Friday, 25 September 2020

આચાર્ય વિજય રત્ન સુંદર્સુરિસ્વરજી

*આચાર્ય શ્રી રત્નસુંદરસુરીશ્વરજી* 
*ગુજરાતી સદ્દસાહિત્ય યાત્રાના મણકા*


*(ગઈકાલથી આગળ)*

☸️ *કોઈની 'નજર' માં વસી જવા ય જો સારી એવી તૈયારી કરવી પડે છે તો પ્રભુની 'નજર' માં વસી જવા તો કેટકેટલી તૈયારી કરવી પડે એ બિલકુલ સમજાય તેવી જ વાત છે ને ?*

☸️ *પરીક્ષા, પીડા અને પ્રલોભન વખતે તનબળ એટલું કામ નથી લાગતું જેટલું મનોબળ કામ લાગે છે એ વાસ્તવિકતા સતત આંખ સામે રાખજો.*

☸️ *મોસંબીનો રસ પીવાથી તાવ ઊતરી જતો હોય છે તો આપણે કરિયાતું પીતા નથી જ ને ? નક્કી કરી દો. મીઠા શબ્દોથી કામ સરી જતું હશે ત્યાં કઠોર કે કડવા શબ્દોનો પ્રયોગ આપણે નહીં જ કરીએ.*

☸️ *અચાનક આવી જતી માંદગીને પડકારવામાં હજી કદાચ સફળતા મળી શકશે પણ અનિર્વાય એવા મોતને તો સ્વીકારી લેવા સિવાય આપણી પાસે બીજો કોઈ વિકલ્પ જ નથી બચતો.*

☸️ *શુભ વિચારો અમલી નથી બનતા એનું દુઃખ જરૂર અનુભવજો પણ અશુભ વિચારો અમલી નથી બનતા એ ખ્યાલે તો અપાર આનંદ અનુભવજો.*

☸️ *પૈસાથી જ જીવન ચાલે છે એ તમારો અનુભવ હોય તો ય યાદ રાખજો કે આ જગતને મહાપુરુષોની ભેટ આપવાનું કામ પૈસાએ નથી કર્યું પરંતુ પ્રેમે જ કર્યું છે.*

☸️ *વિનાશક શસ્ત્રોનું સર્જન કરી દેતાં યંત્રને તો માફ કરી શકાય કારણ કે એની પાસે સંવેદનશીલતા નથી હોતી પણ એવા યંત્રનું સર્જન કરતા માણસને શેં માફ કરી શકાય ? કારણ કે એ તો સંવેદનશીલતા લઈને બેઠો છે.*

☸️ *વિજ્ઞાન સ્વને ભુલાવી દઈએ સ્વસ્થ રાખવાનો પ્રયાસ કરવાનાં સાધનો વિકસાવી રહ્યું છે જ્યારે ધર્મ સ્વને જાગ્રત કરીને પ્રસન્ન રહેવાની સાધના આપી રહ્યું છે. પસંદગીમાં થાપ ન ખાશો.*

☸️ *દુશ્મનાવટનો ભાવ જો ક્યારેય સેતુ બની નથી શકતો તો મૈત્રીનો ભાવ ક્યારેય દીવાલ બનવા તૈયાર નથુ હોતો.*

☸️ *ધન તરફથી ઝડપને વધારવાનું કામ જો લોભ કરે છે તો ધર્મ તરફથી ઝડપને તોડી નાખવાનું કામ મોહ કરે છે.*

☸️ *પ્રેમને ખોરાકવત જીવનની પસંદગી ન બનાવશો, પણ પ્રાણવાયુવત જીવનનો નિયમ જ બનાવી દેજો.*

☸️ *આપણું પોતાનું વર્તન સુધાર્યા વિના જગતમાં પરિવર્તન કરી દેવાના અભરખા સેવવા જેવા નથી.*

☸️ *તમારી સાથે શું બને છે એના કરતાં તમારી અંદર શુ બને છે એ વધુ મહત્વનું છે.*

☸️ *'વધુ પૈસો, ઝડપી પૈસો અને ગમે તે રસ્તે પૈસો' પૈસાને આ ત્રણ ભયંકર વિશેષણોથી સતત બચાવતા રહેજો.*

☸️ *દુઃખોને ઘટાડવાનો કે રવાના કરવાનો એક પણ વિકલ્પ ન બચ્યો હોય ત્યારે દુઃખોને સ્વીકારી લેવાનો વિકલ્પ અજમાવી જોજો. સમાધિ ટકી જ જશે.*

☸️ *આપણે જેવા છીએ એમાં આપણે સુધારો કરવો નથી અને બીજાઓ જેવા છે એવી એમનો સ્વીકાર કરવો નથી. સમાધિ અને પ્રસન્નતા શેં ટકાવી શકાશે ?*

☸️ *'લાભ' નું સ્થાન જીવનમાં જ્યારથી 'લોભે' લઈ લીધું છે ત્યારથી 'શુભ' નું સ્થાન 'અશુભ' ના હાથમાં ચાલ્યું ગયું છે.*

☸️ *બધા જ સંબંધો 'સાચું' બોલવાની નહીં પણ 'સારું' બોલવાની જ ટક્યા છે એ ખાસ  યાદ રાખજો.*

