🌸 🌸 गिरो और उठो 🌸 🌸
नंदक और भरत अपने पूर्व पुण्यों फलस्वरूप भगवान जीवनकाल में एक धनी गृहस्थ के घर जन्मे l बड़े होने पर उन्होंने एक दिन सुना कि उसी नगरी का सोना नामक अत्यंत सुकोमल, सुकुमार और ऐशो-आराम पला हुआ महाधनी-पुत्र अपना घरबार छोड़ कर भगवान पास साधना करते हुए अरहंत अवस्था को प्राप्त गया है। यह सुन कर दोनों भाइयों के मन मे अत्यंत धर्मसंवेग जागा और दोनों प्रव्जित होकर विपश्यना-साधना अभ्यास जुट गये। भाई भरत अपने सत्प्रयत्नों द्वारा थोड़े ही समय में सारे विकारों से छुटकारा पाकर अरहंत अवस्था को प्राप्त हो गया। परंतु छोटे भाई नंदक की राह मे बहुत बाधाएं आ रही थी l यद्यपि उसने प्रयत्न बहुत किया परंतु अनेक जन्मों से संगृहीत विपुल कषायों के कारण एक-पर-एक बाधा आती रही, अंतराय आता रहा। शरीर की संवेदनाओं के आधार पर अनित्यबोध प्रज्ञा नहीं जाग सकी। अतः नंदक बहुत निराश उठा। साधना करने का सारा उत्साह खो बैठा। भरत ने जब अपने भाई की यह दशा देखी तब उसके मन में पुनः उत्साह जगाने लिए कुछ देर धर्मचर्चा करता रहा। साधना की विधि समझाते हुए वह अपने भाई के साथ ध्यान केन्द्र के बाहर टहलने निकल गया। कुछ दूर जाने पर रास्ते के किनारे बैठ कर भाई को उत्साहित करने के लिए धर्म-प्रबोधनी बातें करता रहा।
इतने में देखा कि बैलगाड़ियों का एक कारवां चला आ रहा है और देखा कि उनमें से एक गाड़ी का चक्का गहरे दलदल में धँस गया है। बैल स्वयं भी घुटने-घुटने कीचड़ में धंसा हुआ गाड़ी चलाने का प्रयत्न करता रहा, पर असफल रहा और अंततः वहीं गिर पड़ा। गाड़ी वाले ने तुरंत बैल को जुए से खोल कर बाहर निकाला और दाना-पानी दे कर स्वस्थ किया। कुछ देर बाद पीठ थपथपा कर फिर गाड़ी में जोत दिया। बैल उत्तम जाति का था। प्रशिक्षित था। उसने अपना सारा बल लगाया और गाड़ी को दलदल के बाहर निकाल कर आगे बढ़ चला।
यह देख कर भरत ने भाई नंदक को कहा, “देखा, इस बैल के पुरुषार्थ को?”
नंदक ने उत्तर दिया, "हां, देखा। जिस प्रकार यह पुरुषार्थ बैल अपने पूरे पराक्रम से बैलगाड़ी को गहरे दलदल से निकाल सका, वैसे ही मैं भी अपना पूरा परिश्रम लगा कर इस भवसंसार के दलदल से बाहर निकलूंगा ही।"
और इस प्रसंग से असीम प्रेरणा पाकर नंदक विपश्यना में जुट गया। अब तक विफलता-ही-विफलता का सामना करने वाला निराश नंदक, अब परम उत्साह के साथ काम करता हुआ सफलता को प्राप्त हुआ। विपश्यना के तेज से सारे बंधनों को जला कर पूर्णतया मुक्त हुआ, अरहंत अवस्था को प्राप्त हुआ। साधना सफल हुई। साधक धन्य हुआ।
विजय के हर्ष-उल्लास में नंदक ने इस प्रसंग को याद कर के ही यह वृषभनाद किया; " सम्यक संबुद्ध का सम्यक दर्शन-संपन्न श्रावक उस भद्र जातीय वृषभ के समान ही है, जो कि किन्हीं कारणों से गिर पड़ने पर भी और अधिक संवेगबल से उठ खड़ा होता है और आगे बढ़ जाता है।"
🌸 सुख दुःख आते ही रहे,
ज्यों आवे दिन रेन I
तू क्यों खोये बावला,
अपने मन की चैन I I 🌸
🌸 अनचाही होव कभी,
मनचाही भी होय I
धूप छाव की जिंदगी,
क्या नाचे क्या रोये I I 🌸
🌸 जीवन में आता रहे,
पतझड़ और बसंत I
चित्त विचलित होवे नहीं ,
मंगल जगे अनंत I I 🌸
Source: Jage Pavan Prerna book
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*💐 "कर्म संस्कार" 💐*
पाप के गहरे संस्कार जन्म जन्मांतरों तक हमारे शत्रु की तरह साथ लगे रहते हैं, और दुखद स्थितियां पैदा करते रहते हैं।
इसी प्रकार गहरे पूण्य संस्कार हमारे मित्र की तरह जन्म जन्मांतरों तक चित्तधारा के साथ लगे रहते हैं और हमारी सहायता करते हैं, सुखद फल देते हैं। संकट में हमारी रक्षा करते हैं।
वन में, रण में, शत्रुओ में, जल या अग्नि के बीच में, समुद्र में या पर्वत शिखर पर अथवा सोये हुए असावधान रहते हुए अथवा विषम परिस्थिति में पड़े हुए व्यक्ति की पूर्व जन्म के पूण्य रक्षा करते हैं।
🌻ये पूण्य अथवा पाप कर्मो के संस्कार साथ कैसे रहते हैं, इसे भी समझो।
संस्कारो को जीवन की चित्तधारा अपने साथ लिये चलती है। ये कर्म संस्कार कोई ठोस पदार्थ नही है।कर्म संस्कार तरंगो के रूप में चित्तधारा की तरंगो से सम्मिश्रित हो जातें हैं और सम्पूर्ण चित्तधारा को प्रभावित करते रहतें हैं।शरीर को प्रभावित करते रहते हैं।
शरीर और चित्त की मिली-जुली जीवनधारा को प्रभावित करते रहते हैं।
अच्छे-बुरे कर्म संस्कार चित्त का अच्छा या बुरा स्वभाव बनाते हैं।
🌺यह कर्म संस्कारो की ऊर्जा(energy) ही है जो जीवनधारा को अच्छाई या बुराई की और धकेलती हुई आगे बढ़ाती है।
जब जीवन का अवसान(death) होता है तब शरीर चित्त की धारा के साथ चलने में असमर्थ हो जाता है तो दोनों का अलगाव(separation) होता है। इसी को मृत्यु कहते हैं।
🌷चित्त की चेतना से अलग हुआ मुर्दा शरीर (decompose) होता रहता है।
शरीर से अलग हुई चित्तधारा किसी अन्य शरीर से तत्काल जुड़कर प्रवाहमान होने लगती है। इसी को पुनर्जन्म कहते हैं।
🌼प्रत्येक जीवन में हलके और भारी, अच्छे और बुरे संस्कार बनते ही रहते हैं।निसर्ग के यानि धर्म के नियम इतने परफेक्ट और वेल आर्गनाइज्ड है कि एकाउंटिंग सिस्टम के सॉफ्टवेयर की तरह अच्छे या बुरे कर्म संस्कार पूण्य और पाप के खाते में अपने आप निवेशित होते जाते है।और जीवन में जिस जिस कर्म का फल प्रकट होकर उसका भुगतान हो जाता है वह उस अकाउंट में डेबिट हो जाता है। यानी समाप्त हो जाता है।
प्रतिक्षण की बैलेंस शीट तैयार रहती है।इस जीवन के अंतिम क्षण के समय चित्तधारा के पाप-पूण्य की जो बैलेंस शीट है, अगले जीवन के प्रथम क्षण में इसी बैलेंसशीट के साथ चित्तधारा आगे बढ़ती है।
शरीर की च्युति हो गयी, किन्तु चित्तधारा चलती रही।
नए शरीर के साथ जुड़ते ही तत्काल चल पड़ी। बीच में एक क्षण का भी गैप नही होता।
🌼पिछले जन्म की चित्तधारा का प्रवाह नए जन्म में वैसे ही चलना आरम्भ हो जाता है और उसके साथ आ रही पाप-पूण्य की बैलेंसशीट में उसी प्रकार पाप-पूण्य क्रेडिट-डेबिट होते रहते हैं।
यों जीवनधारा एक से दूसरे जन्म मे चलती रहती है।
वस्तुतः संस्कार है तो जीवनधारा है।
चित्त सारे संस्कारो से मुक्त हो जाए तो नया जीवन ही न हो सके।जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा हो जाए। पर संस्कार कायम है इसलिये एक जन्म के बाद दूसरा जन्म होता है।
🌸जीवन के साथ ख़त्म होते ही उसके साथ संस्कार ख़त्म नही हो जाते।परंतु संस्कार ख़त्म हो जाय तो जीवनधारा समाप्त हो जाती है। अगला जन्म नही हो पाता।
*.... आचार्य सत्य नारायण गोयंका*
शुद्ध धर्म में डुबकी लगते ही सारा अहं पिघल गया🌷
कल्याणमित्र गोयन्काजी के साधना शिविरों में विविध सम्प्रदायों के गुरुजन आते हैं और साधना करके खूब आगे बढ़ते हैं।
एक समय एक महायोगी विपश्यना की तारीफ सुनकर शिविर में आये। वे साधक तो थे पर खूब तामसिक स्वभाव के थे। अपनी साधना के कारण कुंडलिनी जाग्रत हुई परंतु उसके परिणामस्वरूप आकुलता, व्यग्रता आदि बढ़ गयी। काम-क्रोध भी बढ़ गये। परिस्थिति विकट बन गयी। जो दूसरों को सिखाता था उसकी अपनी हालत दारुण दयनीय हो गयी। इसी कारण उसने विपश्यना शिविर में आने का
निश्चय किया।
स्वयं योग का गुरु था इस 'अहं' के कारण उसने श्री गोयन्काजी से कहा कि सभी सामान्य साधकों के साथ मैं नीचे नहीं बैठ सकता, क्योंकि मैं भी तो एक गुरु हूं। इसलिए समकक्ष और आपके जितना ऊंचा आसन मुझे दिया जाय। उसकी जिद को देखते हुए उसे ऊंचे आसन पर बिठाया गया।
उसने पहले साधना तो की ही थी, इसी कारण साधना में निष्ठा के साथ लग गया। चौथे दिन विपश्यना मिलते ही चमत्कार हुआ। अंग-अंग का अणु-अणु जाग्रत हो उठा । साधना के फलस्वरूप दिव्य जागृति हुई। कभी नहीं अनुभव की थी वैसी परम शांति मिली। नम्रता तथा विवेक जागे । एकदम ऊंचे आसन से उठकर नीचे उतरकर कल्याणमित्र गोयन्काजी के पैर पकड़ लिये। उसका 'अहंभाव' टूटा और कल्याण हो गया। इसी प्रकार सब का मंगल हो।
पुस्तक : विपश्यना लोकमत (भाग-1)
विपश्यना विशोधन विन्यास ।।
भवतु सब्ब मगंलं !!
🙏🙏🙏
विपश्यना - कामवासना से मुक्ति का वैग्यानिक रास्ता
आचार्य सत्यनारायण गोयन्का
कामवासना मानवमन की सबसे बड़ी दुर्बलता है । जिन तीन तृष्णाओं के कारण वह भवनेत्री में बंधा रहता है उसमें कामतृष्णा प्रथम है , प्रमुख है । माता पिता के काम संभोग से मानव की उत्पत्ति होती है । अतः अंतर्मन की गहराइयों तक कामभोग का प्रभाव छाया रहता है । इसके अतिरिक्त अनेक जन्मों के संचित स्वयं अपने काम संस्कार भी साथ चलते ही हैं । अतः मुक्ति के के पथ पर चलने वाले व्यक्ति के लिए काम भोग के संस्कारों से छुटकारा पाना बहुत कठिन होता है । विपश्यना करनी न आए तो असंभव ही हो जाता है ।
काम वासनाओं से छुटकारा पा कर कोई व्यक्ति ब्रह्मचर्य का जीवन जीना चाहता है परंतु बार बार मन में वासना के तूफान उठते हैं और उसे व्याकुल बनाते हैं । कहीं ब्रह्मचर्य भंग न हो जाए इसलिए वह कठोरतापूर्वक वासनाओं का दमन करता है ओर परिणामतः अपने भीतर तनाव की ग्रंथियां बांधता है दमन द्वारा वासनाओं से मुक्ति मिलती नहीं । भीतर ही भीतर वासना उमड़ती कुलबुलाती रहती है और मन को मोहती रहती है। या दमन द्वारा ब्रह्मचर्य पालने वाला कोई विश्वामित्र जैसा साधक मेनका जैसी अप्सरा की रूप माधुरी पर फिसल जाता है तो आत्मग्लानि, आत्मक्षोभ और आत्मगर्हा से भर उठता है । ऐसा होने पर अपराध की ग्रथियां बांध बांध कर अपनी व्याकुलता को और बढ़ाता है ।
इसीलिए फ्रायड जैसे मनोविज्ञानवेत्ता ने कामवासना के दमन को मानसिक तनाव और व्याकुलता का प्रमुख कारण माना और काम भोग की खुली छूट को प्रोत्साहित किया । अनेक लोग इस मत के पक्षधर बने । आज के युग के कुछएक साधना सिखाने वाले लोग भी इस बहाव में बह कए । ऐसे लोगों ने रोग को तो ठीक तरह से समझा, पर रोग निवारण का जो इलाज ढूंढा, वह रोग के बढ़ाने का ही कारण बन बैठा । काम वासना का दमन एक अंत है , जो सचमुच रोग निवारण का सही उपाय नहीं है । परंतु उसे खुली छूट देना ऐसा दूसरा अंत है जो कि रोग निवारण की जगह रोग संवर्धन का ही काम करता है ।
जब कोई व्यक्ति बुद्ध बनता है तो तृष्णा के सभी बंधनों को भग्न करके विकार विमुक्ति के ऐश्वर्य का जीवन जीता है । इसीलिए वह भगवान कहलाने का अधिकारी होता है । ऐसा व्यक्ति काम तृष्णा, भव तृष्णा और विभव तृष्णा , इन तीनों से छुटकारा पा लेता है और जिस विपश्यना विद्या ( भगवान बुद्ध की ध्यान की विधि ) द्वारा यह मुक्त अवस्था प्राप्त की , उसे ही करुण चित्त से लोगों को बांटता है ।
विपश्यना साधना की विधि न विकारों के दमन के लिए है और न उन्हें खुली छूट देने के लिए । विपश्यना विधि इन दोनों अतियों के बीच का मध्यम मंगल मार्ग है जो जागे हुए विकार को साक्षी भाव से देखना सिखाती है जिससे कि अतंर्मन की गहराइयों में दबे हुए काम विकारों को भी जड़ से उखाड़ना का काम शुरू हो जाता है कुशल विपश्यी साधक समय पाकर इस विधि में पारंगत होता है और कामविकारों का सर्वथा उन्मूलन कर लेता है । और सहज भाव से ब्रह्मयर्च का पालन करने लगता है । इसके अभ्यास में समय लगता है । बहुत परिश्रम , पुरूषार्थ , पराक्रम करना पड़ता है । परंतु यह पराक्रम देहदंडन का नहीं , मानस दमन का नहीं , बल्कि मनोविकारों को तटस्थ भाव से देख सकने की क्षमता प्राप्त करने का है जोकि प्रारम्भ में बड़ा कठिन लगता है पर लगन और निष्ठा से अभ्यास करते हुए साधक देखत है कि शनैः शनैः उसके मन पर वासना की गिरफ्त कम होती जा रही है ।दमन नहीं करने के कारण कोई तनाव भी नहीं बढ़ रहा है और समय पा कर सारे कामविकारों से मुक्त हो कर ब्रह्मचर्य का जीवन जीना सहज हो गया है । यह सब कैसे होता है । इसे समझें ।
