वह थोड़े से बढ़ता हुआ बहुत
ही होते रहता है।
_आसङ्गी बहुपायासो, तस्मा कोधं न रोचये।_

(जातक गाथा १६)

इसका संग बहुत दुःखदायी है। ऐसा अनर्थकारी, पापी क्रोध किस समझदार

को रुचिकर हो सकता है भला? परंतु तेरे जैसे नासमझ इसे बढ़ाने में ही लगे रहते
हैं। वे समझ ही नहीं पाते कि इसका कितना बड़ा दुष्परिणाम होने वाला है।

_बाणिजान॑ यथा नावा, अप्पमाणभरा गरु।_
_अतिभारं समादाय, अण्णवे अवसीदति॥_

_एवमेव नरो पापं, थोक थोकम्पि आचिनं।_
_अतिभारं समादाय, निरये अवसीदति॥_
(जातक २. गाथा १२४५-४६)

जैसे किसी बनिए की थोड़े भार वाली नाव में अत्यधिक भार भर दिये जाने
पर वह समुद्र में डूब जाती है वैसे ही थोड़ा-थोड़ा पाप-भार बढ़ाता हुआ नासमझ
व्यक्ति अतिभार के कारण दुर्गतियों में डूब जाता है
चाहिए तो यह कि जिस प्रकार कोई सुनार धीरे-धीरे चांदी का थोड़ा- थोड़ा
मैल दूर करता है, वैसे ही समझदार आदमी सत्प्रयत्न द्वारा क्षण प्रतिक्षण अपने
मन का थोड़ा-थोड़ा मैल दूर करे। उसे देषहीन बनाए, क्रोधहीन बनाए, पापहीन
बनाए ।
_अनुपुब्बेन मेधावी, थोकं थोकं खणे खणे।_
_कम्मारो रजतस्सेब, निद्धमे मलमत्तनो॥_
_(धम्मपद गाथा २३९)_
परंतु तू तो इतना नासमझ है कि अपने मैल को शनैः शनैः कम करने के
बजाय उसे शनैः शनैः बढ़ाए ही जा रहा है और परिणाम स्वरूप इस आग से
अपने आपको संतप्त ही किए जा रहा है। यह जो आग तेरे भीतर उत्पन्न हुई है,
वह अन्य किसी को जलाए या न जलाए, तुझे तो अवश्य जलाएगी ही।
_कट्ठस्मिं मत्थमानस्मिं, पावको नाम जायति।_
_तमेब कटं डहति, यस्मा सो जायते गिनि॥_
(जातक १. गाथा ५८)
जिस प्रकार किसी काठ में पारस्परिक रगड़ द्वारा उत्पन्न हुई आग उसी काठ
को जलाती है, वैसे ही तेरे भीतर किसी के भी रगड़ से उत्पन्न हुई यह क्रोधाग्नि
तुझे ही जला रही है।
किसी मूर्ख, अजान, अबोध से तेरी ऐसी रगड़-झगड़ हो गई कि उसके
परिणाम स्वरूप तेरे भीतर यह क्रोध की अग्नि जागृत हो गई। पर तू भी तो कम
अबोध नहीं कि इस आग में अब तक जले ही जा रहा है।
_एवं मन्दस्स पोसस्स, बालस्स अविजानतो।_
_सारम्भा जायते कोधो, सोपि तेनेव डय्हति॥_
_(जातक ४४१. गाथा ५९)_
चाहे जिस मंद-बुद्धि अबोध व्यक्ति की रगड़ से तेरे भीतर आग जल उठी
हो, परंतु आग तो आग है और उसका स्वभाव है कि जहां उत्पन्न होती है, उसी
को जलाती है। जिसकी रगड़ से यह आग लगी, वह जळे या न जले, परंतु तू तो
इस आग से जळे ही जा रहा है।

जिसकी रगड़ से तेरे भीतर यह आग लगी है वह दुर्बोध हो, अज्ञानी हो
अथवा कोई श्रमण हो, ज्ञानी हो, इससे क्या अंतर पड़ता है? यदि इस आग से तू
जल उठा है तो तुझे तो यह आग संतापित करेगी ही। नीम की लकड़ी की रगड़
लगी हो अथवा चंदन की लकड़ी की, यदि उस रगड़ से किसी काठ में आग उत्पन्न
हो गई तो वह आग उस काठ को जलायेगी ही। जलाना ही उसका धर्म है। आग
चाहे कोयळे की हो अथवा पेट्रोल की हो, विद्युत की हो अथवा गैस की हो, आग
तो आग है। जलायेगी ही। अतः समझदार आदमी सदैव इस बात से सतर्क रहता
है कि आग चाहे जिस स्रोत से उत्पन्न हुई हो उसे बढ़ने न दे।
_सुत्वान दुसितो बहुं वाचं, समणानं वा पुथुजनानं।_
_फरुसेन हि न पटिवज्जा, न हि सन्तो पटिसेनि करोन्ति ॥_
_(वतुरारक्खदीपनी निस ३, गाथा १७)_

समझदार शांत-चित्त व्यक्ति किसी श्रमण से अथवा किसी मूढ़ अज्ञानी
व्यक्ति से अनेक दूषित वचन सुनकर भी बदढ़े में स्वयं कभी कटु-कठोर वचन का
प्रयोग नहीं करता। स्वयं क्रुद्ध होकर उसका प्रतिकार नहीं करता। क्योंकि वह
जानता है कि ऐसा करते ही वह स्वयं अपने भीतर आग जला लेगा। और उस
दुर्भाषी व्यक्ति की क्रोध की आग में नया पेट्रोल छिड़क देगा। अपने और पराए
भढे को समझने वाला, न स्वयं अपनी ओर से कड़वे वचन बोलकर नयी आग
लगाता है, और न ही किसी और के कड़वे वचन सुनकर उसे कड़वा प्रत्युतर देता
है और उसकी आग को भड़काता है।

_मा वोच फसुसं किञ्चि, वृत्ता पटिवदेय्युं तं।_
_दुक्खा हि सारम्भकथा, पटिदण्डा फुसेय्युं तं ॥_
_(नरदक्खदीपनी चारित्त निद्देस गाथा १३७)_

इसीलिए समझदार आदमी कभी कोई कड़वी वाणी न बोले। क्योंकि सुनने
वाला क्रुद्ध होकर बदले में कड़वी वाणी ही बोलेगा। क्रोधभरा हर वचन दुःख ही
पैदा करेगा। ऐसे वचनों का प्रयोग करने वाले हमेशा दुःखी होंगे।

_यो कोपनेय्ये न करोति कोपं,_
_न कुज्झति सप्पुरिसो कदाचि।_
_कुद्धोपि सो नाविकरोति कोपं,_
_ततं बे नरं समणमाहु लोके ॥_
_(जातक १. गाथा २४)_

सत्पुरुष कभी किसी पर क्रोध नहीं करता । वह तो किसी कोपभाजन पर भी
क्रोध नहीं करता। क्रुद्ध हो जाय तो भी क्रोध प्रकट नहीं करता। ऐसा संयमित
सत्पुरुष ही तो दुनिया में सच्चा संत कहलाता है। सचमुच समझदार के लिए क्रोध
किसी भी अवस्था में उचित नहीं है।

_अलसो गिही कामभोगी न साधु,_
_असञ्जतो पब्बजितो न साधु।_
_राजा अनिसम्मकारी न साधु,_
_पण्डितो कोधनो तं पि नं साधु॥_
_(लिकनीति राजक ९३१. गाथा १२१)_

आलसी कामभोगी गृहस्थ अच्छा नहीं होता, न ही संयमविहीन गृहत्यागी
प्रव्रजित, बिना सोचे समझे निर्णय करने वाला शासक अच्छा नहीं होता, और न
ही क्रोधयुक्त ज्ञानी पंडित व्यक्ति। कोई सचमुच ज्ञानी होगा तो वह क्रोध का
गुलाम होगा ही नहीं।

