Tuesday, 18 August 2020

कर्मफल

क्या कर्मफल और संस्कार एक ही बात है?

उत्तर--एक ही बात है। 

संस्कार को ही कर्म कहते है। 

कर्म के जो फल आते हैं, उसी प्रकार के आते हैं जिस प्रकार का कर्म था।

कर्म करते हुए जिस प्रकार की शारीरिक संवेदना हुई, उस कर्म का फल भी उसी प्रकार की शारीरिक संवेदना लेकर आएगा।

हमने क्रोध किया। क्रोध करते ही हमने बड़ी जलन पैदा की।अब विपश्यना करते हुए जब वह संस्कार बाहर निकलेगा तो जलन लेकर ही बाहर निकलेगा। जलन लेकर वह बाहर निकला और हम देखने लगे: अनित्य है, देखें कितनी देर रहता है। इस प्रकार देखते देखते परते उतरती चली जाएँगी। 

नहीं तो क्या होगा? यह जो हमारे पुराने संस्कारो का फल गर्मी की संवेदनाओ को लेकर के आया और हमें होश नहीं है, या विपश्यना करते भी हैं लेकिन ठीक से नहीं करते, तो उस गर्मी के प्रति अपने अंतर्मन में द्वेष जगाना शुरू कर देतें हैं। क्योंकि क्रोध का संस्कार था तो क्रोध ही जगायेगा, बिना किसी कारण के क्रोध ही जागेगा। वह बढ़ते बढ़ते बाहर की ऐसी स्थिति पैदा करेगा जिससे और क्रोध जागेगा।

🌷 सारे कर्मफल इसी प्रकार संवेदनाओ के साथ आते है, क्योंकि कर्म भी संवेदनाओ के साथ ही होते हैं, इसलिये फल भी संवेदनाओ के साथ आते हैं।

विपश्यना से कर्मफल अपने आप क्षीण होते चले जाएंगे। 

आया क्रोध संवेदना के रूप में, हमने तटस्थ भाव से देखना शुरू कर दिया, वह क्षीण हो गया। 

क्रोध का जो बड़ा फल आने वाला था वह आ ही नहीं पाया।वहीँ समाप्त हो गयी बात।

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