☸️ *સુરક્ષાપ્રેમી મનને સત્યપ્રેમી બનાવી દેવું એ આ જીવનનો બહુ મોટો પડકાર છે.*

*(સંપૂર્ણ)*

*(સંકલન : શ્રુતદેવી મંદિર - જ્ઞાનભંડાર, પોરબંદર - સૌરાષ્ટ્ર)*

मौन और प्रेम


🌿आत्म परिवर्तन के लिए चाहिए मौन और प्रेम🌿

जो चुप नहीं हो सकता वह जीवन को कभी भी नहीं बदल सकता है। गहरी चुप्पी में ही, गहरे मौन में ही, गहरे साइलेंस में ही मनुष्य के भीतर क्रांति की, आत्म-परिवर्तन की क्षमता के दर्शन होते हैं। इतनी विराट शक्ति का अनुभव होता है कि कुछ भी बदला जा सकता है। इतनी बड़ी आग उपलब्ध हो जाती है कि कचरे को जलाया जा सकता है। उसके पहले तो जिंदगी में कोई क्रांति, कोई ट्रांसफार्मेशन नहीं हो सकता है।
इसलिए पहला ध्यान इस तरफ दें। चैबीस घंटे दौड़ते हैं, आधा घंटा न दौड़ें। चैबीस घंटे मन को काम में रखते हैं, आधा घंटा बेकाम छोड़ दें। चैबीस घंटे उलझे हुए हैं, आधा घंटे केवल साक्षी रह जाएं। यह तो पहला सूत्र है। और आज तक जगत में जिन लोगों ने भी कुछ जाना है, इस सूत्र के बिना नहीं जाना है। जो भी सत्य, जो भी सौंदर्य, जो भी श्रेष्ठ अनुभूतियां उपलब्ध हुई हैं, वे मौन में, एकांत में, शांति में, ध्यान में उपलब्ध हुई हैं। तो जिसकी भी आकांक्षा है, जिसके प्राणों में भी प्यास है उसे मौन की दिशा में कदम रखने होंगे। यह पहला सूत्र है।
दूसरा सूत्र भी इतना ही महत्वपूर्ण, इतना ही गहरा और इतना ही जरूरी है। मन के तल पर चाहिए मौन, हृदय के तल पर चाहिए प्रेम। मन तो हो जाए चुप, शून्य और हृदय भर जाए प्रेम से, हो जाए पूर्ण। लेकिन हम प्रेम को भी जीवन में जीते नहीं। प्रेम भी हमारे जीवन में छिपा ही पड़ा रह जाता है, उसे हम कभी विकसित नहीं करते। प्रेम के बीज भी हमारे जीवन में कभी वृक्ष नहीं बन पाते। पता नहीं किस कारण इतनी बड़ी सम्पत्ति को पाकर भी हम दरिद्र रह जाते हैं?
एक ही डर काम करता है जिससे जीवन में प्रेम विकसित नहीं हो पाता, एक ही भूल काम करती है। वह भूल मैं आपको कहूं, तो शायद प्रेम के द्वार खुल सकते हैं। और वह भूल यह हैः उस आदमी के जीवन में प्रेम कभी विकसित न होगा जो हमेशा दूसरों से प्रेम मांगता रहेगा।

ओशो,
आज इतना ही।

अहंकार - आत्मबोध का अभाव


4) भाग- 23  आओ तांत्रिक बनें 

सूत्र:
"किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो;
दूसरे विषय पर मत जाओ।
यहीं विष्‍यय के मध्‍य में—आनंद ।"

किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो…।’

प्रेमपूर्वक में कुंजी है। 
क्या तुमने कभी किसी चीज को प्रेमपूर्वक देखा है ???
तुम नही कह सकते हो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि किसी चीज को प्रेमपूर्वक देखने का क्या अर्थ होता है ???
तुमने किसी चीज को लालसा भरी आंखों से देखा होगा, कामनापूर्वक देखा होगा। वह दूसरी बात है। वह बिलकुल भिन्न, विपरीत बात है।

तुम एक सुंदर चेहरे को, सुंदर शरीर को देखते हो और तुम सोचते हो कि तुम उसे प्रेमपूर्वक देख रहे हो। लेकिन तुम उसे क्यों देख रहे हो ??? 
क्या तुम उससे कुछ पाना चाहते हो ??? 
तब वह वासना है, कामना है, प्रेम नहीं। क्या तुम उसका शोषण करना चाहते हो ??? 
तब वह वासना है, प्रेम नहीं। तब तुम सच में यह चाहते हो कि मैं कैसे इस शरीर को उपयोग में लाऊं, कैसे इसका मालिक बनूं कैसे इसे अपने सुख का साधन बना लूं।

वासना का अर्थ है कि कैसे किसी चीज को अपने सुख के लिए उपयोग में लाऊं। प्रेम का अर्थ है कि उससे मेरे सुख का कुछ लेना देना नहीं है। 

सच तो यह है कि वासना कुछ लेना चाहती है और प्रेम कुछ देना चाहता है। 
वे दोनों सर्वथा एक दूसरे के प्रतिकूल हैं।

वासना में तुम दूसरे को अपना साधन बनाने की सोचते हो, और प्रेम में तुम स्वय साधन बनने की सोचते हो। 
वासना में तुम दूसरे को पोंछ देना चाहते हो; प्रेम में तुम स्वय मिट जाना चाहते हो। 
प्रेम का अर्थ है देना, 
वासना का अर्थ है लेना। 
प्रेम समर्पण है;
वासना आक्रमण है।

इसका उलटा भी सही है। 
जब तुम किसी व्यक्ति को वासनापूर्वक देखते हो तो वह व्यक्ति वस्तु बन जाता है। यही कारण है कि वासना भरी आंखों में विकर्षण होता है, क्योंकि कोई भी वस्तु होना नहीं चाहता है। जब तुम अपनी पत्नी को, या किसी दूसरी स्त्री को, या पुरुष को, वासना की दृष्टि से देखते हो, तो उससे दूसरे को चोट पहुंचती है। तुम असल में क्या कर रहे हो ??? 
तुम एक जीवित व्यक्ति को मृत साधन में, यंत्र में बदल रहे हो। ज्यों ही तुमने सोचा कि कैसे उसका उपयोग करें कि तुमने उसकी हत्या कर दी।

प्रेम किसी को भी अनूठा बना देता है। यही कारण है कि प्रेम के बिना तुम नहीं महसूस करते कि मैं व्यक्ति हूं। जब तक कोई तुम्हें गहन प्रेम न करे, तुम्हें तुम्हारे अनूठेपन का एहसास ही नहीं होता। तब तक तुम भीड़ के हिस्से हो—एक नंबर, एक संख्या। और तुम बदले जा सकते हो।