समझदार व्यक्ति सदा अपनी सही सुरक्षा करता है। वह अपनी सुरक्षा में ही
औरों की भी सुरक्षा देखता है। समझदार व्यक्ति सदा औरों की सही सुरक्षा करता
है। वह औरों की सुरक्षा में ही अपनी भी सुरक्षा देखता है।

_अत्तानं रक्खन्तो परं रक्खति,_
_परं रक्खन्तो अत्तानं रक्खति॥_
_(नरदक्खदीपनी वारित्त निहेस गाथा १४५)_
वह अपनी रक्षा करता hहुआ औरों की रक्षा करता है। औरों की रक्षा करता
हुआ अपनी रक्षा करता है। सचमुच, जो स्वयं क्रोध की पहल नहीं करता और
किसी क्रोधी के पहर कर लेने पर प्रतिक्रिया स्वरूप भी क्रोध नहीं करता, ऐसा
व्यक्ति ही तो अपनी और परायी सब की सही सुरक्षा करता है। ऐसा व्यक्ति ही

तो सही माने में सत्पुरुष है।

_उभिन्नमत्थं चरति, अत्तनोच परस्सच।_
_परं संकुप्पितं ञत्वा, यो सतो उपसम्मति॥_
_(नरदक्खदीपनी चारित्त निदेस गाथा १४५)_

अपने और पराये भले के लिए ही सत्पुरुष दूसरे को कुपित हुआ देखकर
स्वयं शांति धारण करता है। सचमुच इसी में तो दोनों की भलाई है। कुपित हुए पर
कुपित हो जायँ तो अपनी और उसकी दोनों की ही हानि हो।

ऐ मेरे भोळे मन! तू जिस धर्म-पथ का पथिक है वह तो क्षांति का पथ है।
शांति का पथ है, सहिष्णुता का पथ है, धीरज का पथ है। इस पथ पर चलने वाळे
सभी पथिक शांति का ही अभ्यास करते आए हैं। मैं जानता हूं कि यह तो अभी
संभव नहीं है कि तुझे उन धर्मराज भगवान तथागत की तरह कभी, किसी भी
अवस्था में, क्रोध आए ही नहीं, उनकी तरह तेरी भी भृकुटी कभी टेढ़ी हो ही नहीं ।
परंतु इतना तो अवश्य हो ही सकता है कि जब कभी तुझे क्रोध आए तब तू शीघ्र
से शीघ्र उसका शमन कर ले। उसे बढ़ने न दे | बुद्ध बनने के पूर्व उस नर-श्रेष्ठ ने
भी तो जन्म जन्मान्तरों में यही अभ्यास किया था। भावी-बुद्ध बोधिकुमार ने
सर्वथा उकसाने वाली स्थिति में भी इस दुष्ट क्रोध को अपने सिर पर सवार नहीं ही
होने दिया। इसका सामना ही किया।

_उष्पज्जे मे न मुच्चेय्य, न मे जीवतो।_
_रजंब॒ विपुला बुडि, खिप्पमेय निवारये॥_
_(जातक १. चूलबीधि जातक गाथा ५०)_

उठते हुए क्रोध को देखते-देखते भावी बुद्ध को यह होश था कि यह उत्पन्न
होगा तो मुझे नहीं छोड़ेगा, जीवन भर बांधे रखेगा जिस तरह उठती हुई धूल को
विपुल वृष्टि द्वारा दबा दिया जाता है, वैसे ही इसका निवारण कर देना चाहिए।
और यही तो उसने किया भी।

_उप्पज्जि मे न मुच्चित्थ, न मे मुच्चित्थ जीवतो।_
_रजं ब विपुला बुदि खिप्पमेव निवारयिन्ति॥_
_(जातक १. चूलबीधि जातक गाथा ५२)_

यह क्रोध जैसे ही उत्पन्न हुआ, मैं उसके अधीन नहीं हुआ। अतः यह मुझे
जीवन भर अपना गुलाम बनाए न रख सका। (परन्तु अब) जिस प्रकार उठती हुई
धूल का निवारण विपुल वर्षा द्वारा हो जाया करता है, वैसे ही मैंने इसका निवारण
कर लिया।

_यम्हि जाते न पस्सति, अजाते साधु पस्सति।
सो मे उप्पज्जि नो मुच्चि, कोधो दुम्मेधगोचरो ॥
(जातक १. चूलबीधि जातक गाथा ५४)_

कैसा अनिष्टकारक है यह क्रोध! सज्जन इसके उत्पन्न होने के पहले ही
भली-भांति देख समझ सकते हैं। इसके उत्पन्न होने पर तो सारी सूझ-बूझ नष्ट हो
जाती है। ऐसे अनर्थकारी क्रोध के उत्पन्न होने पर मैं इसके अधीन नहीं हुआ।
सचमुच क्रोध तो मूर्खों की ही गोचर भूमि है।

_यस्मिञ्च जायमानम्हि, सदत्थं नावबुज्झति।
सो मे उप्पज्नि नो मुच्चि, कोधो दुम्मेधगोचरो॥
(जातक १. चूलबीधि जातक गाथा ५६)_

जिसके उत्पन्न होने पर आदमी की सारी सद्बुद्धि नष्ट हो जाती है और वह
स्वयं अपना भला बुरा भी नहीं समझ सकता, ऐसा दुष्ट क्रोध मुझमें उत्पन्न हुआ,
परंतु मैं उसके वशीभूत नहीं हुआ। अहो, क्रोध तो मूर्खो की ही गोचरभूमि है।

_येन जातेन नन्दन्ति, अमित्ता दुक्खमेसिनो।
सो मे उप्पज्जि नो मुच्चि, कोधो दुम्मेधगोचरो॥
(जातक १. चूलबीधि जातक गाथा ५५)_

जब मुझमें क्रोध जागता है तो मेरे वे दुश्मन जो मेरा अनिष्ट चाहते हैं, जी
मुझे दुःखी देखना चाहते हैं, उनकी इच्छा पूरी होती है, वे ऐसा देखकर प्रसन्न ही
होते हैं । क्योंकि क्रोध को जन्म देकर मैं अपने दुःखों को ही जन्म देता हूं। इसीलिए
मुझे क्रोधान्वित देखकर वे प्रसन्न ही होते हैं। ऐसा दुःखदायी क्रोध मुझमें उत्पन्न
हुआ, परंतु मैंने उसका तुरंत शमन कर दिया। मैं उसका गुलाम न बन सका।
अहो, क्रोध तो मूर्खों की ही गोचर भूमि है।

_येनाभिभूतो कुसलं जहाति,
परक्करे विपुलञ्चापि अत्थं।
स भीमसेनो बल्वा पमद्दी,
कोधो महाराज न मे अमुच्चथ॥
(जातक १. चूलबीधि जातक गाथा ५७)_

जिसके वशीभूत होकर आदमी अपना कुशल खो देता है। बड़े से बड़ा लाभ
गंवा देता है। हे महाराज! बड़े बड़ों का मर्दन कर देने वाला ऐसा भयावह बलशाली
वह क्रोध मुझे अपने बंधन में न बांध सका। अहो, महा अनर्थकारी क्रोध का
गुलाम होने से मैं बच गया। इस विजय की खुशी में भावी-बुद्ध बोधिकुमार प्रसन्न
हो उठा।

ऐ मेरे बावरे मन! तू भी उसी संत के पावन पथ का अनुगामी बन। जीत,
अपने उठते हुए क्रोध को जीत । इसे बढ़ने न दे, इसके वशीभूत न हो, नहीं तो यह
तेरे भीतर ऐसा द्वेष-दौर्मनस्य भर देगा जो कि जीवन भर तुझ पर छाया रहेगा।
जीवन भर तुझे दुःखी बनाता रहेगा। इसके पहले कि यह तुझे पछाड़ दे और
सदा-सदा के ठिए तुझे अपने वश में कर ले, शीघ्र इसके चंगुल से निकल, इसका
गुलाम होने से बच। दौर्मनस्य के इस उठते हुए गर्द-गुब्बार पर प्रीति-प्यार की
माधुरी वर्षा कर, मंगल-मैत्री की विपुल बौछार कर। और इसका शमन कर। शमन
कर! शमन कर! ताकि तू भी प्रसन्नतापूर्वक कह सके -

_सो मे उप्पज्जि नो मुच्चि, कोधो दुम्मेधगोचरो।
(जातक १. चूलबीधि जातक गाथा ५६)_

वह दुष्ट क्रोध मुझमें उत्पन्न तो हुआ, पर मुझे अपने वशीभूत न कर सका।
वशीभूत न कर सका। क्रोध तो मूर्खों की ही गोचरभूमि है।

Sunday, 2 August 2026

Happy friendship day with God and God's friend.... #NishantPandya


આ સુંદર ફોટો જોઈને મનમાં આ પંક્તિઓ સ્ફુરે છે:

​૧.