पुरुष के लिए नारी के और नारी के लिए पुरुष के रूप, शब्द, गंध, रस और स्पर्शसे बढ़ कर अन्य कोई लुभावना आलंबन नहीं होता । यह पांचों आलंबन आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा कीं इंद्रियों पर आघात करते हैं अथवा इनकी याद और कल्पना चिंतन के रूप में मन की इंद्रिय पर आघात करती है तो ही वासना के विकार जगने का काम आंरंभ होता है । पहली पांचों इंद्रियां शरीर पर स्थापित है ही । छठी मन की इंद्रिय भी शरीर की सीमा के भीतर ही होती है । अतः विपश्यना साधना का अभ्याय साढ़े तीन हाथ की काया के भीतर ही किया जाता है बाहर नहीं । कामतृष्णा जहां जागती है, वहीं उसे जड़ से उखाड़ा जा सकता है, अन्यत्र नहीं । साढ़े तीन हाथ की काया में इंद्रिय सीमाक्षेत्र के भीतर इसकी उत्पत्ति होती है , यहींनिवास और संवर्धन होता है । अतः विश्यना द्वारा यहीं इसका उन्मूलन किया जा सकता है देखना यह है कि बाहर के आलंबन ने अपने भीतर क्या खट पट शुरू कर दी । आंख कान, नाक, जीभ और त्वचा पर रूप , शब्द गंध, रस और स्पर्ष का संपर्क होते ही यानी प्रथम आघात लगते ही अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर तत्संबंधित इंद्रिय दरवाजे पर और फिर सारे षरीर पर प्रकंपन होता हैं फस्स पच्चया वेदना स्पर्श होते हीं संवेदना होती है । जैसे कांसे के बर्तन को छू देने से उसमें झंकार की तरंगें उठती हैं इस प्रथम आघात के तुरंत बाद मानस का वह हिस्सा जिसे संज्ञा कहें याबुद्धि कहं वह अपने पूर्व अनुभव और याददाश्त के आधार पर इस आलंबन को पहचानता है ‘‘ यह पुरुष अथवा नारी का रूप , शब्द, गंध आदि है । और फिर उसका मूल्यांकन करता है ओह बहुत सुंदर है बहुत मधुर है ं ऐसा करने पर षरीर पर होने वाली यह तरंगे प्रिय प्रतीत होने लगती हैं और मानस उनके प्रति राग रंजित हो कर उनमें डूबने लगता है । वेदना पच्चया तण्हा संवेदना से ही ( काम ) तृष्णा होती है । यही से वासना का दौर शुरू हो जाता है । बार बार रूप, शब्द गंध आदि संबंधित इंद्रियों से टकराते हैं , बार बार प्रिय मूल्यांकन होता है बार बार प्रतिक्रिया स्वरूप वासना के संस्कार बनते हैं । यों क्षण प्रतिक्षण एक के बाद एक वासना के संस्कार बनते बनते पत्थर की लकीर जैसे गहरे हो जाते हैं जब रूप, षब्द, गंध, रस आदि बाहर आलंबन प्रत्यक्षतः आंख, कान नाक आदि इंद्रिय द्वारों से संपर्क करना बंद कर देते हैं तो छठी इंद्रिय का दरवाजा खुल जाता है , अब मन की इंद्रिय पर पूर्व अनुभूत रूप, शब्द, गंध आदि के आंलबन कल्पना और चिंतन के रूप में टकराने लगते हैं, फिर वही क्रम चल पड़ता है । आघात से प्रकंपन का होना , फिर प्रिय मूल्यांकन, फिर संवेदना, फिर प्रतिक्रिया स्वरूप वासना के संस्कारों की उत्पत्ति । क्षण प्रतिक्षण चिंतन का आंलबन चित्तधारा से टकराता रहता है औरक्षण प्रतिक्षण वासना का संस्कार पैदा होता रहता है । यह क्रम जितनी देर चलता है , वासना उतनी बलवान होती जाती है । मन पर उमड़ती हुई यह तीव्र वासना वाणी और शरीर पर प्रकट कोने के लिए मचल उठती है । सारा का सारा चित्त वासना के प्रवाह में आमूल चूल डूब जाता है । वासना में डूबें हुए व्यक्ति की सति याने स्मृति ( यहां स्मृति का अर्थ याददाश्त नहीं है । ) यानि जागरूकता बनी रहती है वासना व्यथित व्यक्ति स्मृतिमान रहता है याने सजग रहता है । परंतु सजग रहता है केवल रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श अथवा चिंतन के आलंबन के प्रति ही । इन छह में से किसी न किसी आलंबन पर उसका ध्यान लगा रहा है । यही आलंबन का ध्यान वासना को उद्दीप्त करता है । अतः स्मृति रहते हुए भी इसे सम्यक स्मृति याने सही स्मृति नहीं कहते । मिथ्या स्मृति कहते है, सति मुट्ठा कहते हैं इन छह आलंबनों में से कोई एक भी तत्संबंधित इद्रिय द्वार के संपर्क में आता है तो स्वानुभव का काम शुरू हो जाता है । संपर्क होते हं तरंग रूपी वेदना को होना, संज्ञा द्वारा मूल्यांकन करना, संवेदना का प्रिय लगना और प्रिय संवेदना का रसास्वादन करते हुए वासना के संस्कार की प्रतिक्रिया का आंरंभ होना, यह सब स्वानुभूति का क्षेत्र है । अतः सत्य का क्षेत्र है । इसके प्रति सजग रहे तो स्मृति सम्यक है। केवल मात्र आलंबन के प्रति सजग रहे आलंबन के स्पर्श का भी निरीक्षण न कर सके, उसके आगे की स्वानुभूतियां तो दूर रहीं, तो स्मृति मिथ्या ही हुई, क्योंकि गहरी अनुभूति वाल क्षेत्र भुलाया हुआ है ।
स्मृति याने जारूकता जब सम्पजज्ज से जुड़ती है तो सम्यक हो पाती है । साधक आताप सम्जनानो सतिमा हो जाता है । इसी को विपश्यना कहते हैं । इसी को सतिपठ्टान कहते हैं याने सति का सम्यक रूप से स्वानुभूतिजन्य सत्य में प्रतिष्ठापित हो जाना । विपश्यी साधक यही करता हैं वह सत्यदर्शी होता है आत्मदर्शी होता है। आत्मदर्शी के माने जिसका कभी स्वयं अनुभव किया ही नहीं ऐसी सुनी सुनाई, पढ़ी पढ़ाई दार्शनिक मान्यता वाली कल्पित आत्मा का दर्शन करना नहीं । यहां आत्मदर्शन का अर्थ है स्वदर्शन । अनुभूतियों के स्तर पर अपने बारें में जिस जिस क्षण जो जो सच्चाई प्रकट हो उसे ही साक्षीभाव से देखना सत्यदर्शन है , स्वदर्शन है । आत्मदर्शन है । मुक्ति का सहज उपाय है । किसी कल्पना का ध्यान मन को कुछ देर के लिए भरमाए भले ही रखे पर विकार विमुक्त नहीं कर सकता । कोरे बौद्धिक अथवा भक्ति भावावेशमूलक मान्यताओं के दायरें बाहर निकल कर साधक अनुभूति के स्तर पर यथार्थ की भूमि पर कदम रखता है । जो सत्य है उसे केवल मान कर नहीं रह जाता उसे जानता है जनाति और प्रज्ञापूर्वक जानता है पजानाति । साक्षीभाव से तटस्थ भाव से बिना राग के, बिना द्वेश के बिना मोह के यथाभूतः जैसा है वैसा, उसके सत्य स्वभाव में, यथार्थ को जानता है । मात्र जानता है । कोई प्रतिक्रिया नहीं करता, न उसे दूर करने की न उसे रोके रखने की । केवल दर्शन, केवल ज्ञान यही है पजानाति ।
बाहर का आंलंबन चाहे जो हो , अपने भीतर कामवासना जागी तो बाहर के आलंबन को गौण मानकर अपने भीतर की अनुभूतिजन्य सच्चाई को जानने का अभ्यास साधक शुरू कर देता है । सन्तं वा अज्झत्तं कामच्छन्दं- जब भीतर कामतृष्णा है तो अत्थि मं अज्डद्यझत्तं कामच्छन्दोति पजानाति - मेरे भीतर कामवासना याने कामतृष्णा है यह प्रज्ञापूर्वक जानता है प्रज्ञापूर्वक इस माने में भी कि यह अनित्य स्वभाव वाली है अनंतकाल तक बनी रहने वाली नहीं । इस समझदारी के साथ तटस्थभाव बनाए रखता है । उसे दूर करने की जा भी कोशिश नहीं करता, अन्यथा दमन के एक अंत की ओर झुक जाएगा । और न हीं उसे वाणी और शरीर पर प्रकट कोने की छूट देता हैं अन्यथा आग में घी डालने वाले दूसरे अंत की ओर झुक जाएगा । उसके अनित्य सवभाव को समझते हुए केवल जानता है पजानाति । क्योंकि अब उसे बढ़ावा नहीं मिल रहा, इस सच्चाई को भी महज साक्षीभाव से प्रज्ञापूर्वक जान लेता हैं असंन्तं वाअज्झत्तं कामच्छन्दं - नहीं है भीतर कामछंद तो , नत्थि में अज्झत्तं कामच्छन्देति पजानाति - मेरे भीतर कामछंद नहीं हैं , इस सच्चाई को प्रज्ञा पूर्वक तटस्थभाव से जानता है । और क्योंकि विष्यना कर रहा है तो सतिमुट्ठा नहीं हुई , सतिपट्ठान का अभ्सायी है याने, अपने भीतर नामरूप याने चित्त और शरीर के प्रंपच को प्रज्ञापूर्व अनुभूति के स्तर पर जानने को काम कर रहा है । इसी को सति के साथ सम्पजञ्ञ को जोड़ना कहते हैं । शरीर चित्त का प्रपंच वेदनाओं के रूप में प्रकट होता है । साधक मानस पर जागी हुई संवेदनाओं को तटस्थभाव से देखत है । ये संवेदनांए अतंर्मन से जुड़ी रहती हैं अतः मन की उदीरणा शुरू हो जाती है । इन पूर्व संचित अनुत्पन्न कामवासनाओं का उत्पाद शुरू हो जाता है यथा च अनुप्पन्नस्स कामच्छन्दस्स उप्पादो होति तत्च पजानाति । और उदीर्ण हुई इस चिरसंचित कामवासना को भी साक्षीभाव से संवेदनाओं के स्तर पर देखते रहता है तो उन पुराने संस्करों की परत पर परत उतरते हुए उनकी निर्जरा होती जाती है , उनका क्षय होते जाता है । यथाच उप्पन्नस्स कामच्छन्दस्स पहानं होततिञ्च पजानाति - यों उदीरणा और निर्जरा होते होते प्रहाण क्षय होते होते एक समय ऐसा आता है, जब कि अंतर्मन की गहराई तक के कामतृश्णा के सारे संस्कार उखड जाते हैं उनका नाम लेख तक नहीं रहता । अब कोई कामवासना जागती हीं नहीं । न किसी वर्तमन के आलंबन के कारण और न कोई पुराने संग्रह में से । यथा च पहीनस्स काच्छन्दस्स आयतिं अनुप्पादो होति तञ्च पजानाति । साधक परम मुक्त अवस्था तक पहुँच जाता है ।
जो परिश्रम करे , वही इस मुक्त अवस्थात क पहुँचे । किसी भी जाति का हो, वर्ण का हो, रंग रूप हा हो , देश विदेश का हो, बोली भाषा का हो जो करे वही मुक्त । जो न करे उसे लाभ कैसे मिले भला । कोई कोई इसीलिए नहीं करता कि यह तो हमारी पंरपरागत दार्शनिक मान्यता के अनुकूल नहीं है हम क्यों करें । कोई कोई इसलिए नहीं करता कि यह हमारी मान्यता कितनी महान है । इस गर्व गुमान में ही संतुष्टि कर लेता है । मान्यताओं में उलझे हुए लोग विपश्यना नहीं कर सकते , इससे लाभान्वित नहीं तो सकते । करें तो लाभान्वित होंगे ही । ।
🌷 समझो ये कर्म संस्कार कैसे बने?
A )जो भी विचार हमारे मन में चल रहा है यदि वो आया और थोड़ी देर में निकल गया तो भी कर्म संस्कार बनेंगे पर पानी की लकीर जैसे बनेंगे। उनका कोई प्रभाव नही होगा। जैसे जैसे बनते गए, वैसे वैसे समाप्त होते गए।
B) यदि उसका चिंतन देर तक चलता रहा तो बालू की लकीर जैसे बनेंगे। वो भी समय पाकर समाप्त हो जाते हैं। वो इतने बलवान नही होते की हमें एक नया जन्म दे सके।
C) लेकिन जब वे ही विचार बार बार उत्पन्न होते हुए इतने गहरे हो जाएँ की जैसे पत्थर पर छेँनी और हथोड़े से गहरी लकीर कर दें, तो भले हमने वाणी से कुछ नहीं कहा, भले हमने शरीर से कोई ऐसा काम नहीं किया पर मन ही मन ये अवस्था पैदा कर ली की जैसे वाणी से दुष्कर्म करते हुए मन की क्या अवस्था होती, वैसी अवस्था हमने अख्तियार(acquire) कर ली।शरीर से दुष्कर्म करते हुए मन की क्या अवस्था होती वो हमने अख्तियार कर ली, और कर्म तो मन का ही होता है।
मन का कर्म ही फल देता है।
पत्थर की लकीर वाला जो कर्म होगा वो इतना गहरा होगा की उनमे से कोई न कोई मृत्यु के समय जागेगा और अगले जन्म का कारण बन जायेगा।
तो यह जो भव संसरण है, जन्म मरण का चक्कर है वह मन के इन पत्थर की लकीरो जैसे कर्म संस्कारो की वजह से चलायमान होता है।
इसलिए मन पर संयम रखना बहुत आवश्यक है।
इन तीनों प्रकार के संस्कारों की उत्पत्ति जाने और अनजाने में अधिकतर समय होती ही रहती है। इन्हीं संस्कारों की उत्पत्ति को भगवान ने अनउत्पन्न संयोजन बताया है, जो खंद पर्व के अनुसार हमारे शरीर में छिपते रहते हैं। विपस्सना करते समय इन्हीं अनउत्पन्न संयोजनों की उत्पत्ति होती रहती है और आयतन पर्व के अनुसार इनका पहाण अर्थात् शरीर से परित्याग होता रहता है। तथा प्रहाण होने के बाद ये संयोजन वापिस नहीं आ सकते। ये सारी बातें साधक प्रज्ञा पूर्वक जानने लगता है।
🌷प्रश्न- ईश्वर क्या है ? कहां है ? कौन है ? कैसा है ?
उत्तर:- हम क्या कहें भाई ? हम तो कहते हैं सत्य ही ईश्वर है । परम सत्य ही परमेश्वर है । अरे, अपने भीतर की सच्चाई को देखने लगे और देखते-देखते चित्त और शरीर, इन दोनों की सारी सच्चाई देख ली। स्थूल से स्थूल, वहाँ से शुरू करके सूक्षम से सूक्षम - सारा प्रपंच देख लिया इसका अतिक्रमण करके शरीर औरे चित्त के परे जो इन्द्रियातीत अवस्था है, उस अवस्था पर पहुंच गये, जो नित्य है, शाश्वत है, ध्रुव है ; उसका कोई नाम नहीं, उसका कोई रूप नहीं, आकृति नहीं---- उसका साक्षात्कार हो गया तो अपने आप ईश्वर का साक्षात्कार हो गया । यह साक्षात्कार करना चाहिए । केवल बुद्धि से मानने और न मानने से कोई बात बनती नहीं ।
🌹गुरूजी क्या आपकी ध्यान विधि में भगवत्प्राप्ति का प्रावधान नही है?
उत्तर--बिलकुल है!
भगवत्प्राप्ति का ही काम करना है।
हम अपने आपको भगवान् बनाने का ही काम करते हैं। यह स्वयं को भगवान् बनाने की साधना है।
भगवान् क्या होता है- जिसका राग भग्न हो गया, द्वेष भग्न हो गया, मोह भग्न हो गया वह मुक्ति के ऐश्वर्य का जीवन जीने वाला व्यक्ति भगवान् हो गया। उस अवस्था तक पहुँचने के लिये साधना कर रहें हैं। यह भगवत्प्राप्ति नही है तो और क्या है। हर व्यक्ति भगवत्प्राप्ति कर सकता है, भगवान् बन सकता है। उस अवस्था को प्राप्त कर सकता है। यह सब प्रैक्टिस करने से हो पायेगा। किसी की कृपा से नही। स्वयं काम करना होगा।
🌺🌺क्या कर्मफल और संस्कार एक ही बात है?
उत्तर--एक ही बात है।
संस्कार को ही कर्म कहते है।
कर्म के जो फल आते हैं, उसी प्रकार के आते हैं जिस प्रकार का कर्म था।
कर्म करते हुए जिस प्रकार की शारीरिक संवेदना हुई, उस कर्म का फल भी उसी प्रकार की शारीरिक संवेदना लेकर आएगा।
हमने क्रोध किया। क्रोध करते ही हमने बड़ी जलन पैदा की।अब विपश्यना करते हुए जब वह संस्कार बाहर निकलेगा तो जलन लेकर ही बाहर निकलेगा। जलन लेकर वह बाहर निकला और हम देखने लगे: अनित्य है, देखें कितनी देर रहता है। इस प्रकार देखते देखते परते उतरती चली जाएँगी।
नहीं तो क्या होगा? यह जो हमारे पुराने संस्कारो का फल गर्मी की संवेदनाओ को लेकर के आया और हमें होश नहीं है, या विपश्यना करते भी हैं लेकिन ठीक से नहीं करते, तो उस गर्मी के प्रति अपने अंतर्मन में द्वेष जगाना शुरू कर देतें हैं। क्योंकि क्रोध का संस्कार था तो क्रोध ही जगायेगा, बिना किसी कारण के क्रोध ही जागेगा। वह बढ़ते बढ़ते बाहर की ऐसी स्थिति पैदा करेगा जिससे और क्रोध जागेगा।
🌷 सारे कर्मफल इसी प्रकार संवेदनाओ के साथ आते है, क्योंकि कर्म भी संवेदनाओ के साथ ही होते हैं, इसलिये फल भी संवेदनाओ के साथ आते हैं।
विपश्यना से कर्मफल अपने आप क्षीण होते चले जाएंगे।
आया क्रोध संवेदना के रूप में, हमने तटस्थ भाव से देखना शुरू कर दिया, वह क्षीण हो गया।
क्रोध का जो बड़ा फल आने वाला था वह आ ही नहीं पाया।वहीँ समाप्त हो गयी बात।
🌹गुरूजी एक प्रश्न है भविष्यवाणी के बारे में। कई बार समस्याओ से हैरान होकर अथवा महज कौतूहलवश हम किसी ज्योतिषी के पास चले जाते हैं।
हम कहाँ तक ऐसी चीजो में विश्वास करें?
