मन को मंगल कामनाओं से भर देने को भगवान बुद्ध 'मैत्री भावना' कहते हैं !
मैत्री भावना करनेवाला : ---
1. सुख की नीँद सोता है
2. तरोताज़ा जागता है
3. दुःस्वप्न नहीँ आते
4. मनुष्योँ मेँ प्रिय होता है
5. अमनुष्योँ मेँ प्रिय होता है
6. देवता उसकी रक्षा करते है
7. अग्नि,विष,शस्त्र उसे मार नहीं सकते
8. सहज समाधिस्थ हो सकता है
9. मुखाकृति शांत होती है
10. मृत्युशैया पर मूढ़ नहीं मरता
11. मरने पर अच्छी गति होती है
-🌺🌷भवतु सब्ब मङ्गलम्🌷🌺
मैत्री देते वक्त : ---
अप्रिय, अतिप्रिय, बैरी, विजातीय को पहेले न दें।
खुद को, माँ बाप व आचार्य को, प्रिय मित्र को, अपरिचित को और अंत में बैरी को...इस क्रम में मैत्री दें।
बैरी के लिए मैत्री न जगे तो...
1. बाक़ी आगेवाले सब को बार बार देते रहें ।
2. बुद्ध के मेत्तासुत्तों को याद करें...जिसमें ककचोपमावादसुत्त में कहते हैँ किः मेरे एक एक अंग को आरी से काटे, फिर भी मेरे मन में उसके लिए मेत्ता ही रहे।
3. सोचोः उसने तो मुझे एकबार दुःखी करना चाहा, मैँ खुद को बारबार दुःखी क्यों कर रहा हूँ ?
4. उसने किये हुए उपकारों को याद करें ।
5. सोचोः वह बेचारा ! हम से बैर रखकर भवचक्र में पीसेगा!
6. सोचोः उसने मुझको दुःखी किया वह उसका क्षेत्र, मेरा चित्त तो मेरा क्षेत्र है, मेरे क्षेत्र में मैं मेत्ता जगाऊँ !
7. कर्म का सिद्धांत हैः उसे बैर जगाने का फल मिलेगा...और मैं मेत्ता नहीँ जगाऊँगा तो मुझे भी मिलेगा।
8. सोचोः इस स्थिति में भगवान बुद्ध क्या करते ?
9. सोचोः मेरे अनंत जन्मों में कहीं न कहीं वह मेरा भाई, बहन, माँ, बाप, पति, पत्नी, बेटा, बेटी...रहा होगा ?
10. मेत्ता के फायदे याद करें ।
11. उसके नामरूप का पृथक्करण करके देखें, वह भी तो उत्पादव्यय का पुँज ही तो है! मैं किस पर क्रोध कर रहा हूँ ? उसकी पृथ्वी धातु पर ? अग्नि धातु पर ? वायु धातु पर ? जल धातु पर ? या फिर उसके विञ्ञाण पर ? सञ्ञा, वेदना, संस्कार पर ?
12. फिर भी न जगे तो उसे कोई उपहार दें। यदि वह भी देना चाहे तो सम्यक आजीविका वाला हो तो स्वीकार करें ।
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🌹🌹🌹 सबका मंगल हो 🌹🌹🌹
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