"મંદિરના દ્વારે બેઠો છે નિષ્કામ પ્રેમ,

ઈશ્વરની કરુણા જેવો છે આ અનોખો ક્ષેમ."

​૨.

"હાથમાં હાથ દે છે એ મૂંગો જીવ જ્યારે,

સમજાય કે પ્રેમની કોઈ ભાષા હોતી નથી ત્યારે."

​૩.

"તીર્થધામમાં બે જીવોનું આ સ્નેહ-મિલન,

જાણે પ્રભુને પણ પ્રિય એવું એક દ્રશ્ય પાવન."

​૪.

"એક પંજે ઈશ્વરની બંદગી, એક પંજે અબોલ પ્રીત,

મંદિરના આ પ્રાંગણમાં રચાયું અનોખું સંગીત."

Saturday, 24 January 2026

🕉️ શ્રી ગણપતિ અથર્વશીર્ષ 🕉️


🕉️ શ્રી ગણપતિ અથર્વશીર્ષ 🕉️



ૐ ભદ્રં કર્ણેભિઃ શ્રુણુયામ દેવાઃ ।
ભદ્રં પશ્યેમાક્ષભિર્યજત્રાઃ ।
સ્થિરૈરઙ્ગૈસ્તુષ્ટુવાંસસ્તનૂભિઃ ।
વ્યશેમ દેવહિતં યદાયુઃ ॥
ૐ સ્વસ્તિ ન ઇન્દ્રો વૃદ્ધશ્રવાઃ ।
સ્વસ્તિ નઃ પૂષા વિશ્વવેદાઃ ।
સ્વસ્તિ નસ્તાર્ક્ષ્યો અરિષ્ટનેમિઃ ।
સ્વસ્તિ નો બૃહસ્પતિર્દધાતુ ॥
ૐ શાંતિઃ શાંતિઃ શાંતિઃ ॥
ૐ નમસ્તે ગણપતયે ।
ત્વમેવ પ્રત્યક્ષં તત્ત્વમસિ ।
ત્વમેવ કેવલં કર્તાસિ ।
ત્વમેવ કેવલં ધર્તાસિ ।
ત્વમેવ કેવલં હર્તાસિ ।
ત્વમેવ સર્વં ખલ્વિદં બ્રહ્માસિ ।
ત્વં સાક્ષાદાત્માસિ નિત્યમ્ ॥
ઋતં વચ્મિ ।
સત્યં વચ્મિ ॥
અવ ત્વં મામ્ ।
અવ વક્તારમ્ ।
અવ શ્રોતારમ્ ।
અવ દાતારમ્ ।
અવ ધાતારમ્ ।
અવાનૂચાનમવ શિષ્યમ્ ।
અવ પશ્ચાત્તાત્ ।
અવ પુરસ્તાત્ ।
અવોત્તરાત્તાત્ ।
અવ દક્ષિણાત્તાત્ ।
અવ ચોર્ધ્વાત્તાત્ ।
અવાધરાત્તાત્ ।
સર્વતોઽવ મામ્ ।
પાહિ પાહિ સમન્તાત્ ॥
ત્વં વાઙ્મયસ્ત્વં ચિન્મયઃ ।
ત્વં આનંદમયસ્ત્વં બ્રહ્મમયઃ ।
ત્વં સચ્ચિદાનન્દાદ્વિતીયોઽસિ ।
ત્વં પ્રત્યક્ષં બ્રહ્માસિ ।
ત્વં જ્ઞાનમયો વિજ્ઞાનમયોऽસિ ॥
સર્વં જગદિદં ત્વત્તો જાયતે ।
સર્વં જગદિદં ત્વત્તસ્તિષ્ઠતિ ।
સર્વં જગદિદં ત્વયિ લયમેષ્યતિ ।
સર્વં જગદિદં ત્વયિ પ્રત્યેતિ ।
ત્વં ભૂમિરાપોऽનલોઽનિલો નભઃ ।
ત્વં ચત્વારિ વાક્પદાનિ ॥
ત્વં ગુણત્રયાતીતઃ ।
ત્વં અવસ્થાત્રયાતીતઃ ।
ત્વં દેહત્રયાતીતઃ ।
ત્વં કાલત્રયાતીતઃ ।
ત્વં મૂલાધારસ્થિતોऽસિ નિત્યમ્ ।
ત્વં શક્તિત્રયાત્મકઃ ।
ત્વાં યોગિનો ધ્યાયન્તિ નિત્યમ્ ।
ત્વં બ્રહ્મા ત્વં વિષ્ણુસ્ત્વં રુદ્રઃ ।
ત્વં ઇન્દ્રસ્ત્વં અગ્નિસ્ત્વં વાયુઃ ।
ત્વં સૂર્યસ્ત્વં ચન્દ્રમાસ્ત્વં બ્રહ્મ ભૂર્ભુવઃ સ્વરોમ્ ॥
ગણાદિં પૂર્વમુચ્ચાર્ય વર્ણાદિં તદનન્તરમ્ ।
અનુસ્વારઃ પરતરઃ ।
અર્ધેન્દુલસિતમ્ ।
તારેણ ઋદ્ધમ્ ।
એતત્તવ મનુસ્વરૂપમ્ ।
ગકારઃ પૂર્વરૂપમ્ ।
અકારો મધ્યમરૂપમ્ ।
અનુસ્વારશ્ચાન્ત્યરૂપમ્ ।
બિન્દુરુત્તરરૂપમ્ ।
નાદઃ સંધાનમ્ ।
સંહિતા સંધિઃ ।
સૈષા ગણેશવિદ્યા ।
ગણક ઋષિઃ ।
નિચ્ચૃદ્ગાયત્રી છન્દઃ ।
ગણપતિર્દેવતા ।
ૐ ગં ગણપતયે નમઃ ॥
એકદંતાય વિદ્મહે ।
વક્રતુણ્ડાય ધીમહિ ।
તન્નો દન્તિઃ પ્રચોદયાત્ ॥
એકદંતં ચતુર્હસ્તં પાશમંકુશધારિણમ્ ।
રદં ચ વરદં હસ્તૈર્બિભ્રાણં મૂષકધ્વજમ્ ।
રક્તં લમ્બોદરં શૂર્પકર્ણકં રક્તવાસસમ્ ।
રક્તગંધાનુલિપ્તાંગં રક્તપુષ્પૈઃ સુપૂજિતમ્ ।
ભક્તાનુકમ્પિનં દેવં જગત્કારણમચ્યુતમ્ ।
આવિર્ભૂતં ચ સૃષ્ટ્યાદૌ પ્રકૃતેઃ પુરુષાત્પરમ્ ।
એવં ધ્યાયતિ યો નિત્યં સ યોગી યોગવિદ્વરઃ ॥
નમો વ્રાતપતયે ।
નમો ગણપતયે ।
નમઃ પ્રથમપતયે ।
નમસ્તેસ્તુ લમ્બોદરાયૈકદંતાય ।
વિઘ્નનાશિને શિવસુતાય ।
શ્રીવરદમૂર્તયે નમઃ ॥