क्या इनमे सचमुच हमारा मंगल या अमंगल समाया हुआ है?
उत्तर--भले ही इसे कोई वैज्ञानिक कहे, पर सच्चाई तो यही देखते हैं कि इसके नाम पर आजीविका चलाने वालो के चक्कर में अधिकाँश लोग धोखा ही खाते हैं।
इस अन्धविश्वास में हानि ही हानि है।
लाभ का कोई कारण नही दीखता।
🍁यदि किसी को यह कह दिया जाय कि तेरा भविष्य अंधकारमय है तो वह बेचारा निराशा और भय की ग्रंथि से व्याकुल हो उठता है।
जिस काम को करने में वह कुशल भी था, अब मानसिक कुंठा के कारण उसे ही ठीक से नही कर पाता।बस यही समझता है की परिणाम तो ख़राब ही आएगा।
और जिसका भविष्य उज्ज्वल बता दिया वह भी कभी कभी अपने परिश्रम में शिथिलता ले आता है।इस विशवास के मारे , कि सफलता तो उसके भाग्य में लिखी ही है, चाहे वह परिश्रम करे या ना करे, वह तो प्राप्त होगी ही।
अपने पूर्व कर्मो के फलस्वरूप सचमुच सफलता मिल जाए तो इसे ज्योतिषी की करामात मानकर उसका गुलाम हो जाता है और उसपर अपना धन बर्बाद कर देता है।
🌺और यदि उज्जवल भविष्यवाणी के विपरीत असफलता का परिणाम आ जाय तो उसकी निराशा और उसका डिप्रेशन उसके भविष्य को और अधिक कालिमा से भर देता है।
🌷अतः भविष्यवाणी में अपना मंगल या अमंगल देखना हितकर नही है।
🍀सुखकर है !🍀
श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के द्वारा बनाए गए जेतवन विहार में एक बार बहुत से भिक्खु , संसार में कौनसा सुख है ? यह विषय पर चर्चा कर रहे थे।
भिक्खु इस बात पर विचार कर रहे थे कि विभिन्न लोगों और वस्तुओं के लिए धनवान होना और राजा की तरह ऐश्वर्यशाली होना सुख है,तो कुछ लोगों के लिए काम-अनुराग सुख है, कोई भोजन में सुख देखता है, खाने-पीने में सुख देखता है , तो कोई अन्य में।
भिक्खुओं में चर्चा चल रही थी, उस समय तथागत का आगमन हुआ। भिक्खुओंं को चर्चा रत देख भगवान ने पूछा-
भिक्खुओं ! किस बात पर चर्चा हो रही है ?
भिक्खुओं ने अपनी चर्चा का मुद्दा बताया।
तब भगवान ने कहा,
"भिक्खुओं ! जितने भी सुख तुमने बतायें हैं, ये इनमें से कोई भी तुम्हें जन्म जन्मांतर के भवचक्र से मुक्ति देने वाला नहीं है। यह सारा संसार सुख- दु:खमय है।
भगवान ने गाथा में कहा-
"सुखो बुद्धानं उप्पादो,
सुखा सद्धम्मदेसना ।
सुखा संघस्स सामग्री,
समग्गानं तपो सुखो ।।"
(धम्मपद: बुद्ध वग्गो)
सुखदायक है-
बुद्धों का जन्म,
सुखदायक है- सद्धम्म का उपदेश।
संघ में एकता सुखदायक है,
सुखदायक है-
एकता युक्त हो कर तप करना ।
"किच्छो मनुस्सपटिलाभो,
किच्छं मच्चान जीवितं।
किच्छं सद्धम्मसवणं,
किच्छो बुद्धानं उप्पादो।"
बुद्ध का जन्म दुर्लभ है,
बुद्ध की शरण दुर्लभ है,
बुद्ध के धम्म का श्रवण दुर्लभ है,
और मनुष्य जीवन भी दुर्लभ है।
इन चार दुर्लभों का संयोग ही सुखकर है।
नमो बुद्धाय !
🌷सभी साधकों के कल्याणार्थ प्रश्नोत्तर - 5 🌷
प्रश्न- 'आज अपराह्न मैंने नयी मुद्रा (आसन) में बैठने का प्रयास किया, इसमें बिना हिले-डुले कमर को सीधा रखकर देर तक बैठना आसान था। लेकिन मैं अधिक संवेदनाओं का अनुभव नहीं कर सका। मुझे संदेह है कि संवेदनाएं वस्तुतः प्रकट होंगी भी या नहीं? क्या मुझे फिर पुरानी मुद्रा में ही बैठना चाहिए?
स. ना. गोयन्का- 'जान-बूझकर कष्टदायक मुद्रा (विशेष आसन) का चुनाव करके संवेदनाओं को उत्पन्न करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यदि साधना का यह सही ढंग होता तो हम आपसे कांटों की सेज पर सोने के लिए कहते। इन अतिवादों से कोई सहायता नहीं मिलेगी। एक सुखप्रद आसन का चुनाव कीजिए जिसमें शरीर सीधा हो और संवेदनाओं को स्वाभाविक रूप से आने दीजिए। उन्हें बलपूर्वक पैदा करने की बजाय स्वतः प्रकट होने दीजिए। वे प्रकट होंगी क्योंकि वे वहां विद्यमान हैं। ऐसा हो सकता है कि आप वैसी संवेदनाएं खोज रहे हों जिस प्रकार की संवेदना का आपने पहले कभी अनुभव किया था, और अब वैसा न होकर कुछ भिन्न हों।
'पहले की अपेक्षा सूक्ष्मतर संवेदनाएं थीं। पहले की मुद्रा में बिना हिले-डुले देर तक बैठना मुश्किल था।
- 'तब ठीक है। शायद आपने अधिक उपयुक्त मुद्रा का चुनाव किया है। अब आप संवेदनाओं को निसर्ग पर छोड़ दीजिए। संभवतः कुछ स्थूल संवेदनाएं गुजर गई हैं, अब आपको सूक्ष्मतर संवेदनाओं पर काम करना है, परंतु आपका मन अभी इतना तीक्ष्ण नहीं है कि उनका अनुभव कर सके । उसे तीक्ष्ण बनाने के लिए कुछ देर आनापान पर काम कीजिए। इससे आपकी एकाग्रता बढ़ेगी और सूक्ष्म संवेदनाओं की अनुभूति आसान हो जायगी।
मैंने सोचा, संवेदनाएं स्थूल हो तो इसका अर्थ होगा कि कोई पुराना संस्कार ऊपर आ रहा है?
- 'आवश्यक नहीं, कुछ विकार सूक्ष्म संवेदनाओं के रूप में भी प्रकट होते हैं। स्थूल संवेदनाओं की लालसा क्यों करें? स्थूल अथवा सूक्ष्म जो कुछ भी प्रकट होता है, आपका काम है केवल देखना।'
'क्या हमें यह पहचान करने का प्रयत्न करना चाहिए कि किस संवेदना का संबंध किस प्रतिक्रिया से है?'
- 'यह ऊर्जा का निरर्थक अपव्यय होगा। यह ऐसा ही होगा जैसे कोई गंदा कपड़ा धोते हुए रुककर यह सोचे कि कपड़े के हर एक धब्बे का क्या कारण है ? साबुन का काम है केवल कपड़ा साफ करना, कारणों की खोज से इसमें कोई सहायता नहीं मिलेगी। इस उद्देश्य के लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि हम धोने का एक साबुन लें और उसका सही ढंग से प्रयोग करें। यदि कोई व्यक्ति कपड़े को सही ढंग से धोता है तो सारी गंदगी दूर हो जाती है। इसी प्रकार आपको विपश्यना का साबुन मिला है। अब मन के सारे विकारों को दूर करने के लिए इसका प्रयोग करें। यदि आप संवेदना
विशेष के कारणों की खोज करेंगे तो आप एक बौद्धिक खेल खेलेंगे तथा अनित्य और अनात्म की उपेक्षा करेंगे । दुःख से बाहर निकलने के लिए यह बौद्धिकता आपकी सहायता नहीं कर सकती है।'
'मुझे इस बारे में दुविधा है कि कौन किसका अथवा क्या निरीक्षण कर रहा है?'
- 'कोई भी बौद्धिक उत्तर आपको संतुष्ट नहीं कर सकता। आपको स्वयं खोज करनी है कि यह 'मैं' क्या है?
कौन है जो यह सब कुछ कर रहा है?
- इसकी खोज और विवेचना-विश्लेषण स्वयं कीजिए। देखिए कि क्या कोई 'मैं' प्रकट होता है, यदि 'हां' तो, इसको देखिये । यदि कुछ प्रकट होता है, तो स्वीकार कीजिए कि, अरे यह 'मैं' तो एक भ्रांति है।'
'क्या कुछ मानसिक संस्कार कुशल नहीं हैं? उन्हें मिटाने की कोशिश क्यों करें?'
- 'कुशल संस्कार दुःखों से मुक्ति के काम के लिए हमें उत्प्रेरित करते हैं। परंतु जब लक्ष्य पूरा हो जाता है, तब सारे संस्कार कुशल तथा अकुशल छूट जाते हैं। ये नदी पार करने के लिए एक नाव की तरह हैं। नदी पार कर लेने पर कोई व्यक्ति अपनी यात्रा जारी रखते हुए उस नाव को अपने सिर पर नहीं ढोता। नाव का प्रयोजन पूरा हो गया । अब इसकी कोई जरूरत नहीं, इसे पीछे छोड़ देना चाहिए। इसी प्रकार जो पूर्ण मुक्त हो गया है उसको कुशल संस्कार की भी कोई आवश्यकता नहीं। व्यक्ति कुशल संस्कारों से नहीं अपितु चित्त विशुद्धि से मुक्त होता है।'
'जब हम विपश्यना आरंभ करते हैं तब पहले स्थूल संवेदनाएं और बाद में सूक्ष्म संवेदनाएं क्यों आती हैं?
- 'विपश्यना पहले स्थूलतम विकारों के उन्मूलन का काम करती है। जब आप किसी फर्श को साफ करते हैं तब पहले बड़े-बड़े कूड़े-करकट और गंदगी को झाडू लगाते हैं और बाद में पुनः झाडू लगाते हैं तब छोटे धूल के कण इकट्ठा करते हैं। ऐसा ही विपश्यना अभ्यास में करते हैं। पहले मन के स्थूल विकारों का उन्मूलन होता है, बाद में सूक्ष्मतर विकार सुखद संवेदना के रूप में प्रकट होते हैं। लेकिन इन सुखद वेदनाओं के प्रति राग जगाने में खतरा है। इसलिए आपको सुखद ऐंद्रिय अनुभूति को अंतिम लक्ष्य न समझने के प्रति सावधान किया जाता है। आपको प्रत्येक संवेदना को तटस्थ रूप से देखना चाहिए जिससे कि आप सभी संस्कारों का उन्मूलन कर सकें।
'आपने कहा कि हमारे अपने गंदे कपड़े हैं जिन्हें साफ करने के लिए साबुन भी है। आज मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरा साबुन समाप्त हो चुका है। सुबह मेरी साधना बड़ी बलवती थी परंतु अपराह्न में मैं वस्तुतः बहुत निराशा और क्रोध का अनुभव करने लगा और सोचने लगा कि, 'अरे, इससे क्या लाभ!' यह ऐसा हुआ कि जब मेरी साधना प्रबल थी, मेरे अंदर के शत्रु, संभवतः अहंकार ने जो उस साधना के समान प्रबल था, मुझे पराजित कर दिया है । और तब मैंने अनुभव किया कि मुझमें उससे लड़ने की शक्ति नहीं है | क्या इससे बचने का कोई रास्ता है जिससे कि मुझे इतना कठोर संघर्ष न करना पड़े, कोई समझदारी का रास्ता?'
- 'समता बनाये रखें, यह सर्वाधिक होशियारी का रास्ता है। आपने जो कुछ अनुभव किया है, वह बिल्कुल स्वाभाविक है। जब आपको लगा कि आपका ध्यान ठीक तरह से चल रहा है आपका मन संतुलित था और इसने गहन अचेतन का भेदन किया। इस गहन ऑपरेशन (शल्यक्रिया) के परिणाम स्वरूप एक पुरानी प्रतिक्रिया को धक्का लगा जो मन की सतह पर प्रकट हुई और दूसरी बैठक में आपको नकारात्मकता के तूफान का सामना करना पड़ा। ऐसी स्थिति में समता बनाये रखना आवश्यक है। नहीं तो नकारात्मकता आप पर हावी हो जायगी और आप काम नहीं कर सकेंगे। यदि समता कमजोर है तो आनापान का काम करें। जैसे समुद्र में कोई बड़ा तूफान आता है तो आपको अपना लंगर डालकर तूफान के गुजरने की प्रतीक्षा करनी होती है। सांस आपका लंगर है। इस पर काम कीजिए तूफान गुजर जायगा। अच्छा है कि यह नकारात्मकता ऊपरी
सतह पर आ गई है और आपको इसके उन्मूलन का अवसर मिला है। यदि आप समता बनाए रखें, यह आसानी से चला जायगा।'
'यदि मैं दु:ख का अनुभव नहीं करता हूं तो क्या साधना से मैं इतना अधिक लाभ पा रहा हूं?
- 'यदि आप जागरूक और संतुलित हैं, तब दुःख हो या नहीं वस्तुतः आपकी प्रगति हो रही है। ऐसा नहीं कि साधना के मार्ग पर प्रगति के लिए आपको दुःख का अनुभव करना ही चाहिए। अगर दुःख अनुभव नहीं हो रहा है तो मानें कि इस समय दुःख नहीं है। जो जैसा है, उसको उसी रूप में देखें।
कल मुझे एक ऐसा अनुभव हुआ जिसमें मुझे ऐसा लगा कि मेरा पूरा शरीर भंग हो गया है। मुझे ऐसा लगा कि यह सर्वत्र स्पंदनों का एक पुंज है।
- 'हां, ठीक है।'
'और जब ऐसा हुआ, मुझे याद आया कि जब मैं बच्चा था, मुझे ऐसा ही अनुभव हुआ था। इन सभी सालों में मैं उस अनुभव को पुन: प्राप्त करने की तलाश में था। और यह अब मुझे दुबारा मिला है।'
- 'हां, ठीक है।'
'अतः वस्तुत: मैं चाहता था कि यह अनुभव जारी रहे। मैं इसे बहुत देर तक रखना चाहता था। लेकिन यह बदल गया और समाप्त हो गया। और तब मैं इसे वापस लाने का काम कर रहा था लेकिन यह वापस नहीं आया । इसकी बजाय, आज सुबह मैंने केवल स्थूल संवेदनाओं को अनुभव किया।
- 'हां, यह भी ठीक है।' जब जैसा, तब तैसा ।
'तब मैंने समझा कि उस अनुभव को पुनः प्राप्त करने का प्रयत्न करके मैं अपने को कितना दुःखी बना रहा था?'
- 'हां, सही समझा।
'और तब मैंने समझा कि वस्तुतः हम यहां किसी विशेष अनुभव की प्राप्ति के लिए नहीं हैं। क्या मैं ठीक कह रहा हूं?"
- 'हां, ठीक।'
'वस्तुतः हम यहां प्रत्येक अनुभव को बिना प्रतिक्रिया किये देखने के लिए हैं। क्या मैं ठीक हूं?
- 'हां, ठीक हो।'
'इस प्रकार यह साधना वस्तुतः समता विकास की है, मैं ठीक कह रहा हूं।'
- बिल्कुल ठीक।
'मुझे ऐसा लगता है कि हमें एक-एक करके संस्कारों के उन्मूलन में हमेशा लगा ही रहना पड़ेगा?"
- 'ऐसा तब होगा जब एक क्षण की समता को पुराने संस्कारों में से एक की कमी को मापते रहेंगे। वास्तव में विपश्यना आपको चित्त के उस गहनतम स्तर तक ले जाती है और सभी संस्कारों का उन्मूलन कर देती है। इस प्रकार अपेक्षाकृत कम समय में आप संस्कारों के समस्त समूह का उन्मूलन कर सकते हैं बशर्ते कि आपकी सजगता और समता बलवती हो।'
'तब इस प्रक्रिया में कितना समय लगना चाहिए?'