उदाहरण के लिए, अगर तुम किसी दफ्तर में क्‍लर्क हो या स्‍कूल में शिक्षक हो या विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हो, तो तुम्हारी प्रोफेसरी बदली जा सकती है; दूसरा प्रोफेसर तुम्हारी जगह ले लेगा। वह कभी भी तुम्हारी जगह ले सकता है, क्योंकि वहां तुम प्रोफेसर के रूप में काम आते हो। वहां तुम्हारे काम से मतलब है। वैसे ही अगर तुम क्लर्क हो तो कोई भी तुम्हारा काम कर दे सकता है। काम तुम्हारा इंतजार नहीं करेगा। अगर तुम इस क्षण मर जाओ तो अगले क्षण कोई तुम्हारी जगह ले लेगा, और काम चलता रहेगा। तुम एक संख्या थे, दूसरी संख्या से चल जाएगा। तुम एक उपयोग भर थे।

लेकिन फिर कोई इसी क्लर्क या प्रोफेसर के साथ प्रेम में पड़ जाता है। अचानक वह क्लर्क क्लर्क नहीं रह जाता, वह एक अनूठा व्यक्ति हो उठता है। अगर वह मर जाए तो उसकी प्रेमिका उसकी जगह किसी को भी नहीं बिठा सकती। उसे बदला नहीं जा सकता है। तब सारी दुनिया वैसी की वैसी रह सकती है, लेकिन वह व्यक्ति जो इसके प्रेम में था वही नहीं रहेगा। यह अनूठापन, यह व्यक्ति होना प्रेम के द्वारा घटित होता है।

यह सूत्र कहता है. ‘किसी विषय को प्रेमपूर्वक देखो……।

जब तुम प्रेमपूर्वक देखते हो तो कोई भी चीज व्यक्ति हो उठती है। यह देखना ही बदलता है, रूपांतरित करता है।

प्रेम से जब देखते हो तो क्या करना होता है ??? 

पहली बात : अपने को भूल जाओ। अपने को बिलकुल भूल जाओ। एक फूल को देखो और अपने को बिलकुल भूल जाओ। फूल तो हो, लेकिन तुम अनुपस्थित हो जाओ। फूल को अनुभव करो और तुम्हारी चेतना से गहरा प्रेम फूल की ओर प्रवाहित होगा। और तब अपनी चेतना को एक ही विचार से भर जाने दो कि कैसे मैं इस फूल के ज्यादा खिलने में, ज्यादा सुंदर होने में, ज्यादा आनंदित होने में सहयोगी हो सकता हूं। मैं क्या कर सकता हूं ???

इस विचार को अपने पूरे प्राणों में गूंजने दो। अपने शरीर और मन के प्रत्येक तंतु को इस विचार से भीगने दो। तब तुम समाधिस्थ हो जाओगे और फूल एक व्यक्ति बन जाएगा।

‘दूसरे विषय पर मत जाओ।’

तुम जा नहीं सकते। अगर तुम प्रेम में हो तो नहीं जा सकते। अगर तुम इस समूह में बैठे किसी व्यक्ति को प्रेम करते हो तो तुम्हारे लिए सब भीड़ भूल जाती है और केवल वही चेहरा बचता है। 

जब ऐसी स्थिति बन जाए कि तुम अनुपस्थित हो, अपनी फिक्र नहीं करते, अपने सुख—संतोष की चिंता नहीं लेते, अपने को पूरी तरह भूल गए हो, जब तुम सिर्फ दूसरे के लिए चिंता करते हो, दूसरा तुम्हारे प्रेम का केंद्र बन गया है, तुम्हारी चेतना दूसरे में प्रवाहित हो रही है, जब गहन करुणा और प्रेम के भाव से तुम सोचते हो कि मैं अपनी प्रेमिका को आनंदित करने के लिए क्या कर सकता हूं तब इस स्थिति में अचानक, ‘यहीं विषय के मध्य में—आनंद’, अचानक उप—उत्पत्ति की तरह तुम्हें आनंद उपलब्ध हो जाता है। तब अचानक तुम केंद्रित हो गए।

यह बात विरोधाभासी लगती है। क्योंकि सूत्र कहता है कि अपने को बिलकुल भूल जाओ, आत्म—केंद्रित मत बनो, दूसरे में पूरी तरह प्रवेश करो।

बुद्ध निरंतर कहते थे कि जब भी तुम प्रार्थना करो तो दूसरों के लिए करो—अपने लिए नहीं। अन्यथा प्रार्थना व्यर्थ है।

स्मरण रहे, प्रेमपात्र के साथ व्यक्ति बिलकुल असहाय हो जाता है। जब भी तुम किसी को प्रेम करते हो, तुम असहाय हो जाते हो। यही प्रेम की पीड़ा है कि तुम्हें पता ही नहीं चलता कि मैं क्या कर सकता हूं। तुम सब कुछ करना चाहोगे, तुम अपने प्रेमी या प्रेमिका को सारा ब्रह्मांड दे देना चाहोगे। 
लेकिन तुम कर क्या सकते हो ??? 
अगर तुम सोचते हो कि यह या वह कर सकते हो तो तुम अभी प्रेम में नहीं हो। प्रेम बहुत असहाय है, बिलकुल असहाय है। और वह असहायपन सुंदर है, क्योंकि उसी असहायपन में तुम समर्पित हो जाते हो।

यही कारण है कि प्रेम गहन ध्यान बन जाता है। अगर सच में तुम किसी को प्रेम करते हो तो किसी अन्य ध्यान की जरूरत न रही। लेकिन क्योंकि कोई भी प्रेम नहीं करता है, इसलिए एक सौ बारह विधियों की जरूरत पड़ी। और वे भी काफी नहीं हैं।

ओशो
तंत्र-सूत्र-(प्रवचन-13)