रुद्राष्टकम

रुद्राष्टकम 





नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेहम्

निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोहम्

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेहं भवानीपतिं भावगम्यम्

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी

न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो

આદિત્ય હૃદય સ્તોત્ર



ॐ ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम् ॥1॥
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपगम्याब्रवीद् राममगरत्यो भगवांस्तदा ॥2
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥4॥
सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वधैनमुत्तमम् ॥5॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥6॥
सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥7॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥8॥
पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥9॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः ॥10॥
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शम्भूस्त्ष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ॥11॥
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहरकरो रविः ।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः ॥12॥
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसामपारगः ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥
आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः ।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोदभवः ॥14॥
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥15॥
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥16॥
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥17॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः ।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूरायदित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥19॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥20॥
तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥22॥
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥23 ॥
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः ॥24॥
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्ति ॥26॥
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥27॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा ।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥28॥
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥29॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत् ।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् ॥30॥
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31 ॥

॥ श्री राम रक्षा स्तोत्र ॥Shri Ram Raksha Stotrashri raam

   
॥ श्री राम रक्षा स्तोत्र ॥
Shri Ram Raksha Stotra

shri raam


श्रीगणेशायनम: ।

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।

बुधकौशिक ऋषि: ।

श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।

अनुष्टुप् छन्द: ।

सीता शक्ति: ।

श्रीमद्‌हनुमान् कीलकम् ।

श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥

॥ अथ ध्यानम् ॥

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्‌मासनस्थं । पीतं वासोवसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ॥

वामाङ्‌कारूढ-सीता-मुखकमल-मिलल्लोचनं नीरदाभं । नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डनं रामचंद्रम् ॥

॥ इति ध्यानम् ॥

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥१॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् । जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम् । स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥

रामरक्षां पठेत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम् । शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती । घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

जिव्हां विद्यानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: । स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥

करौ सीतापति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित् । मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: । ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत् ॥८॥

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: । पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत् । स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: । न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन् । नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् । य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्धय: ॥१३॥

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् । अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥१४॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: । तथा लिखितवान् प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् । अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु: ॥१६॥

तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ । पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥

फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ । पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् । रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥

आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्ग सङि‌गनौ । रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रत: पथि सदैव गच्छताम् ॥२०॥

संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा । गच्छन्‌ मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली । काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: । जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेयपराक्रम: ॥२३॥

इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: । अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥

रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम् । स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥

रामं लक्ष्मण-पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम् । काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।

राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् । वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥२६॥

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम । श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।

श्रीराम राम रणकर्कश राम राम । श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।

श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥

माता रामो मत्पिता रामचन्द्र: । स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्र: ।

सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुर् । नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा । पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम् ॥३१॥

लोकाभिरामं रणरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् । कारुण्यरूपं करुणाकरन्तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

कूजन्तं राम-रामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम् । तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे । रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।

रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहम् । रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥

इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं संपूर्णम् ॥ 

॥ श्री सीतारामचंद्रार्पणमस्तु ॥

નારાયણ કવચ



શ્રીમદ ભાગવતના છટ્ઠા સ્કંધના આઠમાં અધ્યાયમાં શ્રી નારાયણ કવચ ત્વષ્ટા ઋષિના પુત્ર વિશ્વરૂપ ઇન્દ્રને કહે છે.

વિશ્વરૂપ કહે છે જયારે ભયનો સમય પાસે આવ્યો હોય ત્યારે મનુષ્યે હાથપગ ધોઈ આચમન કરી ઉત્તર દિશા તરફ મુખ રાખી નારાયણ કવચનો પાઠ કરવો. જયારે ભય આવે ત્યારે શ્રી નારાયણ રૂપનામ બખતર ધારણ કરવું.

નારાયણ કવચ:

ગરુડની પીઠ પર ચરણકમળ ધારણ કરનારા, આઠ સિદ્ધિઓવાળા, આઠ બાહુઓવાળા અને તે આઠ બાહુઓ વિષે શંખ, ચક્ર, ઢાલ, ગદા, બાણ, ધનુષ તથા પાશને ધારણ કરનારા શ્રીહરિ મારી સર્વ પ્રકારે રક્ષા કરો.

જળમાં મતસ્યાવધારી ભગવાન જલજંતુઓથી તથા વરુણના પાશથી મારી રક્ષા કરો. માયાથી બટુક બનેલા વામનજી સ્થળમાં મારી રક્ષા કરો. શ્રીવિશ્વરૂપ ત્રિવિક્રમ ભગવાન આકાશમાં મારી રક્ષા કરો.

અસુરના અધિપતિઓના શત્રુ ભગવાન નૃસિંહ સંકટકારક વનવગડાઓમાં તથા સંગ્રામ વગેરેમાં મારી રક્ષા કરો કે જે નૃસિંહનાં ખડખડાટ હાસ્યના શબ્દથી દિશાઓ ગાજી ઉઠી હતી અને ગર્ભિણીઓના ગર્ભ પડી ગયા હતા.

પોતાની દાઢથી પાતાળમાંથી પૃથ્વીનો ઉદ્ધાર કરનારા ભગવાન યગ્નમૂર્તિ વરાહ માર્ગમાં મારી રક્ષા કરો; પરશુરામ પર્વતોના શિખરોમાં મારી રક્ષા કરો.; અને ભરતના મોટાભાઈ રામ તથા લક્ષ્મણ પ્રવાસમાં અમારી રક્ષા કરો.

અભિચારી વગેરે સર્વ ઉગ્ર ધર્મમાંથી તથા પ્રમાદમાંથી નારાયણ ભગવાન રક્ષા કરો. નર ભગવાન ગર્વથી રક્ષા કરો. યોગના સ્વામી દત્તાત્રય યોગભ્રંશથી મારી રક્ષા કરો. ગુણનાં સ્વામી કપિલદેવ કર્મના બંધનથી મારી રક્ષા કરો.

સનત્કુમાર કામદેવથી મારી રક્ષા કરો. હયગ્રીવ ભગવાન રસ્તામાંથી જતા દેવતાઓને પ્રણામ ન કરવા રૂપી અપરાધમાંથી મારી રક્ષા કરો. દેવર્ષિ શ્રેષ્ઠ મુનિ નારદ ભગવાનની પૂજામાં જે કોઈ વિઘ્ન નડે, તેનાથી મારી રક્ષા કરો અને કુર્મ અવતાર શ્રીહરિ સર્વ પ્રકારના નરકમાંથી મારી રક્ષા કરો.

ભગવાન ધન્વન્તરી કુપથ્યમાંથી મારી રક્ષા કરો. જીતેન્દ્રિય ભગવાન ઋષભદેવ કામ ક્રોધ આદિનાં ભયમાંથી મારી રક્ષા કરો. યગ્યાવતારી ભગવાન લોકાપવાદથી મારી રક્ષા કરો. બળભદ્ર મનુષ્ય તરફથી થનારા ઉપદ્રવોમાંથી રક્ષા કરો. અને શેષનાગ ક્રોધાવેશ નામના સર્પગણોથી મારી રક્ષા કરો.

ભગવાન વેદવ્યાસ અજ્ઞાનથી મારી રક્ષા કરો. ભગવાન બુદ્ધ પ્રમાદવાળા પાખંડીઓના ટોળામાંથી મારી રક્ષા કરો. ધર્મની રક્ષા કરવા માટે અવતાર લેનાર ભગવાન કલ્કી કાળનાં મળરૂપ કળીયુગથી મારી રક્ષા કરો.

કેશવ ભગવાન પ્રભાતમાં ગદાથી મારી રક્ષા કરો. વેણુધર ભગવાન ગોવિંદ આ સંકટકાળમાં મારી રક્ષા કરો. ઉદાત્તશક્તિ નારાયણ ભગવાન પ્રાહનકાળમાં મારી રક્ષા કરો. અને ચક્રધારી ભગવાન વિષ્ણુ મધ્યાન કાળમાં મારી રક્ષા કરો.