'यह इस पर निर्भर करता है कि आपको संस्कारों के कितने बड़े भंडार का उन्मूलन करना है और आपकी साधना कितनी बलवती है। आप अपने पुराने संस्कारों के भंडार को माप नहीं सकते लेकिन निश्चिंत हो सकते हैं कि आप जितनी गंभीर साधना करते हैं, उतना ही शीघ्र मुक्ति के पथ पर आप आगे बढ़ते। उस लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए दृढ़तापूर्वक काम करते रहिए। देर-सवेर वह समय आयगा ही जब आप अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे।'
पुस्तक : जीवन जीने की कला - विपश्यना साधना ।
लेखक - विलियम हार्ट ।।
🙏🙏🙏
🌺🌺*"धर्म-संकल्प"*
*जब भी कोई धर्मकार्य (धम्मकार्य), पुण्य कर्म, सत्कर्म, दान, सेवा करें तो हर बार निम्नलिखित संकल्प जरूर जरूर करें । अवश्य करें ।*
1) इस दान, सेवा, पुण्य कर्म, धर्म कार्य के कारण मैं इस जन्म में भी और *निर्वाण प्राप्ति तक भविष्य के सभी जन्मों में सदा सुरक्षित रहूँ, हर प्रकार से सुरक्षित रहूँ ।*
2) इस दान, सेवा, पुण्य कर्म, धर्म कार्य के कारण निर्वाण प्राप्ति तक *हर जन्म में मुझे धर्म लाभ होता रहें । हर जन्म में मैं शुद्ध धर्म के आर्य अष्टांगीक मार्ग पर चलता रहूँ । सदा धर्म में रत रहूँ । हर जन्म में मैं 100% शीलवान बना रहूँ ।*
3) जीवन के सभी दान, सेवा, पुण्य कर्म, धर्म कार्यों सहित यह दान, सेवा, पुण्य कर्म, *धर्म कार्य भी मेरे निर्वाण का कारण हो, मेरे निर्वाण का आधार हो, मेरे निर्वाण प्राप्ति में सहायक हो ।*
4) इस दान, सेवा, पुण्य कर्म, धर्म कार्य के कारण : उलझे हुए अधिक से अधिक लोगों को इस आर्य अष्टांगीक मार्ग पर लाने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करने का सौभाग्य मुझे मिलता रहे ।
5) इस दान, सेवा, पुण्य कर्म, धर्म कार्यों के कारण *भविष्य में निर्वाण प्राप्ति तक कभी भी मेरी दुर्गति न हो ।*
6) इन दान, सेवा, पुण्य कर्म, धर्म कार्यों के कारण इस जीवन में भी और भविष्य के सभी जन्मों में मुझे अनेक अनेक अनेक लोगों की, देश और दुनिया की अनेक प्रकार से सेवा, धर्म सेवा, सत्कर्म करने की, बहुत बड़ी मात्रा में और बार-बार दान करने का मौका, क्षमता, उत्साह प्राप्त होता रहें ।
7) इस दान, सेवा, पुण्य कर्म, धर्म कार्यों के कारण इस जीवन में और भविष्य में निर्वाण प्राप्ति तक किसी भी जन्म में कभी भी *किसी के सामने हाथ फैलाने की, यानी किसी को भी कुछ माँगने की नौबत मुझ पर कभी न आएँ ।*
मैं सदा देने वाला (दाता) ही बनूँ , बनता रहूँ ।
8) इन दान, सेवा, पुण्य कर्म, धर्म कार्यों के कारण *मेरी सजगता खूब बढ़ें और धर्म के रास्ते मुझसे कभी कोई भुल, गलती न हो ।*
9) इस पुण्य कर्म से *निर्वाण प्राप्त होने तक किसी भी जन्म में मुझे कभी भी मूर्खो की संगति न मिलें, सदा शीलवान संत- सज्जनों की, विद्वान व ज्ञानी लोगों की ही संगति मिलती रहें ।*
10) परम आदरणीय पूज्यनीय वंदनीय भिक्षु संघ की खूब खूब खूब सेवा करने का सौभाग्य मुझे बार बार मिलता रहें ।
11) *भविष्य में होने वाले सम्यक सम्बुद्ध के समय भी मुझे मनुष्य लोक में जन्म मिलें और उन तथागत भगवान सम्यक सम्बुद्ध की और उनके भिक्षु संघ की सेवा करने का, उन्हें भोजनदान, चीवरदान और विहार दान देकर महान पुण्य अर्जित करने का परम सौभाग्य मुझे प्राप्त हो ।*
13) पिछले अनेक पीढ़ियों के हमारे पूर्वज हमारे द्वारा अर्जित इस महान पुण्य में भागीदार हो ।
13) विश्व के सभी प्राणी हमारे द्वारा अर्जित इस महान पुण्य में भागीदार हो ।
14) मेरे यह सभी धर्म-संकल्प पूर्ण हो, पूर्ण हो, पूर्ण हो !
*विश्व के सभी प्राणियों के लिए असीम मङ्गल मैत्री !*
🙏🌹🙏
🌺🌺. *भीतर का मेल कैसे उतरे !*
(पुराने साधको के लिए प्रवचन- १९८६) में से कुछ अंश :
मेरी प्यारी धर्म-पुत्रियों !
मेरे प्यारे धर्म-पुत्रों !
मन की पुरानी आदत = _राग द्वेष और मोह में रहने की_ , उसे तोड़ कर, अच्छी आदत = *सजगता और समता में रहने की* इसे पुष्ट करने के लिए . . .
रोज-रोज १घंटा सुबह & १ घंटा शाम _/या_ रात साधना का नियमित अभ्यास करना ही होगा !
=
घंटे भर यही करना है कि राग-द्वेष वाली तरंगें कैसे बंद करें और वीतरागता- वीतद्वेषता की तरंगें कैसे जगायें !
आगे का काम कुदरत पे , धरम पे छोडें ।
जब-जब हम ये वीतरागता - वीतद्वेषता की तरंगें जगाते हैं , तब सारे विश्व में जहां भी कोई संत, सदगुरु, सम्यक देव
सम्यक ब्रह्म ऐसी पवित्र तरंगें जगाने का काम कर रहे हैं, उनके साथ समरस हुए जा रहे हैं, ट्यूनअप होते जा रहे हैं।
हम जो कहते हैं - तब, _मंगल मैत्री अपने आप खिंची चली आती है_ !
यह चमत्कार की बात नहीं, कुदरतका बँधा-बँधाया नियम है।
धर्म का रास्ता ऐसा है कि इस पर जरा-सा भी सही परिश्रम करें तो, वह निष्फल नहीं जाता ।
फिर भी . .. .. ..
हम जानते हैं, बडी कठिनाई होती है यह सब करने में !! ध्यान में बैठते ही कितनी सारी बातें याद आने लगेगी :
_उसने ऐसा कह दिया रे ! उसने ऐसा कर दिया रे !_ _यह बहू देखो कैसी गयी-गुजरी रे ! यह सास देखो कैसी गयी-गुजरी रे !_यह बेटा... ! यह फला ... वह फलां_ !!
दिन भर जिन उपद्रवों को लेकर के हमने राग-द्वेष जगाया; ध्यान में बैठे तो वही जागेंगे ।
भले जागे, जागने दो, *घबराओ मत*, दबाओ मत। जो कूड़ा-करकट इकट्ठा किया है, वह फूट कर बाहर आना ही
चाहिए ।
यह सब भी जाग रहा है और साथ-साथ हम सांस को भी जान रहे है । तो सफाई का काम शुरू हो गया।
जब-जब देखो कि इस तरह की कठिनाईयाँ ज्यादा आने लगी = मन संवेदना में नहीं लग रहा; तो इसीलिए साधना के दो हिस्से सिखाए- एक सांस की साधना, एक संवेदना की साधना । संवेदना को जानते हुए अगर हमने समता का अभ्यास किया तो अंतर्मन की गहराइयों तक हमने सुधारने का काम कर दिया।
मानस हमारा इतना उथल-पुथल कर
रहा है कि संवेदना को नहीं जान पाये तो सांस का ही काम करें।
सांस का भी मन से बड़ा गहरा सबंध है।
शुद्ध सांस को देखते चले
जायँ। उसको भी नहीं देख पाते तो सांस को जरा-सा तेज कर लें।
संवेदना को तो हम चाहे तो भी तेज नहीं कर सकते, अपने स्वभाव
से न जाने कहां, क्या संवेदना होगी, कैसी होगी? लेकिन सांस को
तो हम प्रयत्न पूर्वक तेज कर सकते हैं। जरा प्रयत्न पूर्वक सांस लेना
शुरू कर दिया। विचार भी उठ रहे हैं, तूफान भी उठ रहे हैं; भीतर ही भीतर सब जंजाल चल रहे हैं, फिर भी सांस को जाने जा रहे हैं।
तूफान भी उठता है, सांस को भी जानते हैं; तूफान भी उठ रहा है तो भी सफाई का काम चल रहा है, मत घबरायें।
इस बात से कभी मत घबरायें कि हमारे मन में ये विचार क्यों उठ रहे हैं? पहले विचार शांत होंगे, उसके बाद सफाई होगी; *ऐसा बिल्कुल नहीं* । अगर सांस या संवेदना को साथ-साथ जान रहे हैं
और उनके प्रति समता का भाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, भले
थोड़ी-थोड़ी देर ही समता रहती है, बाकी समय उसी तरह प्रतिक्रिया
करते हैं, तो भी कुछ नहीं खोया; _लाभ ही हुआ_।
युं समझदारी से सही तरह परिश्रम करेते रहेंगे, तो अच्छे फल मिलेंगे ही।
उत्साह के साथ, उमंग के साथ काम करते रहें ।
जिन-जिन के भीतर धर्म
का बीज पड़ा है, उन सबका धर्म विकसित हो!
जिन-जिन के भीतर प्रज्ञा जागी है, उन सब की प्रज्ञा विकसित हो ! पुष्ट हो !
*सबका मंगल हो ! सबका कल्याण हो !*
:
कल्याण मित्र,
सत्यनारायण गोयन्का 🙂🙏
🌺🌺*"मंगल धर्म का अनोखा अनमोल उपहार!"*
जीवन के अंतिम क्षणों तक भी अपने कष्टो की जरा भी परवाह न करते हुए मैत्री के अनंत सागर भगवान बुद्ध ने एक धर्म-जिज्ञासु को धर्म सिखाया जो की उसके हित-सुख का कारण बना।
जीवन के अंतिम सांस तक सभी प्राणियो की अथक सेवा।
आखरी सांस छोड़ने के पहले उनके ये अंतिम अनमोल बोल-
"वयधम्मा संखारा, अप्पमादेन संपादेथ।"
हे भिक्षुओ! सुनो, सारे संस्कार व्यय-धर्मा हैं, मरण-धर्मा हैं।
जितनी भी बनी हुई वस्तुए है, व्यक्ति है, घटनाए हैं, स्थितियां हैं, वे सब नश्वर हैं, भंगुर हैं, मरणशील हैं, परिवर्तनशील हैं।
यही प्रकर्ति का कठोर सत्य है।
प्रमाद (negligience)से बचते हुए, आलस्य से दूर रहते हुए, सतत सतर्क(alert) और जागरूक(aware) रहते हुए प्रकर्ति के इस सत्य का सम्पादन करते रहो।
इस सत्य में स्थित रहते हुए अपना कल्याण साधते रहो।
🌷संक्षेप सुत्त🌷
In Brief
एक भिक्षु जहाँ भगवान थे, वहाँ गया. . . .एक ओर बैठे हुए उस भिक्षु ने भगवान् से निवेदन किया --" भन्ते ! अच्छा हो यदि भगवान मुझे संक्षिप्त रूप में ऐसा धर्मोपदेश करें कि मैं एकान्त-सेवी हो, अप्रमादी हो, प्रयत्न करता हुआ विहार करूं।''
Then a certain bhikkhu approached the Blessed One, paid homage to him, sat down to one side, and said to him:
"Bhante, it would be good if the Blessed One would teach me the Dhamma in brief, so that, having heard the Dhamma from the Blessed One, I might dwell alone, withdrawn, heedful, ardent, and resolute."
" इसी प्रकार (तेरी ही तरह ) कुछ मूर्ख मेरा पीछा नहीं छोड़ते। धर्मोपदेश किये जाने पर भी मेरे ही पीछे लगे रहते हैं।'
भगवान् ! संक्षेप में धर्मोपदेश दें। सुगत ! संक्षेप में धर्मोपदेश दें। सम्भव है मैं भगवान् के कथन के अर्थ को समझ लूँ । सम्भव है मैं भगवान के धर्म का उत्तराधिकारी बन सकूं।"
"It is in just this way that some hollow men here make requests of me, but when the Dhamma has been explained, they think only of following me around."
"Bhante, let the Blessed One teach me the Dhamma in brief. Let the Fortunate One teach me the Dhamma in brief. Perhaps. I might come to understand the meaning of the Blessed One's : statement; perhaps I might become an heir of the Blessed One's statement."
“तो भिक्षु ! यह सीखना चाहिये कि मेरा चित्त स्थिर रहेगा, सुस्थिर रहेगा। अकुशल पाप-धर्म मेरे चित्त को विचलित न करेंगे।' भिक्षु ! यही शिक्षा तुझे ग्रहण करनी चाहिये।
“भिक्षु ! जब तेरा चित्त स्थिर हो जाय, सम्यक् रूपसे स्थिर हो जाय, जब अकुशल पाप-धर्म तेरे चित्त को विचलित न करें, तो हे भिक्षु तुझे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि मैं मैत्री-भावना रूपी चित्त की विमुक्ति का अभ्यास करूंगा, बढ़ाऊँगा, अधिकाधिक भावित करूंगा, वास्तविक स्वरूप दूंगा, अनुष्ठान करूंगा, भली प्रकार परिचित होऊँगा तथा सम्यक् प्रकार आरम्भ करूंगा। भिक्षुओ, इसी प्रकार तुझे सीखना चाहिए।'
"In that case, bhikkhu, you should train yourself thus: 'My mind will be firm and well settled internally. Arisen bad unwholesome states will not obsess my mind.' Thus should you train yourself.
(1) “When, bhikkhu, your mind is firm and well settled internally, and arisen bad unwholesome states do not obsess your mind, then you should train yourself thus: 'I will develop and cultivate the liberation of the mind by loving-kindness, make it a vehicle and basis, carry it out, consolidate it, and properly undertake it.' Thus should you train yourself.
“भिक्षु ! जब तेरी यह समाधि इस प्रकार अभ्यस्त हुई रहेगी, वृद्धि प्राप्त रहेगी, तब हे भिक्षु ! तू इस समाधि को स-वितर्क स-विचार भी अभ्यरत (भावना ) कर सकेगा, अ-वितर्क स-विचार भी अभ्यस्त कर सकेगा, अवितर्क अविचार भी अभ्यस्त कर सकेगा, प्रीति-युक्त भी अभ्यस्त कर सकेगा, प्रीतिरहित भी अभ्यस्त कर सकेगा, सात (रुचि ) सहित भी अभ्यस्त कर सकेगा, उपेक्षा-सहित भी अभ्यस्त कर सकेगा।
"When this concentration has been developed and cultivated by you in this way, then you should develop this concentration with thought and examination; you should develop it without thought but with examination only; you should develop it without thought and examination. You should develop it with rapture; you should develop it without rapture; you should develop it accompanied by comfort; and you should develop it accompanied by equanimity.
“भिक्षु ! जब तेरी यह समाधि इस प्रकार अभ्यस्त हुई रहेगी, वृद्धि प्राप्त रहेगी, तब हे भिक्षु ! तुझे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि 'मैं' करुणा-भावना रूपी चित्तकी विमुक्ति का. . . . .मुदिता-भावना रूपी चित्त की विमुक्ति का..... उपेक्षा-भावना रूपी चित्त की विमुक्ति का अभ्यास करुँगा बढ़ाऊँगा, अधिकाधिक भावित करूंगा। वास्तविकत रूप दूंगा, अनुष्ठान करूंगा, भली प्रकार परिचित होऊँगा तथा सम्यक् प्रकार आरम्भ करूंगा। भिक्षु ! इसी प्रकार तुझे सीखना चाहिए। "
(2)-(4) "When, bhikkhu, this concentration has been developed and well developed by you in this way, then you should train yourself thus: 'I will develop and cultivate the liberation of the mind by compassion ... the liberation of the mind by altruistic joy ... the liberation of the mind by equanimity, make it a vehicle and basis, carry it out, consolidate it, and properly. undertake it.' Thus should you train yourself.
" भिक्षु ! जब तेरी यह समाधि इस प्रकार अभ्यस्त हुई रहेगी, वृद्धि प्राप्त रहेगी, तब हे भिक्षु ! तू इस समाधि का स-वितर्क स-विचार भी अभ्यस्त (भावना) कर सकेगा, अवितर्क-सविचार भी अभ्यस्त कर सकेगा, अ-वितर्क अ-विचार भी अभ्यस्त कर सकेगा प्रीति-युक्त भी अभ्यस्त कर सकेगा, प्रीति-रहित भी अभ्यस्त कर सकेगा सात (रुचि) सहित भी अभ्यस्त कर सकेगा, उपेक्षा सहित भी अभ्यस्त कर सकेगा।
"When this concentration has been developed and cultivated by you in this way, then you should develop this concentration with thought and examination; you should develop it without thought but with examination only; you should develop it without thought and examination. You should develop it with rapture; you should develop it without rapture; you should develop it accompanied by comfort; and you should develop it accompanied by equanimity.