3)🌸 🌼 🌸

🌹 *Osho*  🌹


*अष्‍टावक्र: महागीता--(प्रवचन--12) पार्ट चौथा*




जापान अकेला राष्ट्र है, जिसने कानून बनाया है कि प्रसव—पीड़ा को रोकने के लिए कोई दवा ईजाद नहीं की जा सकती। बड़ी समझदारी की बात है। सिर्फ अकेला राष्ट्र है सारी दुनिया में। क्योंकि प्रसव—पीड़ा बच्चे के जीवन की शुरुआत है। मां को ही पीड़ा होती है, ऐसा नहीं है, बच्चे को भी पीड़ा होती है। लेकिन उस पीड़ा से ही कुछ निर्मित होता है।
मैंने सुना है, एक किसान परमात्मा से बहुत परेशान हो गया। कभी ज्यादा वर्षा हो जाए कभी ओले गिर जाएं, कभी पाला पड़ जाए कभी वर्षा न हो, कभी धूप हो जाए फसलें खराब होती चली जाएं, कभी बाढ़ आ जाए और कभी सूखा पड़ जाए। आखिर उसने कहा कि सुनो जी, तुम्हें कुछ किसानी की अक्ल नहीं, हमसे पूछो! परमात्मा कुछ मौज में रहा होगा उस दिन। उसने कहा, अच्छा, तुम्हारा क्या खयाल है? उसने कहा कि एक साल मुझे मौका दो, जैसा मैं चाहूं वैसा मौसम हो। देखो, कैसा दुनिया को सुख से भर दूं धन—धान्य से भर दूं!
परमात्मा ने कहा, ठीक है, एक साल तेरी मर्जी होगी, मैं दूर रहूंगा। स्वभावत: किसान को जानकारी थी। काश, जानकारी ही सब कुछ होती! किसान ने जब धूप चाही तब धूप मिली, जब जल चाहा तब जल मिला, बूंद भर कम—ज्यादा नहीं, जितना चाहा उतना मिला। कभी धूप, कभी छाया, कभी जल—ऐसा किसान मांगता रहा और बड़ा प्रसन्न होता रहा; क्योंकि गेहूं की बालें आदमी के ऊपर उठने लगीं। ऐसी तो फसल कभी न हुई थी। कहने लगा, अब पता चलेगा परमात्मा को! न मालूम कितने जमाने से आदमियों को नाहक परेशान करते रहे। किसी भी किसान से पूछ लेते, हल हो जाता मामला। अब पता चलेगा।
गेहूं की बालें ऐसी हो गईं, जैसे बड़े—बड़े वृक्ष हों। खूब गेहूं लगे। किसान बड़ा प्रसन्न था। लेकिन जब फसल काटी, तो छाती पर हाथ रख कर बैठ गया। गेहूं भीतर थे ही नहीं, बालें ही बालें थीं। भीतर सब खाली था। वह तो चिल्लाया कि हे परमात्मा, यह क्या हुआ? परमात्मा ने कहा, अब तू ही सोच। क्योंकि संघर्ष का तो तूने कोई मौका ही न दिया। ओले तूने कभी मांगे ही नहीं। तूफान कभी तुमने उठने न दिया। आधी कभी तूने चाही नहीं। तो आधी, अंधड़, तूफान, गड़गड़ाहट बादलों की, बिजलियों की चमचमाहट. तो इनके प्राण संगृहीत न हो सके। ये बड़े तो हो गए लेकिन पोचे हैं।
संघर्ष आदमी को केंद्र देता है। नहीं तो आदमी पोचा रह जाता है। इसलिए तो धनपतियों के बेटे पोचे मालूम होते हैं। जब धूप चाही धूप मिल गई, जब पानी चाहा पानी; न कोई अंधड़, न कोई तूफान। तुम धनपतियों के घर में कभी बहुत प्रतिभाशाली लोगों को पैदा होते न देखोगे—पोचे! गेहूं की बाल ही बाल होती है, गेहूं भीतर होता नहीं। थोड़ा संघर्ष चाहिए। थोड़ी चुनौती चाहिए।
जब तूफान हिलाते हैं और वृक्ष अपने बल से खड़ा रहता है, बड़े तूफानों को हरा कर खड़ा रहता है, आंधिया आती हैं, गिराती हैं और फिर गेहूं की बाल फिर—फिर खड़ी हो जाती है तो बल पैदा होता संघर्षण से ऊर्जा निर्मित होती है। अगर संघर्षण बिलकुल न हो, तो ऊर्जा सुप्त की सुप्त रह जाती
प्रसव—पीड़ा मां के लिए ही पीड़ा नहीं है, बेटे के लिए भी पीड़ा है। लेकिन पीड़ा से जीवन की शुरुआत है—और शुभ है। नहीं तो पोचा रह जाएगा बच्चा। उसमें बल न होगा। और अगर बिना पीड़ा के बच्चा हो जाएगा, तो मां के भीतर जो बच्चे के लिए प्रेम पैदा होना चाहिए, वह भी पैदा न होगा। क्योंकि जब हम किसी चीज को बहुत पीड़ा से पाते हैं, तो उसमें हमारा एक राग बनता है। तुम सोचो, हिलेरी जब चढ़ कर पहुंचा हिमालय पर तो उसे जो मजा आया, वह तुम हेलिकॉप्टर से जा कर उतर जाओ, तो थोड़े ही आएगा। उसमें सार ही क्या है? हेलिकॉप्टर भी उतार दे सकता है, क्या अड़चन है? मगर तब, तब बात खो गई। तुमने श्रम न किया, तुमने पीड़ा न उठाई, तो तुम पुरस्कार कैसे पाओगे?
यही गणित बहुत—से लोगों के जीवन को खराब किए है। मंजिल से भी ज्यादा मूल्यवान मार्ग है। अगर तुम मंजिल पर तत्क्षण पहुंचा दिए जाओ तो आनंद न घटेगा। वह मार्ग का संघर्षण, वे मार्ग की पीड़ाएं, वे इतंजारी के दिन, वे प्रतीक्षा की रातें, वे आंसू वह सब सम्मिलित है—तब कहीं अंततः आनंद घटता है
      हर एक दर्द को, नए अर्थ तक जाने दो!
तो विष्णु चैतन्य! दर्द है, मुझे पता है। आने में भी तुम मेरे पास डरते हो, वह भी मुझे पता है। घबड़ाओ मत, आओ! अपने को बाहर छोड़ कर आओ। बैठो मेरे पास एक शून्य, कोरी किताब की तरह, ताकि मैं कुछ लिख सकूं तुम पर। लिखे—लिखाए मत आओ, गुदे—गुदाए मत आओ; अन्यथा मैं क्या लिखूंगा? तुम मुझे लिखने का थोड़ा मौका दो। खाली आओ ताकि मैं तुममें उंडेलूं अपने को और भर दूं तुम्हें। शास्त्रों से भरे मत आओ। शास्त्र तो मैं तुम्हारे भीतर पैदा करने को तैयार हूं। तुम्हें शास्त्र ले कर आने की जरूरत नहीं। तुम सिद्धातों और तर्कों के जाल में मत पड़ो।
तुम आओ चुप, तुम आओ हृदयपूर्वक, भाव से भरे। मुझे एक मौका दो, ताकि तुम्हें निखारूं, तुम्हारी प्रतिमा गढूं।