મધુ દૈત્યને મારનારા ઉગ્ર ધનુર્ધારી ભગવાન વિષ્ણુ ત્રીજા પહોરમાં મારી રક્ષા કરો. બ્રહ્મા, વિષ્ણુ અને રુદ્ર એ ત્રણ મુર્તિવાળા ભગવાન માધવ સાયંકાળમાં મારી રક્ષા કરો. ઇન્દ્રિયોના સ્વામી હૃષીકેશ ભગવાન પ્રદોષકાળમાં મારી રક્ષા કરો. પદ્મનાભ ભગવાન કેવળ એક અર્ધરાતથી પહેલા કાળમાં અને અર્ધરાતે મારી રક્ષા કરો.

શ્રીવત્સનું જેને ચિહ્ન છે એવા ઈશ શ્રી વિષ્ણુ પાછલી રાતે મારી રક્ષા કરો. તલવારધારી ભગવાન જનાર્દન મળસકામાં મારી રક્ષા કરો. દામોદર ભગવાન સંપૂર્ણ સંધ્યાઓમાં મારી રક્ષા કરો. કાળમૂર્તિ ભગવાન વિશ્વેષર સૂર્યોદય પહેલાનાં કાળમાં મારી રક્ષા કરો.

હે પ્રલય સમયના અગ્નિ જેવી તીક્ષણ ધારવાળા ચક્ર ! ભગવાનથી મૂકવામાં આવે તો ચારે તરફ ફરીને અગ્નિ જેમ ખડની ગંજીને તુરત જ બાળી નાખે તેમ શત્રુના સૈન્યને તુરત બાળી નાખો.

હે વજ્રના જેવા તીક્ષ્ણ સ્પર્શવાળા તણખાઓથી ભરેલી ગદા ! તમે ભગવાનને વહાલી છો. તમે કુષ્માંડ, યક્ષ, રાક્ષસ, ભૂત તથા ગ્રહોને ભૂકો કરી નાખો તથા શત્રુઓના ચૂરેચૂરા કરી નાખો.

હે પાંચજન્ય શંખરાજ ! શ્રી કૃષ્ણ ભગવાને ફૂંકવાથી મહા ભયંકર શબ્દ કરીને તેમના શત્રુઓના હૃદયને કંપાવતા રાક્ષસો, પ્રમથો, પ્રેતગણ , માંતૃકાગણ, પિશાચ, બ્રહ્મ રાક્ષસ તથા બીજા ઘોર દૃષ્ટિવાળાઓને નસાડી મૂકો.

હે તીક્ષ્ણ ધારવાળી તલવાર! તમે ભગવાનના હસ્ત દ્વારા પ્રેરાઈને મારા શત્રુઓના સૈન્યને કાપી નાખો. હે ચંદ્રમાં જેવી સો ફૂદડીવાળી ઢાલ ! તમે શત્રુઓની આંખને ઢાંકી દો તથા પાપી નજરવાળાઓની પાપી દૃષ્ટિ હરિ લો.

અમને ગ્રહોથી, કેતુઓથી, મનુષ્યોથી, સર્પોથી, દાઢવાળા પ્રાણીઓથી તથા પાપોથી જે ભય થાય છે તે સૌ તથા જેઓ અમારા સુખમાં વિઘ્ન કરનારા છે તે સર્વે ભગવાનના નામરૂપી અસ્ત્રના કીર્તનથી તુરત જ ભય પામો.

બૃહદ્રથંતર વગેરે સામના સ્તોત્રોથી સ્તુતિ કરાતા વેદમય તથા સમર્થ ગરુડ ભગવાન સર્વ સંકટોમાં મારી રક્ષા કરો તથા વિશ્વ્ક્સેન ભગવાન પણ પોતાના નામો લેવા વડે સર્વ સંકટોમાંથી મારી રક્ષા કરો.

શ્રીહરિના નમ, રૂપ, વાહન અને આયુધો, સર્વ આપત્તિઓમાંથી અમારી રક્ષા કરો.ભગવાનના મુખ્ય પાર્ષદો અમારા બુદ્ધિ, ઇન્દ્રિય, મન તથા પ્રાણની રક્ષા કરો.

આ સાકાર નિરાકાર જે કઈ જગત છે સર્વ ભગવાનનું જ સ્વરૂપ છે, આ સત્યથી મારા સર્વ ઉપદ્રવો નાશ પામો.

અભેદ દૃષ્ટિવાળા મનુષ્યોને ભગવાન પોતે ભેદરહિત જોવામાં આવે છે તો પણ તે પોતાની માયાથી આભૂષણો, આયુધો તથા ચિહ્ન નામની શક્તિઓને ધારણ કરે છે. તે સત્ય પ્રમાણ વડે જ સર્વજ્ઞ તથા સર્વવ્યાપક ભગવાન શ્રીહરિ સર્વ પ્રકારના રૂપો વડે સર્વદા અમારી રક્ષા કરો.

નામની ગર્જનાથી લોકોના ભયનો નાશ કરનાર તથા પોતાના દિગ્ગજ, ઝેર, શસ્ત્ર, પાણી, વાયુ, અગ્નિ વગેરેના પ્રભાવે ગળી જનારા નરસિંહ ભગવાન દિશાઓમાં, ખૂણામાં ઊંચે નીચે, અંદર, બહાર તથા ચોતરફ અમારી રક્ષા કરો.



નારાયણ કવચનું ફળકથન:

વિશ્વરૂપ કહે છે હે ઇન્દ્ર ! આ નારાયણ કવચ તમારી આગળ કહ્યું જે ધારણ કરવાથી તમે શ્રમ વિના અસુરોના અધિપતિઓને જીતશો. આ નારાયણ કવચને ધારણ કરનારો મનુષ્ય નેત્રથી જેનાં તરફ જુએ અથવા તો પગ વડે જેને જેને અડકે તે તુરત જ ભયમાંથી છૂટે છે. આ કવચ ભણનાર પુરુષને કોઈ દિવસ રાજાઓ તરફથી, ચોર તરફથી, ગ્રહો થકી, વ્યાઘ્ર આદિ તરફથી તથા બીજા કોઈ તરફથી ભય રહેતો નથી.



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॥રાજોવાચ॥

યયા ગુપ્તઃ સહસ્ત્રાક્ષઃ સવાહાન્ રિપુસૈનિકાન્। ક્રીડન્નિવ વિનિર્જિત્ય ત્રિલોક્યા બુભુજે શ્રિયમ્॥1॥
ભગવંસ્તન્મમાખ્યાહિ વર્મ નારાયણાત્મકમ્। યથાસ્સ્તતાયિનઃ શત્રૂન્ યેન ગુપ્તોસ્જયન્મૃધે॥2॥

પરીક્ષિત રાજાએ કહ્યું : હે મહારાજ – વિદ્યાથી રક્ષણ પામેલા ઇન્દ્ર દેવે રમત માત્રમાં સર્વસ્વનું હરણ કરનારા શત્રુઓની સેનાને યુદ્ધમાં જીતી લીધી અને ત્રેલોક્યનું રાજ્ય ભોગવ્યું તે ‘ નારાયણ કવચ ‘ રૂપ વિદ્યા મને કહો. સાથે એ પણ બતાવો કે તેને તેનાથી સુરક્ષિત થઈને રણભૂમિમાં કેવી રીતે આક્રમણકારી શત્રુઓ ઉપર વિજય મેળવ્યો. (1)(2)


॥શ્રીશુક ઉવાચ॥

વૃતઃ પુરોહિતોસ્ત્વાષ્ટ્રો મહેંદ્રાયાનુપૃચ્છતે। નારાયણાખ્યં વર્માહ તદિહૈકમનાઃ શૃણુ॥3॥

શ્રી શુકદેવજીએ કહ્યું : પુરોહિત બનેલા વિશ્વરૂપે પ્રશ્ન પૂછનાર ઇન્દ્ર દેવને જે નારાયણ કવચ કહેલું તર હવે એકાગ્ર મનથી સાંભળો.