“भिक्षु ! जब तेरी यह समाधि इस प्रकार अभ्यस्त हुई रहेगी, वृद्धिप्राप्त रहेगी, तब हे भिक्षु ! तुझे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि मैं काय (शरीर ) के प्रति कायानुपश्यी होकर, प्रयत्नशील होकर, सम्प्रजन्य से युक्त होकर, स्मृतिमान होकर विचरूंगा और लोक के प्रति मेरे मन में जो राग-द्वेष है। उसका मर्दन करूंगा। भिक्षु ! इसी प्रकार तुझे सीखना चाहिए।
(5) "When, bhikkhu, this concentration has been developed and well developed by you in this way, then you should train yourself thus: 'I will dwell contemplating the body in the body, ardent, clearly comprehending, mindful, having removed longing and dejection in regard to the world. Thus should you train yourself.
"भिक्षु ! जब तेरी यह समाधि इस प्रकार अभ्यस्त हुई रहेगी, वृद्धि-प्राप्त रहेगी, तब हे भिक्षु ! तू इस समाधिको स-वितर्क स-विचार भी अभ्यस्त (भावना ) कर सकेगा, अ-वितर्क स-विचार भी अभ्यस्त कर सकेगा, अ-वितर्क अ-विचार भी अभ्यस्त कर सकेगा, प्रीति-युक्त भी अभ्यस्त कर सकेगा, प्रीति-रहित भी अभ्यस्त कर सकेगा, सात (रुचि ) सहित भी अभ्यस्त कर सकेगा, उपेक्षा-सहित भी अभ्यस्त कर सकेगा।
"When this concentration has been developed and cultivated by you in this way, then you should develop this concentration with thought and examination, you should develop it without thought but with examination only; you should develop it without thought and examination. You should develop it with rapture; you should develop it without rapture; you should develop it accompanied by comfort; and you should develop it accompanied by equanimity.
"भिक्षु ! जब तेरी यह समाधि इस प्रकार अभ्यस्त हुई रहेगी, वृद्धि प्राप्त रहेगी, तब हे भिक्षु ! तुझे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए कि मैं वेदनाओं के प्रति ..... चित्तके प्रति . . . . . धर्मों (संस्कृत-असंस्कृत धर्मों ) के प्रति धर्मानुराश्यी होकर, प्रयत्नशील होकर, सम्प्रजन्यसे युक्त होकर, स्मृतिमान् होकर विचरूंगा और लोकके प्रति मेरे मनमें जो राग-द्वेष है, उसका मर्दन करूंगा।' भिक्षु ! इसी प्रकार तुझे सीखना चाहिए।
(6)-(8) "When, bhikkhu, this concentration has been developed and well developed by you in this way, then you should train yourself thus: 'I will dwell contemplating feelings in feelings... mind in mind... phenomena in phenomena, ardent, clearly comprehending, mindful, having removed longing and dejection in regard to the world.' Thus should you train yourself.
भिक्षु, जब तेरी यह समाधि, इस प्रकार अभ्यस्त हुई रहेगी, वृद्धि-प्राप्त रहेगी, तब हे भिक्षु ! तू इस समाधिको स-वितर्क स-विचार भी अभ्यस्त (भावना) कर सकेगा, अ-वितर्क स-विचार भी अभ्यस्तका कर सकेगा, अ-वितर्क-अ-विचार भी अभ्यस्त कर सकेगा, प्रीति-युक्त भी अभ्यस्त कर सकेगा, सात (रुचि ) सहित भी अभ्यस्त कर सकेगा, उपेक्षा-सहित भी अभ्यस्त कर सकेगा।
"When this concentration has been developed and cultivated by you in this way, then you should develop this concentration with thought and examination; you should develop it without thought but with examination only; you should develop it without thought and examination. You should develop it with rapture; you should develop it without rapture; you should develop it accompanied by comfort; and you should develop it accompanied by equanimity
“भिक्षु ! जब तेरी यह समाधि इस प्रकार अभ्यस्त हुई रहेगी, वृद्धि प्राप्त हुई रहेगी, तब हे भिक्षु ! तू जहाँ जहाँ भी जायेगा सुख-पूर्वक ही जायगा, जहाँ-जहाँ ठहरेगा, सुख-पूर्वक ही ठहरेगा, जहाँ-जहाँ बैठेगा सुख-पूर्वक ही बैठेगा, जहाँ-जहाँ लेटेगा, सुख-पूर्वक ही लेटेगा।"
"When, bhikkhu, this concentration has been developed and well developed by you in this way, then wherever you walk, you will walk at ease; wherever you stand, you will stand at ease; wherever you sit, you will sit at ease; wherever you lie down, you will lie down at ease."
इस प्रकार भगवान् द्वारा उपदिष्ट होने पर वह भिक्षु आसनसे उठ, भगवान्को अभिवादन कर, प्रदक्षिणा कर चला गया। तब उस भिक्षुने अकेले रह, एकान्त-सेवन करते हुए, अप्रमाद पूर्वक प्रयत्न कर जिस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये कुल-पुत्र घर से बे-घर हो प्रब्रजित होते हैं, उस लोकोत्तर श्रेष्ठ जीवन को इसी जन्म में स्वयं जान लिया, साक्षात् कर लिया, प्राप्त कर लिया। उसे ज्ञान हो गया कि जाति (जन्म बंधन ) क्षीण हो गया, ब्रह्मचरिय (श्रेष्ठ जीवनका ) उद्देश्य पूरा हो गया। जो कृत्य था, कर लिया गया। अब यहाँ शेष करणीय नहीं रहा।' वह भिक्षु भी एक अर्हत् हुआ।
Having received such an exhortation from the Blessed One, that bhikkhu rose from his seat, paid homage to the Blessed One, circumambulated hiin keeping the right side toward him, and departed. Then, dwelling alone, withdrawn, heedful, ardent, and resolute, in no long time that bhikkhu realized for himself with direct knowledge, in this very life, that unsurpassed consummation of the spiritual life for the sake of which clanşmen rightly go forth from the household life into homelessness, and having entered upon it, he dwelled in it. He directly knew: "Destroyed is birth, the spiritual life has been lived, what had to be done has been done, there is no more coming back to any state of being." And that bhikkhu became one of the arahants.
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🌺*Meditation for Young Minds.*
{How meditation helps the mind}
Questions and Answers With Shri. Satyanarayan Goenkaji.
Q 1.
What is the mind?
SN Goenkaji:
The mind is what thinks! The entire thought process is due to the mind. It is the mind that is constantly involved in the various actions of thinking, reading and pondering over what has been read, etc. During its course of thinking, the mind may act beneficially or harmfully. If it adopts the wrong habit pattern, then it will generate feelings of ill will and animosity for others. If instead, the mind reforms itself, then although it will still have thoughts they will now be thoughts for the well being of others. If someone has shortcomings, the mind will want that person to overcome his shortcomings because now the mind knows that due to his shortcomings, that person will perform wrong actions which will make him more miserable and unhappy. So the mind will harbour thoughts of goodwill towards that person. It will want the person to refrain from doing bad deeds and thus save himself from burning in the fires of suffering. We observe that it is the nature of the mind to generate thoughts all the time. Therefore, our most important duty is to guide the mind towards a healthy thought process and prevent it from taking the path of unhealthy thinking patterns. Our entire effort is aimed towards understanding this nature of the mind and correcting it if it goes on the wrong path.
Q 2.
Who reforms the mind?
SNG:
It is the mind that reforms itself. A part of the mind is always observing its own functioning. If there are thoughts in the mind, it will analyse the nature of these thoughts. Whenever negativity or a feeling of animosity arises in the mind, this same part instantly issues a warning that such negative emotions are undesirable and should not occur in the mind. This part may be called intellect or the part of the mind which is always alert regarding the functioning of the mind and is trying to reform it. If the mind can develop the habit of observing the truth as it appears, then this fact will become clear- that the moment the mind is defiled, it is punished with suffering; and if it is purified, the suffering is removed. It is this observing part of the mind which will understand this process and thus change itself. Nobody wants to remain agitated. Everyone wants to lead a happy life without miseries. To attain this state, the observing part of the mind tries to change the nature of the remaining part of the mind.
Q 3.
The mind remains full of thoughts and is unable to keep focussed at one place.
SNG:
We are here to meditate precisely for that reason. If the mind was already concentrated, then why would you have come here? It is an old habit of the mind to wander. Let it wander. The moment we realize that the mind has wandered, we bring it back to the breath. The mind is distracted because of these innumerable thoughts. The nature of the thoughts varies from time to time, but the important thing is how soon we become conscious of the fact that the mind has wandered. It is not good if the mind remains distracted for a long period of time.
Q 4.
I cannot feel the inflow and outflow of respiration.
SNG:
This indicates that the breath must have slowed down and become very soft. When the respiration is very slow, you lose awareness of its incoming and outgoing flow. When this happens, breathe a little harder, but not very hard. Make a conscious effort to breathe. Be aware that you are breathing deliberately. When you breathe hard, it will enable you to clearly feel the flow of respiration. Then again slow down the breathing. If again you do not feel the touch of the respiration, breathe a little faster and as soon as you can feel it, start breathing slowly.
Q 5.
I feel sleepy while meditating.
SNG:
Get rid of this feeling of sleepiness. How can you expect to work if you fall asleep? You are engaged in the task of awakening the mind. Therefore you should remain alert, remain awake and remain vigilant. Time and again it is emphasized- remain alert, remain vigilant. If sleep overpowers the mind, then try some hard breathing. Sleepiness will go away. You must fight this enemy. Sleep is your enemy at the time of meditation. At any other appropriate time, it is welcome.
Q 6.
What are we to understand by pure breath? What are we to understand by natural breath?
SNG:
Good question. The plain, simple breath with nothing attached to it is called pure. The moment something is attached to the breath, it becomes impure. Something is pure if no foreign element is added to it. As long as the milk producer does not add water to the milk, it remains pure. The addition of water to milk makes it impure. Similarly, the breath is pure as long as nothing is added to it. The addition of any word or name with the breath makes it impure. We should not condemn any kind of meditation that gives importance to a particular name, form or image. But in this meditation, the moment you associate any word, name, form or image with the breath, it is no longer a pure breath. Something extra has been added to it. The breath is pure as long as nothing is mixed with it.
Now, what is natural breath? The flow of respiration taking place of its own nature is called natural. The natural breath is one which comes in and goes out on its own without any effort on our part. When we breathe hard, it takes some effort to do so and is therefore not natural. So the respiration which is done effortlessly and which flows in and flows out on its own is called natural.
Q 7.
Why do you say "Bhavatu Sabba Mangalam" three times?
SNG:
I say this because it makes me feel good. When we say "May all beings be happy", it fills our mind with happiness. If we generate ill will for others and wish them unhappiness, we will be miserable from within. If instead of generating ill will, we generate goodwill for all, we will feel happy. With purity of mind, if you also say these words of well-being with the feeling that your meditation may benefit one and all, you will find that your mind is filled with happiness. On the contrary, if you abuse someone in a state of anger, your mind will be disturbed and agitated. Who likes having such a state of mind? Everyone wishes to remain calm and happy. So to attain serenity and happiness of mind, these words of well being for others are said.
Let me explain further. Now you have only learned the technique of Anapana. Later, when you advance on the path of Vipassana, you will see that when we want others to be happy and say "Bhavatu Sabba Mangalam", these feelings of well being for others are effective only if generated from within the innermost depths of a pure mind. Wishes coming from a shallow mind do not have much influence. If anyone really wants happiness for others, he may start saying "Bhavatu Sabba Mangalam" from the surface level of the mind but gradually these words must be said from the depths of the mind as it becomes purer and purer. If these words are spoken from the depths of the mind, then they will be meaningful and effective. We want these words to be effective, so saying them should not be made a mere ritual. It should be done in a manner that is beneficial for oneself as well as others.
Q 8.
You have asked us to live in the present. Does this imply that we should not plan for the future at all? Does it mean that we should not be ambitious?
SNG:
These are two different questions, and quite relevant as well. It is certainly not wise to live in the present and not think about the future at all. While observing the breath, you are also gaining awareness of the workings of the mind. You have observed that it has become a permanent habit of the mind to always generate thoughts about the past or the future. The mind does not want to focus on its present task of observing the breath. When it is involved in thoughts of future, the mind's energy gets reduced and therefore it is unable to work with full potential on the task at hand. And, when the actual time for taking the right action comes, the mind has exhausted all its energy. So with the mind firmly rooted in the present, think and plan the immediate task at hand. Set your goal and keeping it in sight, walk step by step towards it. Once the goal is set, you should not think about it any more. This way, every step you take will be a step in the present. But remain aware of each and every step you take. This will eliminate all possibilities of making mistakes.
You may wonder how you will be able to lead your life if you do not plan for the future. We have a limited reservoir of energy and therefore it should be utilized with wisdom. We should only use as much as is required for planning the future. We tend to exhaust our energy by unnecessarily tormenting the mind with thoughts of the future. "This may happen or this may not happen. We may do this or we may not do this?" Oh! Indulge in all this thinking only when it is required. Right now, your job is to observe the breath so that you learn to remain in the present. If we adopt the habit of remaining firmly in the present, we will be able to take the next step properly. Thus, to establish this habit pattern of the mind, we emphasize staying with the present.
To be ambitious is not bad at all. We set a definite aim for our life. For instance, we study to fulfil a certain ambition, or we are doing meditation for a certain purpose. But if we get attached to our goal and constantly worry about it while making no efforts to attain it, then it is futile to have any ambition. What is the point in being ambitious about a thing which prevents you from taking the right course of action? Decide about your aim and then strive to achieve it. If you are thirsty, then go and get water. Merely crying for water and worrying about it will not quench your thirst. Make the desired effort to obtain water, drink it and satisfy your thirst. What is wrong with this? Similarly, there is no harm in having a good ambition and making efforts to attain it. But if you get obsessed with it and only worry about its fulfilment without making any efforts in that direction, then you will go off the track and fail- even a good ambition will not be successful. So have the right ambition and strive hard to attain it.
Q 9.
Why do we observe only the breath?
SNG:
Because it will eventually pave the way for Vipassana. Breath is a true fact. It is the truth that is closely associated not only with our body but also with our mind. Like a scientist, we have to diligently discover the truth about ourselves, our body and mind. Moreover, this knowledge should be based at the experiential level and not on what we are told or study in books, etc. We have started this practice of observing the breath, so that we can learn the truth about ourselves. This will enable us to get rid of our faults on the one hand and conserve and expand our virtues on the other. All this is possible only if we know our minds, and the mind can be known through the breath. We are observing the breath; and in the process, we begin to know our mind. While learning about the mind we can also reform it. Thus, the mind and respiration are closely linked. This will become more evident as you progress on the path of meditation. While observing the breath, some angry thoughts may occur in the mind. You will notice that the normal pace of the breath gets disturbed and it becomes fast and heavy. And the moment the mind gets rid of anger, the breath becomes normal. This shows how the disorders of the mind are related to our breathing process. As you meditate further, you will understand all this better. But you will only understand this phenomenon clearly if you work with the pure breath. If you add anything to the breath, then you will fail to grasp all this. For these reasons, we work with the breath. Respiration is related not only to the body but to the mind as well. When we breathe in, the lungs get inflated with air and when we breathe out, the lungs are deflated. This is how the respiration is related to the body. And as it was just explained, if an impurity arises in the mind, the normal pace of the breath gets disturbed. This is how respiration is related to the mind.
Q 10.
How can Anapana help to reform the mind? How can Anapana lead to purity of mind?
SNG:
As long as the mind is engaged in doing Anapana, that is in the observation of the flow of respiration, it is without any thoughts, and as a result of this, it is without any defilements. It is our thoughts which defile the mind. Mostly while we are thinking, there is craving or aversion. Pleasant thoughts generate craving and unpleasant thoughts generate aversion. But when we are observing the incoming and outgoing breath, there is no reason for us to generate either of these emotions and so these are moments of purity in the mind. More and more of these moments of purity will reverse the habit pattern of the mind. The mind that was previously generating impurities will now become pure. This transformation which will initially take place at the surface level of the mind will gradually take deep roots as you progress on the path of Vipassana.
Q 11.
I suffer from physical discomfort such as agitation, headache, backache, nausea, etc. while meditating.