(क्रमशः)

*अष्ठावक्र महागीता*


ओशो

*સૌજન્ય - https://oshoganga.blogspot.co*

2) 😌  _*"ध्यान" क्या हैं ?*_    

 *ध्यान है...खेलपूर्ण होना।*
   ध्यान है... सृजनात्मक होना।

 *ध्यान है...सजग होना।*
   ध्यान है.. तुम्हारा स्वभाव।

 *ध्यान है... कुछ ना करना।*
    ध्यान है... साक्षी भाव। 

 *ध्यान है... एक छलांग।*
   ध्यान है... वैग्यानिकता।

 *ध्यान है... एक प्रयोग।*
   ध्यान है... मौन।

 *ध्यान है... स्वर्ग।*
    ध्यान है... स्मरण। 
 
 *ध्यान है... परम स्वतंत्रता।*
   ध्यान है... संवेदनशीलता।

 *ध्यान है... विकसित होना।*
   ध्यान है... पलायनवादी न होना।

 *ध्यान है... एक स्वाभाविक या*
 *निर्दोष विधि (नैक)।*
   ध्यान है... पारदर्शिता।

 *ध्यान है... खाली होना।*
   ध्यान है... जानना।

 *ध्यान है... निर्मल होना।*
  ध्यान है... फूल की खिलावट।

 *ध्यान है... होशपूर्ण होना।* 
  ध्यान है... मजाक व एक हास-
  परिहास।

 *ध्यान है... गहरी समझ।*
  ध्यान है... आनंद को बांटना।

 *ध्यान है... तनावरहित या*
 *विश्रामपूर्ण होना।* 
    ध्यान है... उत्तेजनारहित होना।

 *ध्यान है... एकात्म होना।*
   ध्यान है... पुनर्सृजन ।

 *ध्यान है... विश्रामपूर्ण होना।*
   ध्यान है... मालिक बनना।

 *ध्यान है... अंतराल में बने रहना।*                 
    ध्यान है ...वर्तमान में रहना।

 *ध्यान है... एक घटना।*
  ध्यान है... एक रुपान्तरण।

 *ध्यान है... घर वापस लौटना।*
  ध्यान है... आनंदपूर्ण होना।

 *ध्यान है....होश आना।* 
  ध्यान है .... स्व मै स्थापित होना।

 *ध्यान है..... जन्म मरण से मुक्त*
 *होना।*
  ध्यान है.... बस होना।
 
🌹 _*ओशो*_  🌹

❣❣❣❣❣❣❣❣❣❣❣


1) 🍂🍃अहंकार आत्‍मबोध का आभाव है🍃🍂

अहंकार आत्म स्मरण का आभाव है। अहंकार अपने को न जानने का दूसरा नाम है। इसलिए अहंकार से मत लड़ों। अहंकार और अंधकार पर्यायवाची है। हां, अपनी ज्‍योति को जला लो। ध्‍यान का दीया बन जाओ। भीतर एक जागरण को उठा लो। भीतर सोए-सोए न रहो। भीतर होश को उठा लो। और जैसे ही होश आया, चकित होओगे, हंसोगे—अपने पर हंसोगे। हैरान होओगे। एक क्षण को तो भरोसा भी न आएगा कि जैसे ही भीतर होश आया वैसे ही अहंकार नहीं पाया जाता है। न तो मिटाया,न मिटा,पाया ही नहीं जाता है।

 

इसलिए मैं तुम्‍हें न तो सरल ढंग बता सकता हूं। न कठिन; न तो आसान रास्‍ता बता सकता हूं, न खतरनाक; न तो धीमा, न तेज। मैं तो सिर्फ इतना ही कह सकता हूं: जागों और जागने को ही मैं ध्‍यान कहता हूं।

आदमी दो ढंग से जी सकता है। एक मूर्च्‍छित ढंग है, जैसा हम सब जीते है। चले जाते है। यंत्रवत,किए जाते है काम यंत्रवत, मशीन की भांति। थोड़ी सी परत हमारे भीतर जागी है। अधिकांश हमारा अस्‍तित्‍व सोया पडा है। और वह जो थोड़ी सी परत जागी। वह भी न मालूम कितनी धूल ध्वांस, कितने विचारों, कितनी कल्पनाओं, कितने सपनों में दबी है।

सबसे पहला काम है; वह जो थोड़ा सी हमारे भीतर जागरण की रेखा है। उसे सपनों से मुक्‍त करो, उसे विचारों से शून्‍य करो। उसे साफ करो, निखारों,धोआ,पखारो। और जैसे ही वह शुद्ध होगी वैसे ही तुम्‍हारे हाथ में कीमिया लग जाएगी। राज लग जाएगा। कुंजी मिल जाएगी। फिर जो तुमने उसे थोड़ी सी पर्त के साथ किया है। वहीं तुम्‍हें उसके नीचे की पर्त के साथ करना है। फिर से नीचे की पर्त, फिर और नीचे की पर्त....। धीरे-धीरे तुम्‍हारा अंत जगत पूरा का पूरा आलोक से, आभा से मंडित हो जाएगा। एक ऐसी घड़ी आती है। जब भीतर अलोक होता है। और जहां आलोक हुआ भीतर। अंधकार नहीं पाया जाता है। अंधकार नहीं अंहकार नहीं।

🍂🍃आपुई गई हिराय🍃🍂

🍂🍃ओशो🍃🍂

वो चोर मर गया।


मैं एक साधु का जीवन पढ़ता था। एक झेन फकीर हुआ। 

वह चोर था साधु होने के पहले। एक महल से चोरी करके भागा। पुलिस उसके पीछे है; लोग उसको पकड़ने आ रहे हैं। कोई उपाय न देखकर, कोई मार्ग न देखकर, वह एक बुद्ध मंदिर में प्रवेश कर गया। सुबह कोई चार बजे रात का समय था। कोई भिक्षु सोया था, उसके कपड़े टंगे थे। उसने भिक्षु के कपड़े पहन लिए और मंदिर में हाथ—पालथी मारकर बुद्धासन में बैठ गया। नमो बुद्धाय, नमो बुद्धाय का मंत्र जाप करने लगा।

सिपाही भागे हुए मंदिर के पीछे आए। वे उसका पीछा कर रहे थे। लेकिन वहा एक साधु बैठा है, नमो बुद्धाय का पवित्र मंत्र गज रहा है। वहां कोई चोर नहीं। वे सिपाही उसके चरणों में झुके, उसको नमस्कार किए; और कहा, साधु महाराज, यहां कोई चोर तो नहीं आया?