વિશ્વરૂપ ઉવાચધૌતાંઘ્રિપાણિરાચમ્ય સપવિત્ર ઉદઙ્ મુખઃ। કૃતસ્વાંગકરન્યાસો મંત્રાભ્યાં વાગ્યતઃ શુચિઃ॥4॥
નારાયણમયં વર્મ સંનહ્યેદ્ ભય આગતે। પાદયોર્જાનુનોરૂર્વોરૂદરે હૃદ્યથોરસિ॥5॥
મુખે શિરસ્યાનુપૂર્વ્યાદોંકારાદીનિ વિન્યસેત્। ઓં નમો નારાયણાયેતિ વિપર્યયમથાપિ વા॥6॥


વિશ્વરૂપે કહ્યું : હે દેવરાજ ઇન્દ્ર ! ભયનો પ્રસંગ આવી પડે ત્યારે નારાયણ કવચ ધારણ કરી પોતાના શરીરની રક્ષા કરી લેવી જોઈએ. એની વિધિ આ પ્રમાણે છે કે પહેલા હાથ પગ ધોઈ આચમન કરવું.પછી હાથમાં કુશની વીંટી ધારણ કરી ઉત્તર તરફ મુખ રાખી બેસી જવું. પછી કવચ ધારણ પર્યંત બીજું કાંઈ પણ ન બોલવાનો નિશ્ચય કરી પવિત્રતાથી ” ૐ નમો નારાયાણાય ” અને ” ૐ નમો ભગવતે વાસુદેવાય ” આ મંત્રો દ્વારા હૃદયાદી અંગ ન્યાસ તથા અંગૂષ્ઠાદિકર ન્યાસ કરવા. પહેલા ” ૐ નામો નારાયાણાય ” આ અષ્ટાક્ષર મંત્રના ૐ વગેરે આઠ અક્ષરોના ક્રમશઃ બે પગ, બે ગોઠણ,બે સાથળ,પેટ,હૃદય, વક્ષ સ્થળ, મુખ અને મસ્તકમાં ન્યાસ કરવા અથવા પૂર્વોક્ત મંત્રના ય કારથી શરૂ કરી ૐ કાર પર્યંત આઠ અક્ષરોના મસ્તકથી આરંભ કરી તે જ આઠ અંગોમાં ઉલટા ક્રમથી ન્યાસ કરવા.(4)(5)(6)

કરન્યાસં તતઃ કુર્યાદ્ દ્વાદશાક્ષરવિદ્યયા। પ્રણવાદિયકારંતમંગુલ્યંગુષ્ઠપર્વસુ॥7॥

પછી ૐ નમો ભગવતે વાસુદેવાય એ દ્વાદશાક્ષર મંત્રના ૐ કારથી સંપુટ કરેલા એક એક અક્ષરનો આંગળીઓમાં અને અંગુઠાની અણીઓમાં ન્યાસ કરવો. જમણા હાથની તર્જની થી માંડી ડાબા હાથની તર્જની સુધીની આઠ આંગળીઓમાં આઠ અક્ષરોનો અને બે અંગુઠાના ઉપરના તથા નીચેના ચાર સાંધાઓમાં બાકી રહેલા ચાર અક્ષરોનો ન્યાસ કરવો.(7)

ન્યસેદ્ હૃદય ઓંકારં વિકારમનુ મૂર્ધનિ। ષકારં તુ ભ્રુવોર્મધ્યે ણકારં શિખયા દિશેત્॥8॥
વેકારં નેત્રયોર્યુંજ્યાન્નકારં સર્વસંધિષુ। મકારમસ્ત્રમુદ્દિશ્ય મંત્રમૂર્તિર્ભવેદ્ બુધઃ॥9॥
સવિસર્ગં ફડંતં તત્ સર્વદિક્ષુ વિનિર્દિશેત્। ઓં વિષ્ણવે નમ ઇતિ ॥10॥

પછી ” ૐ વિષણવે નમઃ ” એ મંત્રના “ૐ” કારનો હૃદયમાં, “વિ” કારનો મસ્તકમાં, “ષ” કારનો ભ્રકુટીના મધ્યમાં, “ણ” કારનો શીખામાં , “વે” કારનો બન્ને નેત્રમાં અને “ન” કારનો સર્વ સાંધાઓમાં ન્યાસ કરવો, બાકી રહેલા “મ” કારનો ૐ મહ્ અસ્ત્રાય ફટ કરી દિગબંધ જોડવો. આ પ્રમાણે ન્યાસ કરવાથી આ વિધિને જાણવાવાળો પુરુષ મંત્ર સ્વરૂપ થઈ જાય છે.(8)(9)(10)


આત્માનં પરમં ધ્યાયેદ ધ્યેયં ષટ્શક્તિભિર્યુતમ્। વિદ્યાતેજસ્તપોમૂર્તિમિમં મંત્રમુદાહરેત ॥11॥

ત્યાર પછી સમગ્ર ઐશ્વર્ય , ધર્મ, યશ, લક્ષ્મી, જ્ઞાન અને વૈરાગ્યથી પરિપૂર્ણ ઇષ્ટદેવ ભગવાનનું ધ્યાન કરવું અને પોતાને પણ તદ્રુપ જ સમજે. પછી વિદ્યા, તેજ અને તપ સ્વરૂપ આ કવચનો પાથ કરવો.(11)


ઓં હરિર્વિદધ્યાન્મમ સર્વરક્ષાં ન્યસ્તાંઘ્રિપદ્મઃ પતગેંદ્રપૃષ્ઠે। દરારિચર્માસિગદેષુચાપાશાન્ દધાનોસ્ષ્ટગુણોસ્ષ્ટબાહુઃ ॥12॥

 પાશાત્। સ્થલેષુ માયાવટુવામનોસ્વ્યાત્ ત્રિવિક્રમઃ ખેઽવતુ વિશ્વરૂપઃ ॥13॥

ૐ ગરુડજીની પીઠ ઉપર ચરણ ધરીને રહેલા, અણિમાદિ આઠ સિધ્ધિઓથી સેવીત, આઠ બાહુ વાળા શંખ-ચક્ર-ઢાલ-તલવાર-ગદા-બાણ-ધનુષ અને પાશને ધારણ કરતા હરિ ભગવાન મારી સર્વ પ્રકારની રક્ષા કરજો.(12)


દુર્ગેષ્વટવ્યાજિમુખાદિષુ પ્રભુઃ પાયાન્નૃસિંહોઽસુરયુથપારિઃ। વિમુંચતો યસ્ય મહાટ્ટહાસં દિશો વિનેદુર્ન્યપતંશ્ચ ગર્ભાઃ ॥14॥


કિલ્લા, વન તથા રણભૂમિ વગેરે સંકટમાં સ્થળોમાં મોટા દૈત્યોનાં સેના પતિઓના શત્રુ નૃસિંહ ભગવાન રક્ષા કરજો. એ ભગવાન જ્યારે મોટા શબ્દથી ખડખડ હસ્યાં હતા ત્યારે દિશાઓમાં ગર્જના ઉઠી હતી અને દૈત્ય પત્નીઓના ગર્ભો પડી ગયા હતાં.(14)

રક્ષત્વસૌ માધ્વનિ યજ્ઞકલ્પઃ સ્વદંષ્ટ્રયોન્નીતધરો વરાહઃ। રામોઽદ્રિકૂટેષ્વથ વિપ્રવાસે સલક્ષ્મણોસ્વ્યાદ્ ભરતાગ્રજોસ્સ્માન્ ॥15॥

પોતાની દાઢ વડે પૃથ્વીને ધારણ કરનાર અને યજ્ઞોરૂપી અવ્યવ વાળા વરાહ ભગવાન માર્ગમાં રક્ષા કરજો. પર્વતોના શિખરો ઉપર પરશુરામ અને પ્રવાસમાં ભરતના મોટા ભાઈ રામચંદ્રજી લક્ષમણ સહિત મારી રક્ષા કરજો.(15)


મામુગ્રધર્માદખિલાત્ પ્રમાદાન્નારાયણઃ પાતુ નરશ્ચ હાસાત્। દત્તસ્ત્વયોગાદથ યોગનાથઃ પાયાદ્ ગુણેશઃ કપિલઃ કર્મબંધાત્ ॥16॥

