मरणानुस्मृति का अभ्यास करें, मरणानुस्मृति का अभ्यास हमारे लिए अत्यंत कल्याणकारी है। 🌸
मेरे प्यारे साधक-साधिकाओ !
मरणानुस्मृति का अभ्यास मृत्यु की याद बनाए रखने का अभ्यास है। जब तक मृत्यु की याद बनी रहती है, तब तक चित्त में अनायास विरक्ति पैदा होती है , अनासक्ति पैदा होती है, प्रज्ञा प्रबल होती है। सही प्रकार से मरणानुस्मृति कैसे की जाय, इसके लिए हमें समझना होगा कि गलत प्रकार की मरणानुस्मृति क्या है और उससे कैसे बचें।
🌷 यदि मेरी मरणानुस्मृति किसी प्रिय जन की मृत्यु पर आधारित है और मैं उस मरणानुस्मृति से उसी व्यथित-व्याकुल हूं, जिस प्रकार कोई माँ अपने इकलौते बेटे की मृत्यु की याद में होती है तो मेरी यह मरणानुस्मृति सही नहीं है, गलत है।
यदि मेरी मरणानुस्मृति किसी अप्रिय जन की मृत्यु पर आधारित है और मैं उससे वैसे ही प्रमुदित होता हूं, जैसे कि कोई व्यक्ति अपने किसी बड़े दुश्मन की मौत पर होता है तो मेरी यह मरणानुस्मृति सही नहीं है, गलत है।
यदि मेरी मरणानुस्मृति किसी ऐसे व्यक्ति के मरण पर आधारित है जो कि न मुझे प्रिय है, न अप्रिय और मेरा मन धर्म संवेग-विहीन अन्यमनस्कता भरा हुआ यही चिंतन करता है कि दुनिया में बहुत जन्मते हैं और बहुत मरते हैं, मुझे इससे क्या? ठीक वैसे ही जैसे कि स्मशान भूमि में मूर्दे जलाने वाला डोम अथवा कब्र खोदने वाला मजदूर अन्यमनस्क रहता है, तो मेरी मरणानुस्मृति भी सही नहीं है, गलत है।
यदि मेरी मरणानुस्मृति मेरी अपनी ही आशंकित मृत्यु पर आधारित है और मैं वैसे ही भयभीत होता हूं जैसे की कोई व्यक्ति अपने पर उठे कातिल के खंजर को देखकर होता है तो भी मेरी यह मरणानुस्मृति सही नहीं है, गलत है।
🌷 सही मरणानुस्मृति का अभ्यास करते हुए मन में उसके प्रति न राग हो न द्वेष हो, न मोहाच्छन्न बेहोशी हो और न ही भय हो! मरने की अनुस्मुति जब निर्भयता से भरी हो, जब हर्ष और रोदन विहीन हो, जब अनित्य-बोध-जन्य प्रज्ञा से भरी हो, तभी सही है .
मरणानुस्मृति के अभ्यास लिए इस सच्चाई को कभी न भूलूं कि मेरी मेरी मृत्यु अवश्यंभावी है। मृत्यु का कारण समय स्थान भले ही ज्ञात न हो, परंतु कभी भी, कहीं भी,किसी भी कारण से मेरी मृत्यु हो सकती है। मैं अपनी मृत्यु के लिए हर क्षण तैयार रहूं, जन्म भले रोते हुए हुआ, परंतु , मृत्यु तो हँसते और मुस्कराते हुए ही हो। इस निमित्त अपने आपको पकता रहूं, पुष्ट करता रहूं, यही सही मरणानुस्मृति है। यदि मैं धनवान हूं तो सदा इस तथ्य की याद बनाए रखूं की मुझसे कहीं अधिक धनवान भी मृत्यु को प्राप्त हुए ही हैं। मैं मृत्यु के चंगुल से बच नहीं सकता, मौत किसी पर रहम नहीं करती, राजा हो या रंक, विद्वान हो या अनपढ़, स्त्री हो या पुरुष, मनुष्य हो या इतर जीव, इस लोक का हो या उस लोक का, प्रत्येक प्राणी समय पाकर मृत्यु को प्राप्त होता ही है। जीवित-इंद्रिय का उपच्छेद होता ही है, हर जन्म लेने वाला मृत्यु का विधान साथ लेकर ही आता है, हर फूल मुरझाने के ले ही खिलता है, हर प्रभात संध्या के लिए ही उदय होता है, हर बसंत पतझड़ के लिए ही पुष्पित होता है, हर पात्र टूटने के लिए ही बनता है, मृत्यु जीवन की अनिवार्य परिणति है, इससे किसी का छुटकारा नहीं। मृत्यु किसी का लिहाज नहीं करती की यह ब्राह्मण है या शूद्र है, यह योग्य पात्र है या अयोग्य पात्र है, वह तो समय पाकर सभी प्राणियों तक पहुँचती ही है; जीवन का हर सांस हमें मृत्यु की और ही तो ले जाता है।