जब वे उसके चरणों में झुके, तब उसे बड़ी हैरानी हुई। और एक क्रांति हो गई। उसे लगा कि मैं एक झूठा साधु! और झूठी साधुता में इतना बल—झूठी साधुता में—कि जो मेरी हत्या करने मेरे पीछे लगे थे, वे मेरे चरणों में झुक गए! अगर झूठी साधुता में इतना बल है, तो सच्ची साधुता में कितना बल होगा!

उसने उन सिपाहियों से कहा कि चोर आया था, लेकिन अब तुम उसे खोज न पाओगे। वह चोर मर चुका। वे सिपाही बोले, हम समझे नहीं! आप रहस्य की बातें न करें। हम सीधे—सादे लोग। हम समझे नहीं आपका मतलब! चोर कहां है? कैसे मर गया?

उस साधु ने कहा, मैं ही था वह चोर, लेकिन अब मैं मर चुका हूं। और वह चोर अब तुम्हें कहीं भी नहीं मिलेगा। वह नहीं है अब। तुमने मेरे चरणों में झुककर उसकी हत्या कर दी। तुम गोली से उसे नहीं मार सकते थे, लेकिन तुमने उसे मार दिया। और जब झूठी साधुता में इतना अर्थ हो सकता है, तो मैं अब उस साधुता की तलाश करूंगा, जो सच्ची है।

वह एक बड़ा झेन फकीर हो गया। वह सदा यह घटना लोगों से कहा करता था कि मैं कोई साधु बनने नहीं आया था, परिस्थिति ने सत्व का उदय कर दिया। नमो बुद्धाय! सुबह का सूना मंदिर, मंदिर की दीवारों में गूंजता नमो बुद्धाय का मंत्र; मूर्ति के पास से उठती हुई धूप, सुगंधित वातावरण, सिपाहियों का आना और मेरे चरणों में झुक जाना—मेरी सारी ऊर्जा सत्य से बह गई। एक क्षण को मुझे सत्य का अनुभव हुआ कि साधुता का सुख, साधुता की सुगंध, साधुता का फूल क्या है।

आप पूरे समय बदल रहे हैं। इसलिए अच्छे आदमी के पास आप अच्छे आदमी हो जाते हैं। बुरे आदमी के पास आप बुरे आदमी हो जाते हैं। अगर सक्रिय लोगों के बीच में पड़ जाएं, तो आप सक्रिय हो जाते हैं। अगर आलसियों के बीच में पड़ जाएं, तो आपको नींद आने लगती है।

ओशो, गीता-दर्शन-७/१४

Monday, 14 September 2020

खुद के लिए बदलाव बहुत जरूरी

   एक तालाब में बहुत सारे बतक एक दूसरे से बहुत प्यार से रहते और खेलते कूदते। लेकिन इनमें से एक को व सभी इग्नोर करते और उसे देखते भी नहीं, इसलिए जिसे सभी इग्नोर कर रहे थे, उसे यह समझ नहीं आता था कि यह लोग मुझे क्यों ऐसा कर रहे हैं? वह बड़ा दु:खी रहा करता था। एक दिन उसने तालाब के पानी में अपने आप को देखा तो उसने पाया कि वह बतक नहीं हंस है।उसने सोचा मैं एक सामान्य पक्षी जैसा नहीं हूं, बल्कि जिस का गायन पूजन होता है ऐसा श्रेष्ठ हंस हूं। सबसे पवित्र और उच्च संस्कारों से युक्त हु। ।उसे अपनी विशेषताओं का ज्ञान हुआ तो वह अपने श्रेष्ठ  स्वमान  में रहने लगा।  जिससे वह दूसरे पक्षियों के लिए भी एक आदर्श बन गया। उसका अपना दु:ख खत्म हुआ, वह नाचने और गाने लगा। खुद खुश रहने लगा। आसपास वाले सभी खुश रहने लगे। 

       मीनिंग है ज्यादातर हम दूसरों के व्यवहार से अपने आप को मापते हैं ,उन्हें ऐसा करना चाहिए, वैसा करना चाहिए ।लेकिन जब तक हम खुद को नहीं देखते हमें अपनी विशेषताओं और शक्तियों का एहसास नहीं होता हैं।जिस दिन यह अहेसास हम कर लेते है, दूसरों को नहीं देखते यानी अपने आपको हिन महसूस नहीं करते, तभी आगे बढ़ सकेंगे।

  *क्यों ना हम खुद को जाने खुद को महसूस करें, खुद के लिए खुद बदलाव लाए, खुद पर experiment कर ,खुद अपने आप को सही अनुभव करें।

  *जब तक तुम दूसरों को देखते रहते हो तब तक तुम्हें कोई नहीं देखता ,लेकिन जब तुम खुद को देखना शुरू करते हो  तब तुम्हें सभी देखना और appreciate करना शुरू करेंगे।

Sunday, 13 September 2020

राष्ट्रीय हिन्दी दिवस - १४ सितम्बर।


जब भी बात देश की उठती है तो हम सब एक ही बात दोहराते हैं, “हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा“। यह पंक्ति हम हिंदुस्तानियों के लिए अपने आप में एक विशेष महत्व रखती है। हिंदी अपने देश हिंदुस्तान की पहचान है। यह देश की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है इसीलिए हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। हर साल हम 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं।