મારણ-મોહન આદિ ભયંકર અભિચારો અને ગફલતમાંથી નારાયણ રક્ષા કરજો. ગર્વથી નર ભગવાન, યોગ ભ્રંશથી યોગેશ્વર દત્તાત્રેય અને ગુણોના સ્વામી કપિલદેવજી કર્મના બંધનથી રક્ષા કરજો.(16)


સનત્કુમારો વતુ કામદેવાદ્ધયશીર્ષા માં પથિ દેવહેલનાત્। દેવર્ષિવર્યઃ પુરૂષાર્ચનાંતરાત્ કૂર્મો હરિર્માં નિરયાદશેષાત્ ॥17॥

ભગવાન સનતકુમારો કામદેવથી રક્ષા કરજો અને માર્ગમાં દેવોને નમસ્કાર ન કરવા રૂપી અપરાધથી હયગ્રીવ ભગવાન રક્ષા કરજો. નારદજી સેવામાં થતા અપરાધોથી રક્ષા કરજો.સર્વ પ્રકારના નરકથી કચ્છપાવતાર ભગવાન મારી રક્ષા કરજો.(17)

ધન્વંતરિર્ભગવાન્ પાત્વપથ્યાદ્ દ્વંદ્વાદ્ ભયાદૃષભો નિર્જિતાત્મા। યજ્ઞશ્ચ લોકાદવતાજ્જનાંતાદ્ બલો ગણાત્ ક્રોધવશાદહીંદ્રઃ ॥18॥

દ્વૈપાયનો ભગવાનપ્રબોધાદ્ બુદ્ધસ્તુ પાખંડગણાત્ પ્રમાદાત્। કલ્કિઃ કલે કાલમલાત્ પ્રપાતુ ધર્માવનાયોરૂકૃતાવતારઃ ॥19॥

અજ્ઞાનથી વેદવ્યાસ ભગવાન, પાંખડીઓથી અને પ્રમાદથી બુદ્ધાવતાર અને ધર્મ રક્ષાને માટે મહાન અવતાર ધારણ કરવાવાળા ભગવાન કલ્કિ પાપબહુલ કાલિકાલના દોષોથી મારી રક્ષા કરજો.(19)


માં કેશવો ગદયા પ્રાતરવ્યાદ્ ગોવિંદ આસંગવમાત્તવેણુઃ। નારાયણ પ્રાહ્ણ ઉદાત્તશક્તિર્મધ્યંદિને વિષ્ણુરરીંદ્રપાણિઃ ॥20॥

સવારમાં ગદાથી ભગવાન કેશવ, વેણુધારી ગોવિંદ ભગવાન થોડો દિવસ ચઢી આવે ત્યારે, બરછી-ધારી નારાયણ પૂર્વાહન કાળમાં અને ભગવાન વિષ્ણુ ચક્રરાજ સુદર્શન લાઇ મધ્યાહન કાળમાં રક્ષા કરજો.(20)
દેવોસ્પરાહ્ણે મધુહોગ્રધન્વા સાયં ત્રિધામાવતુ માધવો મામ્। દોષે હૃષીકેશ ઉતાર્ધરાત્રે નિશીથ એકોસ્વતુ પદ્મનાભઃ ॥21॥

ઉગ્ર ધનુષ્ય ધારી મધુસુદન ભગવાન ત્રીજા પહોરે બ્રહ્મા, વિષ્ણુ, રુદ્ર એ ત્રણ મૂર્તિવાળા માધવ ભગવાન સાયનકાળે, સૂર્યાસ્ત પછી હ્યષીકેશ અને મધરાતે તથા મધરાત પહેલા એકલા પદ્મનાભ ભગવાન રક્ષા કરજો.(21)



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Sunday, 18 January 2026

શિક્ષણજગતના તેજસ્વી સિતારા: શ્રી યોગેશકુમાર પંડ્યાની ગૌરવશાળી મજલ

શિક્ષણજગતના તેજસ્વી સિતારા: શ્રી યોગેશકુમાર પંડ્યાની ગૌરવશાળી મજલ


શિક્ષક એ માત્ર પાઠ્યપુસ્તકનો પાઠ ભણાવનાર નથી, પરંતુ વિદ્યાર્થીઓના જીવનમાં સંસ્કાર, શિસ્ત, સ્ફૂર્તિ અને સર્જનાત્મકતાનું બીજ વાવનાર દીવો છે. એવા જ એક દીવાદાંડી સમાન વ્યક્તિત્વ છે — શ્રી યોગેશકુમાર નરેન્દ્રભાઈ પંડ્યા, ઉપશિક્ષક, શ્રી બાંઠીવાડા જૂથ પ્રાથમિક શાળા, મેઘરજ તાલુકાના અરવલ્લી જિલ્લામાં.


"શિક્ષક કભી સાધારણ નહીં હોતા, પ્રલય ઓર નિર્માણ ઉસકી ગોદ મેં પલતે હૈ" – આ ઉક્તિને સાર્થક કરતા શ્રી યોગેશ પંડ્યા, એક કર્મઠ શિક્ષકે આજે શિક્ષણ જગતમાં પોતાની વિશિષ્ટ ઓળખ ઊભી કરી છે. 


આપણે વાત કરી રહ્યા છીએ શ્રીબાંઠીવાડા જૂથ પ્રાથમિક શાળાના ઉપશિક્ષક શ્રી યોગેશકુમાર નરેન્દ્રભાઈ પંડ્યા વિશે.

 ° શિક્ષણ, સેવા અને સંસ્કારોનો સેતુ: 

   શ્રી યોગેશ પંડ્યા, એક સ્વાતંત્ર્ય સેનાનીના પૌત્ર. જેમની રગોમાં દેશપ્રેમ અને રાષ્ટ્ર સેવાનું રક્ત દોડી રહ્યું છે. પિતાશ્રી સ્વ. નરેન્દ્રભાઈ પંડ્યા પણ એક શ્રેષ્ઠ શિક્ષક હતા. લોકસેવક હતા. માતા પણ શ્રેષ્ઠ શિક્ષક હતા. માતાના ગર્ભમાંથી જ યોગેશભાઈએ શિક્ષક બનવાના સંસ્કારો કેળવી લીધા હતા કારણકે યોગેશ પંડ્યા જ્યારે માતા હરીશબાળાના ગર્ભમાં હતા ત્યારે માતાએ પ્રાથમિક શિક્ષક તાલીમનો અભ્યાસ મેળવ્યો હતો. માતા પિતા પણ એક આદર્શ શિક્ષક દંપતિ હતા. માતાપિતાએ આજીવન શિક્ષણ અને સેવાના કાર્યો કર્યા છે. યોગેશ પંડ્યાના માતા કે જેઓ સંગીત દ્વારા શિક્ષણના હિમાયતી અને આકાશવાણી કલાકાર હતા. માતાપિતાના સંસ્કારોને સાથે લઈને ચાલનાર શ્રી યોગેશ પંડ્યા માટે આવા સદગુણો સહજ છે. 



 ° ૨૪ વર્ષનું અવિરત જ્ઞાનતપ:- 

     છેલ્લા ૨૪ વર્ષથી શાળામાં શૈક્ષણિક પ્રવૃત્તિઓમાં સ્થિર રહીને બાળકોના ભવિષ્યને કંડારવું એ આજના સમયમાં ખૂબ જ વિરલ ઘટના છે. શ્રી યોગેશકુમારે બાંઠીવાડા પ્રાથમિક શાળાને માત્ર પોતાની નોકરીનું સ્થળ નહીં, પણ પોતાની કર્મભૂમિ બનાવી છે. ૨૪ વર્ષની આ દીર્ઘકાલીન સેવા દરમિયાન તેમણે હજારો વિદ્યાર્થીઓના જીવનમાં જ્ઞાનનો ઉજાસ પાથર્યો બાળકોનો પ્રેમ જીતીને બાળકોના હૃદય સુધી પહોંચ્યા છે. બાળકોની સાથે ગાવુ, ખાવુ, રમવુ ભણવુ - ભણાવવુ અને શીખવુ - શીખવવું અને બાળદેવો સાથે લીન રહેવું. “ મને જે આવડે છે તે મારા બાળકોને આવડવું જ જોઈએ, જે મને ઓછું ફાવે છે તે પણ હું શીખીને મારા બાળકોને પ્રવીણ બનાવીશ. “ આ વિધાન સાર્થક કરવા સતત મથતાં રહે છે. 