आरोग्यता रोग के आने तक ही है, यौवन बुढ़ापे के आने तक हे है, इसी प्रकार जीवन मृत्यु के आने तक यही है। हर आरोग्य-संपत्ति रोग-विपत्ति में बदल जाती है. हर यौवन- संपत्ति जरा-विपत्ति में बदल जाती है, इसी प्रकार हर जीवन-संपत्ति , मरण-विपत्ति में बदल ही जाती है. किसी विषैले जन्तु का दंश किसी शस्त्र का प्रहार, भोजन का अपच्य हो जाना, पित्त, वायु या कफ का कुपित हो जाना, श्वांस का अवरुद्ध हो जाना, गर्मी-सर्दी की अधिकता का होना, आहार का आभाव होना, आदि, आदि , अनगिनत कारण मृत्यु के प्रत्यय बन सकते है।
मृत्यु की इस सक्कै को जानते रहने का मतलब यह नहीं की हम इस वजह से सदा चिंतित रहें, आशंकित रहे, व्याकुल रहे, भयभीत रहे, बल्कि उसका अर्थ यही है की हम प्रज्ञापूर्वक इस सके को समझते रहें कि मेरे अनमोल मनुष्य जीवन की आयु बहुत थोड़ी है; मैं कहीं इसके प्रति गहरी आसक्ति में न उलझ जाऊं। मृत्यु से मेरा छुटकारा नहीं हैं, अतः जितना भी समय मेरे पास है, उसका वैसे ही तत्परतापूर्वक उपयोग करूं जैसे की सर में आग लगा हुआ व्यक्ति उस आग को बुझाने के लिए तत्पर हो उठता है।
यह सारा संसार मरणधर्मा है। मैं भी मरणधर्मा हूं। इस सचाई को जानते रहना अच्छा तो है, परन्तु केवल बौद्धिक स्तर पर ही इसका चिंतन होता रहे तो कोरा बुद्धिविलास बन जाने का खतरा है। यदि ऐसा हो जाये तो श्मशान-ज्ञान की तरह तीर्थक साबित होबा। अतः इस सच्याई को गहराइयों में उतर कर इसका प्रत्यक्ष अनुभव करना ही कल्याणकारी है। इसीलिए विपश्यना साधना है, जिसके द्वारा अंतर्मुखी होकर हम इस सच्याई का स्वयं अनुभव करत हैं कि हमारा यह शरीर-प्रपंच और चित्त प्रपंच कितना नश्वर है, कितना मरणधर्मा है, कितना विनाशधर्म है, क्षण-क्षण परिवर्तनशील है और जो नश्वर है, उसमें यह जो मोह, मूढ़ता है कि "यह मेरा है" "एतं मम" " यह मैं हूं" "एसोहमस्मि" "यह मेरी आत्मा है" "एसो में अत्ता" ये सब विपश्यना द्वारा शनैः शनैः नष्ट होती जाती हैं। साधक आत्मभाव और अस्मिताभाव की छलन से दूर होता है. अंतर्मुखी होकर इस इंद्रिय जगत का निरीक्षण करता हुआ, उसकी सूक्ष्मतम परिधि तक पहुंचकर और उसे भी पार करके उस निर्वाणिक स्थिति का मुक्त अवस्था का साक्षात्कार करता है, जो कि इन्द्रियातीय है, भवातीत, लोकातीत है और जो कि विनाशधर्मा है और मरणधर्मा न होकर नित्य शाश्वत ध्रुव अमृतधर्मा है। विपश्यना के इस अभ्यास के दौरान हम अपने ऐसे पूर्व संचित संस्कारों से छुटकारा पाते जाते है, जो कि हमारे अंतर्मन पर पत्थर की लकीर की तरह घरे पड़े हुए हैं और जो कि हर मृत्यु के क्षण जागृत होकर पुनर्जन्म का कारण बनते है। इन संस्कारों का उन्मूलन ही मृत्यु के बाद नया जीवन देने वाली इस नैसर्गिक प्रक्रिया का निरोध करता है और इसी से अमृत पद प्राप्त होता है।
इस प्रकार अमृत तक पहुंचने के लिए संपूर्ण मृत्यु क्षेत्र का अंतरर्साक्ष्य किया जाता है। यही मरणानुपश्यना है, अनित्य लक्षण की विपश्यना है, जो की मरणानुस्मृति से आरम्भ होती है. इसीलिए मरणानुस्मृति को महान कल्याणकारी माना गया है।
🌷भगवान ने ठीक कहा; -
तस्मा हवे अप्पमादं, सुमेधसो सुमेधसो |
एवं महानुभावाय , मरणस्सतिया सदाति ||
इसीलिए समझदार आदमी को चाहिए कि वह विणा प्रमाद में पड़े इस मरणानुस्मृति का अभ्यास करे, जो कि महानुभाववाली है, महा मंगलमयी है |
श्री सत्यनारायण गोयनका
विपश्यना पत्रिका संग्रह भाग -१ ( पृष्ट ८४, ८५, ८६)
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