SNG:
It is good if you feel such discomfort during meditation. Do not get disturbed by it. But understand the cause behind it. It is due to this meditation technique. You will observe that as long as your mind remains focused on the breath, it does not generate any craving or aversion. You are only absorbed in the task of observing the breath. There is no craving towards the incoming breath. There is no aversion towards the outgoing breath. So the mind reaches a level of purity without having an iota of craving or aversion, even though it may be for a short period of time. For innumerable births, we have collected a huge stock of defilements, which has corrupted the mind. The moment the mind becomes pure, there is an explosive reaction in the stock of impurities, which appears on the surface of the body in the form of various discomforts. Let us understand this through a simile. Coals are burning in a fire and we sprinkle some water on them. What happens then? The water is cold and the coals are hot. The contact between the hot coals and the cold water will produce a loud hissing sound. The burning coals do not welcome the cold water and thus protest loudly. This reaction is the result of two things coming together with radically opposite characteristics. One has the trait of burning, the other that of cooling. If we continue to sprinkle water on the burning coals, each time there will be a hissing sound but gradually the fire in the coals will be extinguished and they will cool down- now, no amount of water poured on them will produce any sound. Similarly, as the mind gets concentrated, it becomes pure and brings relief. These short moments of purity are like water being sprinkled on the burning coals of negativities. Their contact generates all these physical discomforts like headache, backache, restlessness, nausea, pain in the feet, etc. Do not be disturbed or discouraged by them. Slowly and gradually, these will disappear. Just as continued sprinkling of water on hot coals cools them down, similarly these discomforts will also be cured. You will not come to any harm. So do not get disturbed at all.
Q 12.
What is the characteristic of a pure mind?
SNG:
Purity is the characteristic of a pure mind. By purity we mean the state of mind which is without any defilements like anger, animosity, ill will, craving, clinging, etc. If there is any such negativity in the mind, how can it be called pure? In fact, it will lead to some negative act of the body or speech. An impure mind will lead to some impure action. This way you not only harm yourself but others as well. On the other hand, if the mind is pure, it cannot act in a wrong way. It will benefit itself and others as well. This is the basic characteristic of this technique- that we purify our mind so that we are saved from doing harmful deeds through our speech and body. We try to develop this quality of purity of mind so that all our acts are beneficial. A pure mind will never generate ill will against any one. Instead, it will generate good will, affection and compassion for one and all. These are the qualities by which the purity of the mind is assessed.
Q 13.
What is the significance of observing noble silence?
SNG:
It has a great significance. All our efforts are towards quietening the mind. We have already experienced how talkative the mind is. Even though we want the mind to observe the breath, it hardly observes a couple of breaths before it indulges in its old habit of thinking and talking endlessly with itself. We want it to quieten down and become involved in the task of observing the breath, but despite all our efforts, it does not calm down. On top of this, if you talk with other meditators, then the mind will get more food for thought. It will think about this conversation while meditating, thus weakening your meditation. You have not only harmed yourself but also done a great deal of harm to the other meditator by talking to someone, who has also come to do Anapana like you. Now that person will also lose their concentration by thinking about the conversation with you and they cannot meditate properly either. We have a habit of wasting our energy by talking uselessly and unceasingly. Our conversation should always be purposeful. But for now, our task is to meditate, which we do while observing complete silence.
Q 14.
How can the observation of breath assist in practising the moral precepts (sila)?
SNG:
This is indeed a good question. If the observation of breath does not help us to preserve morality and establish ourselves in Dhamma, then it is a futile exercise. This technique will be very beneficial in living a good life. If we continue to observe the natural flow of respiration, we will find that it helps us to gain control over our mind. Our mind will not be as weak and restless as before. Its ability to concentrate will improve. The more it concentrates, the stronger and wiser it gets. Its faculty of awareness improves. If anger arises in the mind, it will instantly become aware of it. Then all you have to do is to observe the respiration. A few minutes of observing the breath will eliminate anger from the mind. Earlier, when we were in a bad mood, we used to either abuse the other person or we would lose control and hit him, thus breaking our sila. So Anapana has prevented us from doing a harmful deed. Any wrong act we perform defiles the mind, and the person practising Anapana immediately becomes aware of this. The only way to get rid of the impurity is to observe the breath for some time. If we continue to observe the breath, the impurity will be removed and we will be saved from breaking our sila.
Q 15.
How does the breath help in preserving our sila?
SNG:
As already explained, the irregularity in the respiration gives us a warning signal when morality is not being observed. At that time, by focusing our attention on the respiration, we will become alert and vigilant and not perform an unwholesome action.
Q 16.
Why is it not right to break sila even as a joke?
SNG:
Why indulge in a sense of humour which prompts you to break your sila? There can be numerous jokes that do not require you to behave immorally. If you break your sila once, even as a joke, you will be tempted to do it again and again. Today you are breaking it as a joke and tomorrow it will become a permanent habit for you. You will find justification in doing it. Immorality under all circumstances is wrong, and so try not to ever indulge in it, even jokingly .
Q 17.
Why shouldn't we kill mosquitoes when they bite us?
SNG:
The question you ask yourself should be, "Why can't we drive away mosquitoes when they bite us? Why do you wish to kill mosquitoes?" If they bite you, then get rid of them without killing them. Mosquito coils and repellant can be used to send the mosquitoes away without harming them. Apply these when you meditate or at other times, and the mosquitoes will not come near you. Obviously you don't like it when somebody hurts you. A mosquito is a living being as you are, and it is born with the natural instinct of sucking blood for its food. If you do not wish your blood to be sucked, then adopt methods to keep the mosquitoes away. Do not kill them, only keep them away. You will be breaking a moral precept if you kill them, but not if you just drive them away.
Q 18.
If we lie for some good cause, will it still be an unwholesome action?
SNG:
An unwholesome action is an unwholesome action under all circumstances. As I have said before, we get into the habit of justifying a lie even though it is not morally justifiable. First of all, how are you certain that the reason for which you lied is reasonable? Everyone has one's own limitations when it comes to analysing and understanding things, and so do you. It is difficult to become perfect in knowing clearly whether the lie is told for a reasonable cause. And even if you claim to be certain that you lied for a good reason, then you are bound to lie again for some other reason which also appears to be good. If you lie repeatedly, you will not only get into the habit of lying, but you will also justify your habit with the excuse that telling a small lie does not matter. Don't ever get into the habit of doing this. Do not be tempted to lie for any reason, however good it may appear to be. Speak only the truth.
Sometimes, you may feel reluctant to speak the truth because it may appear to harm someone. For example, your teacher asks you to tell the name of your classmate who has misbehaved. You know that your friend is the trouble-maker, but you hesitate to tell the truth because you know that your friend will get a punishment from the teacher and you do not want anybody to punish your friend. So in order to save your friend from the punishment, you will tell a downright lie by saying that he is innocent. Understand what has happened because of this. The teacher has not punished your friend, and you think that you have saved your friend. On the surface it appears that speaking a small lie has saved your friend from being punished. But in reality, a great harm has been done to him. You have in fact helped him to misbehave. Since he has not been corrected at the time he committed a mistake, he will feel encouraged to repeat the same mistake time and again. So your one lie has opened the doors of misbehaviour and misery for your friend. If the truth had come out, the teacher would have given him the appropriate punishment, thus preventing him from going astray in the future.
There is no harm in maintaining silence if at some stage you do not wish to make any comment. If you feel that your statement may be incorrect or misleading, then instead of saying something incorrect deliberately, with humility and firmness, you may refuse to give any reply. You have not done anything wrong in telling the truth, which is that you do not wish to speak. Otherwise, if you try to save someone by making a false statement, you may do him more harm than good. Not only can you harm your friend, but you may harm yourself too by acquiring the habit of telling lies due to one reason or another.
Q 19.
How can one protect oneself without breaking one's sila?
SNG:
Just as you protect others by protecting your sila, similarly protect yourself without breaking your sila. On one hand, you may wish to protect yourself and on the other, you may speak of breaking your sila. By breaking sila, you act immorally, and your action will produce the fruit of misery for you in the future. So how can you claim to have protected yourself? How can you claim to have saved yourself? In fact, you have ruined your own security by not following the right code of conduct. You must strengthen your mind. If the mind is weak, it will give a hundred excuses for breaking any moral principle. It will say that a small lie is excusable if it saves me or someone else. If the mind is strong, it will not listen to such lame excuses and so it will protect the morality of the body and speech. This will be your real protection. Gradually, people will begin to know you as a truthful person and you will experience the sweet fruit of good behaviour.
Q 20.
If we happen to break our sila, how do we make amends for it?
SNG:
If you happen to break your sila, then admit it before someone older. Do not hide your mistakes. If you conceal your mistake, then you are liable to repeat it. It will start an endless process. If you confess to someone older and respectable that you have made a mistake, and also promise not to repeat the same mistake under any circumstance, you will see that your mind will gain strength. When you don't conceal any of your bad actions, you are not tempted to repeat them. Moreover, if you are determined not to commit the same mistake again, you will start gaining strength of mind. This is the right way. There is no other way to make amends.
Q 21.
Why shouldn't we smoke cigarettes, or take alcohol or drugs?
SNG:
Someone might entice you into smoking or taking drugs by arguing that a little bit is not harmful; that it gives pleasure; that only those who drink too much land into trouble and we won't consume too much; that there is no harm in sampling a small amount, etc. You might weaken and start with small quantities. Gradually, you may become addicted. It will be like an incurable disease. It will be impossible for you to come out of it. So why invite such a disease in the first place, which can only cause harm and nothing else? Do not agree even to a close friend who asks you to drink, smoke or take drugs, etc. If you give in easily to his request so that you will make him happy or to maintain friendship with him, you will be the sufferer. You might ask how you can continue to be friends with those who drink if you don't drink. If you are intelligent enough, then you will remain friends. Understand how this happens. First of all, why be friends with such people? And, if for some reason you have to be in their company while they are drinking, then use your intelligence and judgment. If you refuse to drink by saying that now you are a Dhamma person doing Anapana, then this will generate animosity towards you. So firmly decline the offer to drink by saying politely that it does not suit you. This will be a true statement for it can never suit a person to drink if he is walking on the path of Dhamma and is doing Anapana. Consider an example. A man suffering from diabetes goes out with some friends one evening. The friends coax him to eat sweets arguing that one piece will do him no harm. If he eats the sweets, it will only make his condition worse, but if he is a sensible person, he will not yield to their persuasions and therefore not increase his own suffering. He will turn down their offer by politely saying that he has diabetes and therefore cannot eat sweets. He will say that it does not suit him to eat sweets, whereas the others are free to eat them. Similarly, exercise your willpower and firmly but politely decline any offer to smoke or drink, giving the simple but true reason that these do not suit you. You may feel that if you do not join your friends in smoking, drinking, etc., they will shun your company and make you feel like an outcaste. I have just explained to you that this will not happen. Firstly, what will you gain by unnecessarily being part of a group with such bad habits? It is better to stay away from such people. In case you are unable to avoid them, then act as advised above and protect yourself. You might feel that instead of leaving their company, you could try to reform them. Do not attempt to mend their ways. You are not qualified to do that till you have reformed yourself. Suppose you have an injured leg, how can you hope to help another one-legged person? A lame person cannot afford to help another lame person. A blind man cannot show the path to another blind man. So you have to first reform yourself. On seeing the transformation in your conduct, your friends will be attracted to you. Seeking your example, they will follow the path of Dhamma and be benefited by it. Otherwise, what can you hope to reform? Yours is a vulnerable age. In correcting others, you may go on the wrong path yourself. Therefore, at your age, spend as much time as possible in strengthening yourself and establishing yourself in Dhamma. Leave the task of reforming others to someone else.
Q 22.
What is the difference between Anapana and any other form of meditation?
SNG:
Every meditation technique has its own unique features; and, for this reason, one meditation technique differs from the other. In Anapana, the emphasis is on the natural flow of respiration as it comes in and as it goes out. There is a form of meditation where one is asked to take long deliberate breaths, stop for a while and then release the breath. This technique is different from Anapana. In Anapana, the breath has to be kept pure, meaning that nothing extra should be added to the breath; whereas there are techniques which give importance to the use of name, form, or image for meditation. Thus, different techniques have distinctive qualities. Anapana has its own characteristics, which should be protected and maintained.
Q 23.
How does one keep up the practice of Anapana simultaneously with yoga?
SNG:
Yoga is a beneficial practice. But there is no need to do Anapana simultaneously with it. Make a gap between the two. Yoga and Anapana do not interfere with each other but there is a basic difference between Pranayama (yoga of breathing) and Anapana, which must be understood clearly. In Pranayama, the breathing is done deliberately and consciously. It is an exercise of the breath where you breathe deeply, then hold the breath for a while and then release it. It is a good technique. But in Anapana, the breathing process is natural and effortless. So, if you mingle the two techniques and try to do one immediately after the other, then you are bound to get confused and create problems for yourself. Therefore, do only one thing at a time. After having done Pranayama, wait for some time and then do Anapana.
Q 24.
How can we succeed in this competitive world without being dishonest?
SNG:
The essence of leading a virtuous life is that one does not look for excuses to act wrongly. Now, you may have found a reason to justify your wrong actions. You think that you must adopt dishonest methods to succeed in this world because everybody around you is doing so, and progressing at a very fast pace. And, if we who practise Anapana or Vipassana do not do the same, we will lag behind.
Understand that such thinking is the result of weakness of the mind. This meditation will make your mind so strong that you will not even remotely consider doing any sinful act, or breaking your sila, or adopting any wrong ways; and you will find success at your doorstep. On the contrary, if you fear failure because you are not adopting underhand methods to succeed, then this fear will become the cause of your failure, whereas the strength of the mind will bring you success. So you must strengthen the mind and not weaken it on some pretext or the other.
As you grow, you will understand further that those people who have acquired name, fame, position and wealth through dishonest means, and are apparently leading very successful lives, remain agitated and full of misery. When you progress on this path, then you will realize that such a person neither sleeps restfully at night nor is his mind at peace during the day. What has he gained by becoming a successful person? The wealth, position, fame and name are all futile if these cannot generate happiness and peace.
On the other hand, a person who is not so wealthy or famous but who has a contented and compassionate heart is a real noble soul and leads a truly happy life. Thus, in order to compete in the world and attain worldly success, we should not take the wrong path. This is why you are learning to meditate at this young age, so that you do not take a wrong path at any cost. Even for the sake of the right goal, do not walk on the wrong path. Always take the right course for a righteous aim. Top
Q 25.
What are the characteristics of a good student?
SNG:
You have asked a very good question. All of you wish to excel as students. Then you should know the traits of a good student. In ancient India the qualities of a good student were recorded in Sanskrit:
Kakacheshta bakadhyanam, shwananidra tathaiva cha
Alpahari, brahmachari, vidyaarthi panch lakshanam
These are the five essential qualities that a student must possess:
Kakacheshta (kaka means crow) - You will find that a crow always remains alert and strives with full effort to do its task. You will never find it lazing around. Acquire this quality from a crow to fulfil one's assigned task ardently and enthusiastically.
Bakadhyanam (baka means crane) - While studying, focus entirely on your books. Similarly, while doing Anapana, do it with full concentration. In developing this quality of concentration, make a crane your inspiration. You may have noticed how a crane stands absolutely still on one leg without moving a single feather as if deep in meditation- with its mind fully concentrated on catching its prey. You should also learn how to meditate with concentration like that of a crane.
Shwananidra (shwana means a dog) - Sleep is essential for everyone. But to fall off into a deep slumber snoring loudly, oblivious of one's surroundings is not the right way of sleeping. The art of sleeping is mastered by a dog who, even though apparently fast asleep, will open his eyes and be wide-awake at the slightest sound. A student should also abandon laziness and unawareness and sleep with inner wakefulness like a dog. With the practice of Anapana and later Vipassana, you will attain the state of complete alertness even while being asleep. Like a dog, you will wake at the slightest movement.
Alpahari (one who eats less) - Eat according to your hunger. After having a satisfying meal, we tend to stuff ourselves with more food even though our stomach is full,. We pamper our tongues even on a full stomach. This will lead to lethargy and laziness. How can you hope to succeed when you will be wasting time sleeping, when you should be studying. A student should always remain alert and sleep only as much as is required; he should not get overpowered by sloth and torpor. For this, it is necessary to eat less.
Brahmachari (one who leads a life of celibacy) - A student who does not practise celibacy cannot afford to study. His or her mind will always remain absorbed in such harmful thoughts and thus will be unable to concentrate in studies. Therefore, as a student, one must observe celibacy. So work with this determination.
These are the five traits of an ideal student.
Q 26.
How do we know that we are progressing on the path of Dhamma?
SNG:
We know this by seeing whether a transformation is coming in our life or not. If our mind is still generating as much negativity as before, then there is no progress at all. The only criterion is to observe if there is a gradual decrease in our stock of defilements, and if we are developing the virtues that were missing before. If we continue to measure our success by this yardstick, then we will overcome the habit of committing wrong deeds. On the contrary, we will act virtuously. Others will also acknowledge us to be Dhamma people, for Dhamma will become an integral part of our lives. Ki
May all beings be happy. May all beings prosper. May all beings be blessed.
{SD}
Source: https://setu.dhamma.org/Goenkaji's%20Answers%20to%20Children.htm
.........................
...........................
*What are the characteristics of a good student?*
*Mr. S. N. Goenka:* All of you wish to excel as students. Then you should know the traits of a good student. In ancient India the qualities of a good student were recorded in Sanskrit:
*Kakacheshta bakadhyanam, shwananidra tathaiva cha.*
*Alpahari, brahmachari, vidyaarthi panch lakshanam.*
These are the five essential qualities that a student must possess:
*Kakacheshta (kaka means crow)* - You will find that a crow always remains alert and strives with full effort to do its task. You will never find it lazing around. Acquire this quality from a crow to fulfil one's assigned task ardently and enthusiastically.