 ° બહુમુખી પ્રતિભાના સ્વામી:- 

કોઈએક વિશિષ્ટ પ્રતિભા સાથે પ્રતિભાશાળી હોવું એ ઈશ્વરની વિશિષ્ટ ભેટ છે જ્યારે બહુમુખી પ્રતિભાના સ્વામી હોવું એ ઈશ્વરની આપણી સાથેની સતત હાજરી છે. 

શ્રી યોગેશભાઈ માત્ર પાઠ્યપુસ્તકો પૂરતા મર્યાદિત શિક્ષક નથી, પણ તેઓ એક સાચા 'કેળવણીકાર' છે. તેમની પ્રતિભાના અનેક પાસાઓ છે: જેમકે, 

રમતગમત અને યોગ: વિદ્યાર્થીઓના શારીરિક અને માનસિક સ્વાસ્થ્ય માટે તેઓ હંમેશા કાર્યરત રહે છે.

કલા અને સંગીત: ગીત, સંગીત અને કલાના માધ્યમથી શિક્ષણને રસપ્રદ બનાવવાની તેમની કળા અજોડ છે. બાળકોને સંગીત દ્વારા શિક્ષણના હિમાયતી છે. 

વિજ્ઞાન અને ગણિત: જટિલ વિષયોને પ્રવૃત્તિઓ દ્વારા સરળ બનાવી બાળકોમાં વૈજ્ઞાનિક અભિગમ કેળવવો એ તેમની ખાસિયત છે. 

જાદુ કલાના પ્રયોગો: 

        બાળકોને આશ્ચર્ય સાથે શિક્ષણ આપવા માટે તેઓ જાદુના પ્રયોગોનો પણ કુશળતાપૂર્વક ઉપયોગ કરે છે. સાથે સાથે ગામડાઓમાં પ્રચલિત અંધશ્રદ્ધાઓને જાદુના ખેલ દ્વારા દૂર કરવાનો પ્રયત્ન કરી દરેકની સાથે જોડાયેલું વિજ્ઞાન છે જેની યોગ્ય સમજ આપે છે. 


 ° સફળતાના શિખરો: 

     એવોર્ડની હેટ્રિક….

      તેમની નિષ્ઠા અને મહેનતની સુવાસ છેક ગાંધીનગર અને ચિત્રકૂટ સુધી પહોંચી છે. છેલ્લા ત્રણ વર્ષમાં તેમને મળેલા સન્માન તેમની શ્રેષ્ઠતાની સાબિતી પૂરી પાડે છે:

વર્ષ ૨૦૨૩: તાલુકા કક્ષાના શ્રેષ્ઠ શિક્ષકનો એવોર્ડ.
વર્ષ ૨૦૨૪: જિલ્લા કક્ષાના શ્રેષ્ઠ શિક્ષકનો એવોર્ડ.
વર્ષ ૨૦૨૬: 'ચિત્રકૂટ એવોર્ડ’ 

       ૧૪ જાન્યુઆરી, ૨૦૨૬ના પવિત્ર દિવસે પ્રસિદ્ધ રામકથાકાર પૂજ્ય મોરારીબાપુના હસ્તે 'ચિત્રકૂટ એવોર્ડ' આપીને તેમનું ભવ્ય સન્માન કરવામાં આવ્યું. પૂજ્ય બાપુના હસ્તે મળેલો આ એવોર્ડ માત્ર યોગેશભાઈ માટે જ નહીં, પણ સમગ્ર અરવલ્લી જિલ્લા અને શિક્ષણ જગત માટે ગૌરવની ક્ષણ છે. 2026નો આ ચિત્રકૂટ એવોર્ડ તેમની સફળતાની હેટ્રિક સમાન છે.


 ° આદર્શ દંપતી અને સહયોગી જીવનસાથી:

    કહેવાય છે કે ' દરેક સફળ પુરુષ પાછળ એક સ્ત્રીનો હાથ હોય છે.' યોગેશભાઈના કિસ્સામાં તેમના ધર્મપત્ની શ્રીમતી ભાવનાબેન જોશી તેમના પડછાયા બનીને ઊભા રહ્યા છે. ભાવનાબેન પણ એ જ શાળામાં શિક્ષિકા તરીકે ફરજ બજાવે છે અને યોગેશભાઈની દરેક શૈક્ષણિક અને સામાજિક પ્રવૃત્તિમાં ખભેખભા મિલાવીને સાથ આપે છે. આ દંપતી ખરા અર્થમાં 'શિક્ષક દંપતી'નો આદર્શ પૂરો પાડે છે.


° અન્ય સિદ્ધિઓ: 

  શ્રી યોગેશ પંડ્યા, તેઓના વિસ્તારના પ્રસિદ્ધ યોગી છે. દર વર્ષે યોગ દિવસે તેઓના સાનિધ્યમાં આખું મેઘરજ ગામ યોગ કરવા આવે છે.

સાથે સાથે તેઓ એક સારા ક્રિકેટર પણ છે. તેમના જિલ્લાની ટીમમાં તેઓ પૂર્વ કેપ્ટન તરીકે કામ કરતા હતા. તેઓના નેતૃત્વ હેઠળ અનેક વખત ટીમ વિજેતા બનેલ છે.

      શિક્ષણ ક્ષેત્રે તેઓએ ચાલુ વર્ષે ચિલ્ડ્રન યુનિવર્સિટી ખાતે ' ગિજુભાઈ બધેકા અને NET 2020 ‘ વિષય પર રિસર્ચ પેપર રજૂ કરી નૅશનલ કોન્ફરન્સમા ભાગ લીધો હતો. શિક્ષણમાં તેઓએ ક્રિયાત્મક સંશોધનો પણ કર્યા છે.

ભાષા વિષય શિક્ષક તરીકેની તેઓની કાબેલિયતને લીધે તેઓશ્રી આર. પી. ની રાજ્ય કક્ષાની તાલીમોમાં જઈ માસ્ટર ટ્રેનર્સ તૈયાર કરે છે. 

ગીત સંગીતના શોખીન શ્રી યોગેશ પંડ્યાની યુ ટ્યૂબ ચેનલ પર તેઓના અનેક ગીતો ગાયેલા છે. બાળકો સાથે ગાયેલી કવિતાઓ, પ્રાર્થનાઓ અને ભજનો પણ છે. સ્ટાર મેકર પર 6000 કરતાં વધારે ગીતો ગાયેલા છે. 

માતા પિતા તરફથી મળેલ ધાર્મિક સંસ્કારોની ગરિમા જાળવી રાખનાર, યોગેશ પંડ્યા મેઘરજ ગામમાં, પોલીસ સ્ટેશન થતી નવરાત્રી દરમિયાન માતાજીની સ્તુતિ અને આરતી ગાન છેલ્લા વીસેક વર્ષથી કરે છે. 


  યોગેશકુમાર પંડ્યાએ પોતાની કર્તવ્યનિષ્ઠાથી બાંઠીવાડા ગામ અને શાળાનું નામ આખા ગુજરાતમાં રોશન કર્યું છે. તેમની આ સફર આવનારા અનેક યુવાન શિક્ષકો માટે પ્રેરણા સ્ત્રોત બની રહેશે. શિક્ષણ પ્રત્યેનું તેમનું આ સમર્પણ અવિરત ચાલતું રહે તેવી અનેક શુભેચ્છાઓ!

શ્રી યોગેશકુમાર પંડ્યાને ચિત્રકૂટ એવોર્ડ બદલ ખૂબ ખૂબ અભિનંદન!