      क्योंकि इसी दिन भारत की संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी गई हिंदी भाषा को भारतीय गणराज्य की राजभाषा घोषित किया था। हिंदी के प्रचार और प्रसार के लिए तत्कालीन भारतीय सरकार ने 14 सितंबर 1949 से प्रतिवर्ष 14 सितम्बर को हिंदी दिवस के रूप में मनाने अनुरोध किया था। तब से लेकर आज तक हम हर एक वर्ष 14 सितम्बर को Hindi Diwas के रूप में मानते हैं। इस दिन सरकारी दफ्तरों में, स्कूलों में, कॉलेजों में हिंदी प्रतियोगिता का आयोजित किया जाता है तथा कहीं-कहीं सप्ताह भर तक हिंदी सप्ताह का आयोजन भी किया जाता है।
हिंदी शब्द हिन्द से आया है।
हिंदी और उर्दू भाषाओको एकदूजे की भगिनी कहा जाता है क्योंकि दोनों के व्याकरण ओर शब्दभंडार में समानता है।
संविधान द्वारा हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिये जाने की खुशी में हम हिंदी दिवस मनाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी भाषा को राजभाषा के तौर पर अपनाने का उल्लेख मिलता है।
हिन्दी दिवस प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को मनाया जाता है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, मैथिलीशरण गुप्त, हजारीप्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्ददास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर व्यौहार राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए।
इसी दिन हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकार व्यौहार राजेन्द्र सिंहा का 50-वां जन्मदिन था, इस कारण हिन्दी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया था।
बोलने वालों की संख्या के अनुसार अंग्रेजी और चीनी भाषा के बाद हिन्दी भाषा पूरे विश्व में तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। लेकिन उसे अच्छी तरह से समझने, पढ़ने और लिखने वालों में यह संख्या बहुत ही कम है। 
हिन्दी दिवस पर हिन्दी के प्रति लोगों को उत्साहित करने हेतु पुरस्कार समारोह भी आयोजित किया जाता है। 
हिंदी दिवस के दिन भारत के राष्ट्रपति दिल्हिमे एक समारोह आयोजित करते है जिसमे हिंदी भाषामे अतुल्य योगदान के लिए लोगो को राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार दिया जाता है।
राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार लोगों को दिया जाता है जबकि राष्ट्रभाषा कीर्ति पुरस्कार किसी विभाग, समिति आदि को दिया जाता है।
राजभाषा गौरव पुरस्कार
यह पुरस्कार तकनीकी या विज्ञान के विषय पर लिखने वाले किसी भी भारतीय नागरिक को दिया जाता है। इसमें दस हजार से लेकर दो लाख रुपये के 13 पुरस्कार होते हैं। इसमें प्रथम पुरस्कार प्राप्त करने वाले को २ लाख रूपए, द्वितीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को डेढ़ लाख रूपए और तृतीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले को पचहत्तर हजार रुपये मिलता है। साथ ही दस लोगों को प्रोत्साहन पुरस्कार के रूप में दस-दस हजार रूपए प्रदान किए जाते हैं। पुरस्कार प्राप्त सभी लोगों को स्मृति चिह्न भी दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में हिन्दी भाषा को आगे बढ़ाना है।
राजभाषा कीर्ति पुरस्कार
 
इस पुरस्कार योजना के तहत कुल ३९ पुरस्कार दिये जाते हैं। यह पुरस्कार किसी समिति, विभाग, मण्डल आदि को उसके द्वारा हिन्दी में किए गए श्रेष्ठ कार्यों के लिए दिया जाता है। इसका मूल उद्देश्य सरकारी कार्यों में हिन्दी भाषा का उपयोग करने से है।
हिंदी भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि होती है। इसी ध्वनि को ही वर्ण कहा जाता है। वर्णों को व्यवस्थित करने के समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी में उच्चारण के आधार पर 45 वर्ण होते हैं। इनमें 10 स्वर और 35 व्यंजन होते हैं। लेखन के आधार पर 52 वर्ण होते हैं इसमें 13 स्वर , 35 व्यंजन तथा 4 संयुक्त व्यंजन होते हैं। वर्णमाला के दो भाग होते हैं :- 1. स्वर 2. व्यंजन 1. स्वर क्या होता है :- जिन वर्णों को स्वतंत्र रूप से बोला जा सके उसे स्वर कहते हैं। परम्परागत रूप से स्वरों की संख्या 13 मानी गई है लेकिन उच्चारण की दृष्टि से 10 ही स्वर होते हैं। 1. उच्चारण के आधार पर स्वर :- अ, आ , इ , ई , उ , ऊ , ए , ऐ , ओ , औ आदि। 2. लेखन के आधार पर स्वर :- अ, आ, इ , ई , उ , ऊ , ए , ऐ , ओ , औ , अं , अ: , ऋ आदि। व्यंजन क्या होता है :- जो वर्ण स्वरों की सहायता से बोले जाते हैं उन्हें व्यंजन कहते हैं। हर व्यंजन के उच्चारण में अ स्वर लगा होता है। अ के बिना व्यंजन का उच्चारण नहीं हो सकता। वर्णमाला में कुल 35 व्यंजन होते हैं। कवर्ग : क , ख , ग , घ , ङ चवर्ग : च , छ , ज , झ , ञ टवर्ग : ट , ठ , ड , ढ , ण ( ड़ ढ़ ) तवर्ग : त , थ , द , ध , न पवर्ग : प , फ , ब , भ , म अंतस्थ : य , र , ल , व् उष्म : श , ष , स , ह संयुक्त व्यंजन : क्ष , त्र , ज्ञ , श्र यह वर्णमाला देवनागरी लिपि में लिखी गई है। देवनागरी लिपि में संस्कृत , मराठी , कोंकणी , नेपाली , मैथिलि भाषाएँ लिखी जाती हैं। हिंदी वर्णमाला में ऋ , ऌ , ॡ का प्रयोग नहीं किया जाता है।
 