*Bakadhyanam (baka means crane)* - While studying, focus entirely on your books. Similarly, while doing Anapana, do it with full concentration. In developing this quality of concentration, make a crane your inspiration. You may have noticed how a crane stands absolutely still on one leg without moving a single feather as if deep in meditation- with its mind fully concentrated on catching its prey. You should also learn how to meditate with concentration like that of a crane.
*Shwananidra (shwana means a dog)* - Sleep is essential for everyone. But to fall off into a deep slumber snoring loudly, oblivious of one's surroundings is not the right way of sleeping. The art of sleeping is mastered by a dog who, even though apparently fast asleep, will open his eyes and be wide-awake at the slightest sound. A student should also abandon laziness and unawareness and sleep with inner wakefulness like a dog. With the practice of Anapana and later Vipassana, you will attain the state of complete alertness even while being asleep. Like a dog, you will wake at the slightest movement.
*Alpahari (one who eats less)* - Eat according to your hunger. After having a satisfying meal, we tend to stuff ourselves with more food even though our stomach is full,. We pamper our tongues even on a full stomach. This will lead to lethargy and laziness. How can you hope to succeed when you will be wasting time sleeping, when you should be studying. A student should always remain alert and sleep only as much as is required; he should not get overpowered by sloth and torpor. For this, it is necessary to eat less.
*Brahmachari (one who leads a life of celibacy)* - A student who does not practise celibacy cannot afford to study. His or her mind will always remain absorbed in such harmful thoughts and thus will be unable to concentrate in studies. Therefore, as a student, one must observe celibacy. So work with this determination.
These are the five traits of an ideal student.
ref- https://www.vridhamma.org/FAQs-on-Anapana-Courses-for-Children૭૨)
🌷 मन क्या है? 🌷
🙏 बालकों के प्रश्न और गोयन्काजी के उत्तर 🙏
1) प्रश्न - मन क्या है?
उत्तर- जो सोचता है वह मन है। सोचने का सारा काम मन से होता है। सोचने की प्रक्रिया में मन हितकर या अहितकर कार्य कर सकता है। यदि वह दोषपूर्ण स्वभाव अपनाता है तो वह औरों के प्रति दौर्मनस्य और वैरभाव पैदा करेगा। इसकी जगह यदि मन अपने आपको सुधार ले तो यद्यपि यह सोचेगा तो अवश्य परंतु अब वह औरों के भले के लिए सोचेगा। यदि किसी में कमियां हैं, तो मन चाहेगा कि वह व्यक्ति उन कमियों से बाहर आये क्योंकि अब मन जानता है कि उसकी कमियों वह व्यक्ति गलत काम करेगा जिससे वह और अधिक संतापित और दुःखी होगा। इस प्रकार मन औरों के कल्याण के विचार रखेगा।
2) प्रश्न - मन को कौन सुधारता है?
उत्तर - मन ही अपने आपको सुधारता है। मन का एक भाग हर समय अपने क्रियाकलापों को देखता रहता है। जब कोई दुर्भावना या वैरभाव मन में जागता है तब यही भाग तुरंत चेतावनी देता है कि ऐसे दुर्भावनाभरे भाव अनुचित हैं। मन का यही देखने वाला भाग इस प्रक्रिया को समझेगा और अपने आपको बदलेगा। कोई भी अशांत नहीं रहना चाहता। सभी दुःखरहित सुखी जीवन जीना चाहते हैं। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए मन का देखने वाला भाग मन के दूसरे भाग के स्वभाव को बदलने का प्रयास करता है।
3) प्रश्न - आनापान से मन कैसे सुधर सकता है? आनापान मन को कैसे निर्मल कर सकता है?
उत्तर - मन जब तक आनापान करने में लगा रहता है, यानी सांस के आने-जाने को देखता रहता है, उस समय वह विचारविहीन रहता है और इसके परिणामस्वरूप यह विकाररहित रहता है। हमारे विचार ही मन को विकृत करते हैं। अधिकांशतः जब हम विचार करते हैं तब राग या द्वेष बना रहता है।
4) प्रश्न - निर्मल मन के क्या लक्षण हैं?
उत्तर - मन की वह दशा जब वह क्रोध, वैरभाव, दुर्भावना, राग, आदि से मुक्त रहता है तब वह निर्मल है। निर्मल मन कभी किसी के प्रति दुर्भावना उत्पन्न नहीं करता। इसके स्थान पर वह सबके लिए सौमनस्य, प्रेम, करुणा पैदा करता है। निर्मल मन के ये ही गुण हैं।
5) प्रश्न - आर्य मौन रखने का क्या महत्त्व है?
उत्तर - बहुत महत्त्व है। हमने अनुभव किया है कि मन कितना वाचाल है। हमारे चाहने पर भी कि मन सांस को देखे, मुश्किल से दो चार सांस देखने भी नहीं पाता कि अपने आप से अंतहीन बात करने और सोच-विचार के पुराने स्वभाव में लिप्त हो जाता है। हम जिनसे बात करते हैं, हम उनकी साधना को कमजोर कर देते हैं। निरर्थक बातें करके हम अपनी शक्ति का अपव्यय करते हैं। हमारी बातचीत हमेशा सप्रयोजन होनी चाहिए। लेकिन अभी हमारा काम
ध्यान करना है जो हम आर्य मौन रखकर करते हैं।
6) प्रश्न - सांस को देखने से शील-पालन में किस प्रकार मदद मिलती है?
उत्तर - अच्छा प्रश्न । सांस के स्वाभाविक प्रवाह को देखते-देखते हम अपने मन के मालिक बनने लगते हैं। हमारा मन उतना कमजोर और बेचैन नहीं रहेगा जितना पहले था। पहले जब हमारा मिजाज खराब रहता था, हम दूसरे व्यक्ति को या तो बुरा-भला कहते थे या अपना आपा खोकर उस पर वार करते थे और इस प्रकार अपना शील तोड़ते थे। कोई भी गलत काम मन को मैला करता है और आनापान का अभ्यास करने वाला व्यक्ति इस बात से तुरंत सावधान हो जाता है। मन के मैल को दूर करने का एकमात्र तरीका है कि कुछ समय के लिए सांस को देखो।
7) प्रश्न - मजाक-मजाक में शील तोड़ना क्यों ठीक नहीं है?
उत्तर - कई प्रकार के मजाक हो सकते हैं जहां आपको अनैतिक व्यवहार नहीं करना पड़े। यदि आप मजाक में ही एक बार शील तोड़ते हो तो आप बार-बार वैसा करने को तत्पर होंगे। आप ऐसा करके उसे उचित ठहराने का प्रयास करेंगे। इन हालात में शील भंग करना गलत होगा, इसलिए प्रयत्न करो कि मजाक में भी ऐसा करने को मन नहीं करे।
8) प्रश्न - यदि किसी भले काम के लिए झूठ बोलना पड़े तो क्या यह भी अकुशल कर्म होगा?
उत्तर- सभी परिस्थितियों में अकुशल कर्म तो अकुशल कर्म ही है। सर्वप्रथम आप विश्वासपूर्वक कैसे कह सकते हो कि जिस कारण से झूठ बोले वह उचित ही था? जब कोई विश्लेषण करता है और वस्तुस्थिति को समझता है तब उसकी अपनी सीमाएं होती हैं, तब आप फिर किसी कारण से झूठ बोलने लगते हैं। जो आपको सही लगता है। इस प्रकार करने के स्वभाव से दूर रहो। केवल सत्य ही बोलो।
9) प्रश्न - यदि हमसे हमारा शील भंग हो जाय तो हम कैसे सुधारें?
उत्तर - अपनी गलतियां छिपायें नहीं। यदि अपनी गलती छिपाते हो तो आप उसे अवश्य दोहरायेंगे। यह एक अंतहीन प्रक्रिया होने लगेगी। यदि आप किसी बुजुर्ग या सम्माननीय व्यक्ति के सामने अपना अपराध स्वीकार करते हो और यह भी प्रतिज्ञा करते हो कि किसी भी परिस्थिति में ऐसा पुनः नहीं करेंगे, तो आप देखेंगे कि आपका मन मजबूत होने लगा। जब आप अपने गलत कामों पर पर्दा नहीं डालते हो तब आप उसे दोहरा नहीं पायेंगे।
10) प्रश्न - हम सिगरेट क्यों नहीं पियें या ड्रग अथवा शराब का सेवन क्यों नहीं करें?
उत्तर - कोई आपको इस तर्क पर कि छोटा-सा कश हानिकारक नहीं है या इससे मजा आता है, सिगरेट पीने या नशा करने के लिए फुसला सकता है। आप शिथिल होकर थोड़ी मात्रा से प्रारंभ कर दो। धीरे-धीरे आपको लत लग जाय। यह एक असाध्य रोग की तरह हो जायगा। अपने किसी अंतरंग मित्र के कहने पर भी शराब मत पीओ, सिगरेट अथवा ड्रग का सेवन मत करो।
11) प्रश्न - बेईमान हुए बिना इस प्रतिस्पर्धावाले संसार में कैसे सफल हो सकते हैं?
उत्तर- अच्छी तरह समझो कि इस प्रकार का विचार कमजोर मन की उपज है। यह साधना तुम्हें इतनी सशक्त बनायगी कि कभी शील भंग का विचार ही नहीं कर पाओगें या कोई गलत तरीके अपना सकोगे और देखोगे कि सफलता तुम्हारे कदम चूम रही है। जैसे-जैसे बड़े होओगे, तुम जानोगे कि जिन लोगों ने बेईमानी के सहारे नाम, यश, पद या धन कमाया है और सफल जीवन जीने वाले दिखाई देते हैं, वे अशांत और दुःखी रहते हैं। ऐसा व्यक्ति न तो रात में चैन से सो पाता है और न दिन में उसका मन शांत रहता है। दूसरी ओर, एक व्यक्ति जो इतना धनवान या प्रसिद्ध नहीं है और जिसके पास संतोष और करुणा से भरा हृदय है, वह वास्तव में कुलीन है और सुखी जीवन जीता है। यही कारण है कि आप इस छोटी उम्र में ध्यान करना सीख रहे हो ताकि आप किसी भी कीमत पर गलत राह पर न जा सको । सही उद्देश्य के लिए भी गलत मार्ग पर मत चलो। सही उद्देश्य के लिए हमेशा सही मार्ग ही अपनाओ।
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╔═══ஜ۩۞۩ஜ═══╗
✺भवतु सब्ब मंङ्गलं✺
✺भवतु सब्ब मंङ्गलं✺
✺भवतु सब्ब मंङ्गलं✺
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🌷🙏🌷🙏🌷🙏🌷🙏🌷
૭૧)
🌷 चार महत्वपूर्ण साधनापयोगी प्रश्नोत्तर 🌷
🍂विषय: 1.वासना, 2.गर्मी, 3.झटके (Jurks), 4.ध्यान 🍂
🙏केवल पुराने विपश्यी साधकों के लिये🙏
प्रश्न-1:- विपश्यना ध्यान से ऐसा लगता है कि मन चिंताओं, संकल्प-विकल्पों से मुक्त रहता है जिससे अत्यधिक मात्रा में शक्ति एकत्र होती है जो वासना का कारण बनती है। विपश्यना से जहां (अन्य) दुर्गुणों का नाश होता है वहां कहीं मन वासना से चंचल तो नहीं होता? उसे नियमित करने हेतु स्वाध्याय का सहारा लेना पड़ता है।
स. ना. गोयन्का :- विपश्यना साधना द्वारा मन में वासना नहीं बढ़ सकती। विपश्यना विधिवत की जाय तो मन के भीतर संग्रहीत सभी विकारों का क्षय हो जाता है। वासना के विकारों का भी क्षय होता ही है। जिस समय चित्त शांत होने लगता है, चिंताओं और संकल्प-विकल्पों से मुक्त होने लगता है तब बिना ही प्रयत्न किये हुए नैसर्गिक तौर पर अर्धचेतन और अचेतन मन का ऑपरेशन होना शुरू हो जाता है।
अंतर्मन की गहराइयों में जो भी सुषुप्त विकार हैं वे उदीर्ण होने लगते हैं और चेतन चित्त पर प्रकट होने लगते हैं। यदि अंतर्मन में वासना के विकार दबे हुए हैं तो उनका उभार आना स्वाभाविक ही है और कल्याणकारी भी है। उस समय इन उभरे हुए विकारों को साक्षीभाव से देखना शुरू कर दें। स्वाध्याय और चिंतन-मनन का अपना महत्त्व है। उनके द्वारा बुद्धि के स्तर पर और चेतन चित्त के स्तर पर कुछ लाभ अवश्य होता है। पर जैसे विपश्यना में होता है, वैसे विकारों का उपशमन नहीं होता, उनकी निर्जरा नहीं होती, वह जड़ से नहीं उखड़ते। बल्कि फिर अंतर्मन की गहराइयों में दबा दिये जाते हैं।
इसलिए विपश्यना करते हुए चित्त शांत होने पर जब कभी गहरा ऑपरेशन हो जाय और अंतर्मन की तलस्पर्शी गहराइयों से कोई विकार उभरकर बाहर आये तो एक ओर इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि मेरे ही किसी पूर्व-संचित विकार की गंदगी उभरकर बाहर आयी है और दूसरी ओर शरीर पर होनेवाली तत्कालीन संवेदनाओं को साक्षीभाव से देखना शुरू कर देना चाहिए।
वैसे तो जो भी विकार जागेगा उसका संबंध सारे शरीर पर सहजभाव से होनेवाली संवेदनाओं से हो जायगा, परंतु यदि वासना का विकार जागा है तो अच्छा हो कि उस समय कुछ देर तक अपनी जांघों पर होनेवाली संवेदनाओं को तटस्थभाव से देखते रहें। और थोड़ी-थोड़ी देर के बाद मन को पगथलियों की ओर ले जायं। समता बनी रहे। इस प्रकार वासना के विकार की परतें उतरती चली जायेंगी और समय पाकर इस विकार से पूर्णतया मुक्ति मिल जायगी।
प्रश्न- 2:- विपश्यना से शायद गर्मी उत्पन्न होती है। उस गर्मी से मलद्वार से रक्त जाने लगता है। अधिक बार ध्यान करने से ऐसा महसूस होता है। हो सकता है इसमें विपश्यना का दोष न होकर अधिक बैठने से या अन्य शारीरिक कारणों से भी ऐसा होता है।
उत्तर:- विपश्यना करते हुए शरीर में किसी भी प्रकार की संवेदना उत्पन्न हो सकती है। विपश्यना की गहराइयों में जाने पर अधिकतर जो भी संवेदनाएं उत्पन्न होती हैं, उनका हमारे पूर्व-संचित विकारों से गहरा संबंध होता है। ईर्ष्या, द्वेष जैसे पूर्व-संचित विकारों की उदीरणा से गर्मी की संवेदना उत्पन्न होती है, यह स्वाभाविक है।
परंतु इससे किसी की हानि नहीं हो सकती। उसे समताभरे चित्त से देखते रहे । विकारों के साथ-साथ इस गर्मी का उपशमन होगा ही। मलद्वार से रक्त निकलता हो तो मन में समताभाव रखते हुए इस शारीरिक रोग की चिकित्सा किसी योग्य चिकित्सक से करानी चाहिए।
प्रश्न-3:- विपश्यना में थोड़ी-थोड़ी देर बाद झटके-से लगने लगे हैं। झटके लगते वक्त ऐसा लगता है कि जैसे एकदम सोते से जागा होऊ। परंतु सोया भी तो नहीं था। यह तभी होता है जब मानसिक विचार अधिक मात्रा में शांत होने लगते हैं।
उत्तर:- विपश्यना के अभ्यास द्वारा जैसे-जैसे चेतन चित्त के विकारों का क्षय होने लगता है वैसे-वैसे विचार कम होने लगते हैं और मन अपनी ही गहराइयों में पैठने लगता है। यही अंतर्मन की गहराइयों का ऑपरेशन है जिसकी वजह से कोई दबा हुआ विकार छेड़ दिया जाता है और उसकी उदीरणा होती है जो कभी झटके के रूप में भी प्रकट होती है। उससे घबराना नहीं चाहिए बल्कि उसके प्रति अनित्यबोध कायम रखते हुए उसे समता से देखना चाहिए।
प्रश्न-4:- विपश्यना ध्यान में भी संवेदनाओं देखने का कार्य करना पड़ता है। जहां कुछ करना पड़े ध्यान की वह स्थिति नहीं होती। ध्यान तो व्यक्ति का सहज स्वभाव है। विचारहीन होना ही तो ध्यान है। फिर करना तो बोझा-सा लगता है।
उत्तर:- विपश्यी साधक शनैःशनैः अभ्यास द्वारा भोक्ताभाव की पुरानी आदत से मुक्त होता है और इसी प्रकार कर्त्ताभाव से भी। वह यह तथ्य अपनी अनुभूतियों से जानने लगता है कि शरीर की सीमाओं के भीतर जो भी घटना घट रही है, उस पर उसका कोई अधिकार नहीं है। अतः उसके प्रति कर्ताभाव रखना अपने अहंभाव का पोषण करना है जो कि विपश्यना के विरुद्ध है।
૭૦) 🌷 रोगी की सेवा ही बुद्ध की सेवा 🌷
एक समय एक भिक्षु बीमार होने की वजह से दुर्बल, असहाय अवस्था में अपने मल-मूत्र में पड़ा था। अपने अस्वच्छ शरीर को स्वयं स्वच्छ करने की उसमें जरा भी शक्ति नहीं थी।
उस समय भगवान आयुष्मान आनन्द को साथ लेकर विहार का निरीक्षण करते हुए उस भिक्षु के निवास पर गये। भगवान ने उस भिक्षु को अपने मल-मूत्र में पड़ा देखा। भगवान द्वारा भिक्षु से बीमारी का कारण पूछने पर उस भिक्षु ने भगवान को अपनी बीमारी का कारण बताया।
भगवान ने उससे पूछा
“भिक्षु! क्या तुम्हारे पास कोई परिचारक नहीं है?"