 
2017 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में अच्छा, बडा दिन, बच्चा ओर सूर्यनमस्कार जैसे हिंदी शब्दो को स्थान दिया गया है।
हिंदी भाषा के प्रचार के लिए नागपुर में 10 जनवरी 1975 में विश्व हिंदी संमेलन का आयोजन किया गया था जिस में 30 देशो के 122 प्रतिनिधि सामेल हुए थे।
विश्व मे हिंदी के प्रचार प्रसार के हेतु से 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिन मनाया जाता है।
भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी। उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिन्दी दिवस मनाया था
हिंदी दिवस का महत्व
हिंदी दिवस उस दिन की याद में मनाया जाता है जिस दिन हिंदी हमारी राजभाषा बनी। आज हमारी सरकार द्वारा हिंदी को बढ़ावा देने के लिए कई तरह के कार्यक्रम चलाए जाए हैं। हिंदी दिवस के दिन कॉलेज और स्कूल स्तर पर विद्यार्थियों को हिंदी का महत्व बताया जाता है। इस दिन सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिंदी में व्याख्यान आयोजित किये जाते हैं। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हमारी वर्तमान सरकार का कदम सराहनीय है। आज देश के नेता विदेशों में जाकर भी हिंदी में भाषण देने को महत्ता दे रहे हैं। ऐसा इसिलए किया जा रहा है ताकि भारत के साथ-साथ विश्व स्तर पर भी हिंदी भाषा का महत्व समझा जाए। यह हमारी सरकार के प्रयासों का ही नतीजा है तो हिंदी बोलने वालों की संख्या में लगातार इजाफा होता दिख रहा है। बिहार देश का पहला राज्य था जिसने हिंदी को अपनी आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया था। हालांकि इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि भारत में अंग्रेजी बोलने वाले लोगों की तादाद में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है, लेकिन आज भी देश में हिंदी बोलने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है। देश की जनता का एक बडा़ हिस्सा आज भी हिंदी बोलता है। उत्तर भारत के कई राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, उत्तराखंड, हरियाणा, झारखंड आदि में एक बड़ी आबादी हिंदी भाषी लोगों की है। इस बात को हमें हमेशा याद रखना चाहिये कि अपनी मात्र भाषा बोलने से न केवल हम अपनी संस्कृति से जुड़े रहते हैं बल्कि यह हमें एक-दूसरे के करीब लाने का जरिया भी है।
हिंदी को जिंदा रखने के लिए करने होंगे प्रयास
यह सत्य है कि अंग्रेजी भाषा का इस्तेमाल दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अंग्रेजी एक ऐसा माध्यम है जिसका विश्व स्तर पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि हम लोगों को अंग्रेजी सीखनी पड़ती है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल भी नहीं है कि हम अपनी मात्र भाषा को बोलने या सीखने में संकोच करें। अगर हम ऐसा करेंगे तो यह विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाएगी। आज विश्व में ऐसे देश भी है जो अपने देश में केवल अपनी भाषा में ही काम को महत्व देते हैं। रूस, चीन, जापान ऐसे ही उदाहरण है इन देशों में इनकी ही भाषा में काम को महत्व दिया जाता है और यह वजह है कि इनकी भाषा लगातार फल-फूल रही है। क्या ऐसा हमारे देश में होना संभव नहीं? यकीनन ऐसा संभव है, लेकिन उसके लिए हम सबको सोचना होगा। आज अंग्रेजी विश्व की भाषा इसलिए बन पाई क्योंकि अंग्रेजों ने अंग्रेजी को हमेशा जिंदा रखा। वह जहां भी गए उन्हें केवल अंग्रेजी में ही काम और संवाद को महत्ता दी। जिस देश को भी अंग्रेजों ने उपनिवेश बनाया वहां वह अपनी संस्कृति और सभ्यता के निशान छोड़ते गए और देखते ही देखते उनकी सभ्यता और संस्कृति को पूरे विश्न ने अपना लिया। ऐसा हमारी हिंदी के साथ भी हो सकता है, लेकिन इसके लिए हमें लगातार प्रयास करते रहने होंगे। तभी हिंदी को विश्व पटल पर ले जाया जा सकता है। हमें ऐसे कानून बनाने होंगे कि कार्यालयों और स्कूल, कॉलेजों में हिंदी में संवाद और लिखित कार्य को जरूरी बना दिया जाए। तभी हिंदी को बचाया जा सकता है। कहीं ऐसा न हो कि हिंदी एक इतिहास बन रह जाए और हमारी पीढ़ियां केवल किताबों में इसके बारे में जानें।

आओ चलें आविष्कार करें।

Thursday, 10 September 2020

प्रभु की खोज।


"खोज में ही बडा प्रसन्न हु "

"एक दिन घटेगी समाधि 
एक दिन घटेगा बुद्धत्व ।"-  #स्वामी अनंत श्री 

रविन्द्रनाथ की एक प्रसिद्ध रचना है ।
एसी ही भावदशा में गुजरे होंगे ।
परमात्मा को खोजने नीकले है, यहाँ वहाँ ढूँढते ढूँढते, ढूँढते, टटोलते, पूछते-पाछते,,घूमते फिरते है, कहीं परमात्मा का घर मिल जाए।
और,
सौभाग्य से कूछ मार्गदर्शक मिल जाते है, जो बताते हैं कि यहीं परमात्मा का घर है ।
रविन्द्रनाथ लिखते हैं कि, में दबे पाँव 
सीढियों पर चढ़ते हुए, 
एक सुन्दर भवन में पहोंच गया ।
द्वार पर खडा होकर पूरी प्रतीत होती हैं की, 
अंदर है उसकी खोज में पूरा जीवन भटकता रहा ।
हाथ ऊपर ऊठाता है और साॅकल खटखटाने के लिए सोचता है ।
सोचता है,,
अगर वो आ गये तो?
मिलेंगे, 
क्या कहेंगे?
सोचते हैं, 
'ऊसकी खोज में जो इतना आनंद है,उस आनंद को गॅवाना नही है '
रविन्द्रनाथ कहते हैं, 
"और में पीछे पलटता हुं।दबे पाँव वापस लौटता हूँ ।और अब में ऊसे ढूँढते घूम रहा हूँ।जानता हूँ की घर कहाँ है।मुझे खटखटाना नहीं है।मुझे खोज में ही बडा आनंद आता है।"
      -  यही सब आध्यात्मिक लोगों की भावदशा है।
  हे परमात्मा 🙏
     में तेरी खोज में ही बडा प्रसन्न हु ।