"नहीं है, भगवान।"
“क्या अन्य भिक्षु तुम्हारी परिचर्या (सेवा) नहीं करते?"
“भंते! मैंने भिक्षुओं की कभी कोई सेवा नहीं की थी, इसलिए भिक्षु मेरी सेवा नहीं करते।"
तब भगवान ने आयुष्मान आनन्द को संबोधित किया - “जा आनन्द! पानी ला, इस भिक्षु को नहलायेंगे।"
“अच्छा, भंते!" कह कर आयुष्मान आनन्द पानी लेकर आये।
भगवान ने रोगी के शरीर पर पानी डाला। आयुष्मान आनन्द ने उसे धोया। भगवान ने उसे सिर से पकड़ा। आयुष्मान आनन्द ने पैर से । उन्होंने उसे उठा कर चारपाई पर लिटा दिया। तब भगवान ने इसी संबंध में भिक्षु-संघ को एकत्रित कर उस भिक्षु की बीमारी, उसके परिचारक तथा उसकी कोई सेवा नहीं करता, इन सबका कारण पूछा।
भिक्षुओं ने भगवान को बताया "भंते! उस भिक्षु ने अन्य रोगी भिक्षुओं की कभी कोई सेवा नहीं की, इसलिए कोई भिक्षु उसकी सेवा नहीं करता।"
“भिक्षुओ! न यहां तुम्हारी माता है, न पिता, जो कि तुम्हारी सेवा करें। यदि तुम एक दूसरे की सेवा नहीं करोगे तो अन्य कौन करेगा?"
“यदि रोगी उपाध्याय हो या आचार्य हो या शिष्य हो, या साथ विहार करने वाला भिक्षु हो तो यावज्जीवन उसकी सेवा करनी चाहिए, जब तक कि वह रोगमुक्त न हो जाय । "यदि सेवा न करे तो दुक्कट (दुष्कृत) का दोष हो।"
“भिक्षुओ! कौन होता है योग्य रोगी-परिचारक?"
“पांच बातों से युक्त रोगी-परिचारक रोगी की परिचर्या करने योग्य होता है-
(१) दवा ठीक समय पर देने में समर्थ होता है;
(२) अनुकूल-प्रतिकूल को जानता है। प्रतिकूल को हटाता है, अनुकूल को देता है;
(३) किसी लाभ के लिए नहीं, बल्कि मैत्रीपूर्ण चित्त से रोगी की सेवा करता है;
(४) मल-मूत्र, थूक और वमन को हटाने में घृणा नहीं करता;
(५) रोगी को समय-समय पर, धार्मिक कथा सुना कर सम्यक प्रकार से धर्म में प्रेरित और हर्षित करने में समर्थ होता है।"
यह सदा ध्यान रहे -
"यो, भिक्खवे, मं उपट्ठहेय्य सो गिलानं उपट्ठहेय्य।"
“भिक्षुओ! जो मेरी सेवा करना चाहे, वह रोगी की सेवा करे।" इसमें महान पुण्य निहित है I
🙏🙏🙏
૬૯)
🌷 उत्तम मंगल -- क्षेमपुर्ण जीवन
साधक जैसे जैसे विपश्यना प्रज्ञा में स्थित होते जाता है, वैसे वैसे भयमुक्त होते जाता है।
वह साधना के द्वारा अपने भीतर की सच्चाइयों के अनुभव से और बाहर जगत में सांसारिक द्वंदों के आने से यह खूब समझने लगता है कि जो कुछ अनुभव हो रहा है वह अनित्य है, नश्वर है, भंगुर है, परिवर्तनशील है। अनंत काल तक एक जैसा रहने वाला नही है।
जैसे जैसे परिवर्तनशील अवस्था को भीतर ही भीतर अनुभूति द्वारा देखता है, समझता है वैसे वैसे बेहोशी दूर होती है, अविद्या दूर होती है।
और यह स्पष्ट समझ में आने लगता है कि यह शरीर प्रपंच जिसे नासमझी से मै-मै, मेरा-मेरा और मेरी आत्मा माने जा रहा था वह कितना गलत था।
जो प्रतिक्षणं बदल रहा है वह न मै हूँ, न मेरा है, न मेरी आत्मा है।
यों देहात्मबुद्धि के अज्ञान से छुटकारा पाता है।
🌷 और इसी प्रकार जिस चित्त को मै-मै, मेरा-मेरा, मेरी आत्मा माने जा रहा था उसे भी देखता है कि कितना अनित्य है, नश्वर है, भंगुर है, परिवर्तनशील है।
तो खूब समझ में आने लगता है- यह चित्त भी न मै हूँ, न मेरा है, न मेरी आत्मा है। यों चित्तात्मबुद्धि से छुटकारा पाता है।
🍁जब देहात्मबुद्धि और चित्तात्मबुद्धि से छुटकारा पाता है तो मै-मेरे से छुटकारा पाता है, तो मै- मेरे के प्रति जो आसक्ति है उससे छुटकारा पाता है।
इस आसक्ति से जब छुटकारा पाता है, तब निर्भय हो जाता है।
जब तक यह आसक्ति बनी रहती है तब तक यह भय बना रहता है कि मुझे क्या हो जाएगा, जिसे मेरा कहता हूँ उसे क्या हो जाएगा।
ज्यों ज्यों इस परिवर्तनशील स्वभाव की अनुभूति पुष्ट होती जाती है त्यों त्यों निर्भय होता जाता है।और जहाँ निर्भय हुआ, भयमुक्त हुआ, वहां अपने आप क्षेम की अवस्था प्राप्त हो गयी।
असुरक्षा का भय दूर हुआ तो क्षेमपूर्ण सुरक्षा का भाव पुष्ट हुआ।
यों यह अड़तीसवाँ मंगल लाभ पहुँचाने लगा।
*🌷 गुरूजी- जब जब भय (fear) जागता है, तो जिस बात को लेकर भय जागा उस बात पर ध्यान नहीं देना।*
बस इस सच्चाई को स्वीकार करो की इस समय मेरे मन में भय जागा है, और उस समय जो भी संवेदना जागी हो, कहीं भी जागी हो तो उसको अगर देखोगे तो भय कम होता चला जाएगा।
भय को जबरदस्ती दूर करने की कोशिश मत करो, बस साक्षी भाव से देखो (as a witness).
भय के आलंबन (cause) पर ध्यान करोगे तो भय बढ़ेगा ही।आलंबन से कोई लेना देना नहीं।
भय है और यह संवेदना है, अपने आप दूर होती चली जायेगी।
*प्रश्न : क्या भय भी एक तरह का द्वेष है ?*
हाँ। अपने आप से आसक्ति के कारण ही भय उपजता है।
उस कारण सदा ही एक असुरक्षा का भाव बना रहता है -- "क्या होगा ? मेरा क्या होगा ? " यह भय ही है ।
तो तुम्हें उन घटनाओं के प्रति, उन परिस्थितियों के प्रति द्वेष है जो तुम चाहते हो की तुम्हारे साथ न हो।
यह राग और द्वेष साथ-साथ ही चलते हैं और दोनों मिलकर भिन्न-भिन्न प्रकार के विकार लातें हैं।
भय भी इन्ही विकारों की उपज है । इसको भी केवल साक्षी भाव से देखो और यह भी समाप्त हो जाएगा।
इतने साधकों का भय समाप्त हुआ है, तुम्हारा भी होगा ही।
मंगल हो 🌱
૬૮)
कृतज्ञ हैं !
परम आदरणीय गुरुदेव!
आप का मंगलमय सान्निध्य आज भी महसूस होता रहता है ।
धर्म का सान्निध्य है तो आप का सान्निध्य है ही । धर्म का सान्निध्य बना रहे ताकि आपका मंगलमय सान्निध्य बना रहे । यहीं शिवसंकल्प है ।
कितना मंगलमय है आप का सान्निध्य ! धर्म का सान्निध्य ! ज़ब-जब धर्म-सान्निध्य होता है तब-तब आप की असीम करुणा का स्मरण हो आता है और मन कृतज्ञता व रोमांच-पुलक से भर उठता है ।
मन कृतज्ञता से भर उठता है उन भगवान सम्यक-सम्बुद्ध शाक्यमुनि के प्रति, जिन्होंने असंख्य जन्मो तक साधनामय जीवन जीने हुए दसों पुन्य-पारमिताओ को परिपूर्ण किया जिससे कि न केवल अपनी स्वस्ति-मुक्ति साध सके, बल्कि अनेकों की स्वस्ति-मुक्ति का कारण बने। ऐसी कल्याणकारी विद्या खोज निकाली जिसे कि जीवन भर करुणचित्त से मुक्तहस्त बांटते रहे, जिससे अगणित लोगों का मंगल सधा।
और कृतज्ञता से मन भर उठता है उन जीवन-मुक्त अर्हन्तो के प्रति जिन्होंने कि यह कल्याणकारी विद्या भगवान से प्राप्त कर
“चरथ भिक्खवे, चारिकं बहुजन हिताय, बहुजन सुखाया लोकानु-कम्पाय " के मंगल आदेश को शिरोधार्य कर गांव-गांव, नगर-नगर, जनपद-जनपद इस मुक्तिदायिनी विद्या को बांटने में अपना जीवन लगा दिया।
और कृतज्ञता से मन भर उठता है उन सभी सत्पुरुषों के प्रति जिन्होंने कि इस पावन धर्म-गंगा को अनेक पीढियों तक प्रवहमान रखा।
कृतज्ञता से मन भर उठता है उन अर्हन्त सोंण और उत्तर के प्रति जो कि विदेश-यात्रा के सभी संकटों को झेलते हुए भगीरथ की
तरह इस धर्मगंगा को स्वर्णभूमि ले गये और अगणित प्यासों की प्यास बुझायी ।
और कृतज्ञता से मन भर उठता है उन परंपरागत धर्मआचार्यों के प्रति जिन्होंने कि ब्रह्मदेश में गुरु-शिष्य परंपरा द्वारा इस विद्या को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने शुद्ध रूप में कायम रखा । इसमें शब्दों का, रंग-रूप का, आकृति, कल्पनाओं आदि का सम्मिश्रण नहीं होने दिया । जो पथ स्थूल भासमान सत्य का भेदन करता हुआ सूक्ष्मतम परम सत्य की और ले जाने वाला राजपथ है,
उसे एक स्थूल भासमान सत्य से दूसरे स्थूल भासमान सत्य की ओर ले जाने वाली अंधी गली नहीं बनाया । शुद्ध रूप में रखा तो ही हमें शुद्ध रूप में यह विद्या प्राप्त हुई ।
और कृतज्ञता से मन भर उठता है इस पुनीत आचार्य-परंपरा के पिछली सदी के जाज्वल्यमान नक्षत्र लैडी सयाडो के प्रति और सद्रुहस्थ आचार्य सयातैजी के प्रति जिन्होंने कि इस उत्तरदायित्व को कितने आदर्शरूप से निभाया ।
और कृतज्ञता से मन भर उठता है, गुरुदेव ! आपके प्रति, जो इतने करुणाचित्त से इस अनमोल धर्मरत्न का दान दिया । यदि यह
धर्मरत्न न पाता तो क्या दशा होती? धन दौलत के संचय-संग्रह और सामाजिक पद-प्रतिष्ठा की होड़-दौड में ही जीवन खो देता ।
धर्म की ओर झुकाव होता भी तो क्रिसी संप्रदाय की बेडियों को ही आभूषण माने रहता । परायी अनुभूतियों के गर्व-गुमान में ही जीवन बिता देता । सत्य-धर्म की प्रत्यक्षानुभूति वाला यह सम्यक-दर्शन कहां उपलब्ध होता ? कल्पनाओं को ही सम्यक-दर्शन मानकर संतुष्ट हो लेता । यथाभृत दर्शन द्वारा सम्यकज्ञान कहाँ उपलब्ध होता? बौद्धिक 'ऊहापोह को ही सम्यक ज्ञान मानकर जीवन खो देता । कर्मकांड, पूजापाठ, भजनक्रीर्तन अथवा स्वानुभूति-विहीन मत-मतान्तरीय दार्शनिक मान्यताओं की जकडन में अनमोल मनुष्य जीवन गवाँ देता । अपने यह अनुत्तर-अनुपम धर्मदान देकर मानव-जीवन सफल कर दिया गुरुदेव !
सचमुच अनुत्तर-अनुपम ही है यह धर्म-साधना !
कितनी ऋजु, कितनी स्पष्ट, कितनी वैज्ञानिक, कितनी मांगलिक ! बंधन से
मुक्ति की ओर ले जाने वाली l माया मरीचका से निभ्रन्ति की ओर ले जाने वाली ! भासमान प्रकट सत्य से परमसत्य की ओर ले जाने वाली ! ऐसी अनमोल निधि की निर्मलता अपने शुद्ध-रूप में कायम
रहे हैं आज के इस पुण्य-दिवस पर यही शिवसंकल्प है । कहीं किसी प्रकार के सम्मिश्रण की भूल का हिमालय जैसा बडा अपराध न हो जाय ! यह अनमोल निधि अपने निष्कलुष रूप में कायम रहे और
इसके अभ्यास द्वारा जन-ज़न की मुक्ति के लिए अमृत का द्वार खुले, इसी में आप का सही पूजन-वन्दन , आदर-सम्मान समाया
हृआ है ।
विनीत धर्मपुत्र .
सत्यनारायण गोयन्का
(19 जनवरी 1971 सयाजी ऊ बा खिन जी की पुन्य-तिथि एव गुरुदेव श्री गोयनकाजी की
जन्म-तिथि के 30 जनवरी 1924 पर- विपश्यना वर्ष ४२ अंक ११ से साभार )
૬૭) 🌷 संवेदना (१) 🌷
📃 अनंत आकाश में समय-समय पर नाना प्रकार की हवाएं उठती हैं, बहती हैं, चली जाती हैं। कभी पूर्वी, कभी पश्चिमी, कभी उत्तरी, कभी दक्षिणी। कभी उष्ण, कभी शीतल, कभी घूल-भरी, कभी घूल-विहीन, कभी दुर्गधित, कभी सुगंधित, कभी प्रभंजनीय प्रलयंकर, कभी शांत, मंद, मंथर। आकाश उनसे प्रभावित नहीं होता। हवाएं आती हैं, कुछ समय तक बहती हैं, पर देर-सवेर चली ही जाती हैं।
किसी सराय में, धर्मशाला में, होटल में, मोटल में नाना प्रकार के लोग आते रहते हैं। पूर्व के भी, पश्चिम के भी, उत्तर के भी, दक्षिण के भी। गोरे भी, काले भी, पीले भी, भूरे भी, नाटे भी, लंबे भी, मोटे भी, दुबले भी, बलवान भी, बलहीन भी, खूबसूरत भी, बदसूरत भी। धर्मशाला उनसे प्रभावित नहीं होती। लोग आते हैं, कुछ समय तक टिकते हैं, पर देर-सवेर चले ही जाते हैं।
ठीक इसी प्रकार हमारे शरीर में नाना प्रकार की संवेदनाएं आती हैं, समय तक रुकती हैं, पर देर-सवेर चली ही जाती हैं। अनंतकाल तक रहने के लिए नहीं आतीं। लेकिन हम उनसे प्रभावित होते रहते हैं, प्रतिक्रिया करते रहते हैं। राग की प्रतिक्रिया, द्वेष की प्रतिक्रिया। ऐसा क्यों होता है ?
क्योंकि हमारी संज्ञा उनका मूल्यांकन करती है और गलत मूल्यांकन करती है। किसी संवेदना को सुखद कहती है, किसी को दुःखद, किसी को असुखद-अदुःखद । जिसे सुखद कह दिया, प्रिय मानकर उसके प्रति राग की, जिसे दुःखद कह दिया, अप्रिय मानकर उसके प्रति द्वेष की प्रतिक्रिया करने का स्वभाव हो गया है हमारा ।
सुखद संवेदना हो तो उसे कायम रखने अथवा बढ़ाने की प्रतिक्रिया, दुःखद संवेदना हो तो उसे शीघ्र दूर करने की प्रतिक्रिया, और यदि असुखद-अदुःखद हो तो उससे भी ऊब कर उसे दूर करने के लिए द्वेष की और किसी सुखद संवेदना को प्राप्त करने के लिए राग की प्रतिक्रिया करते हैं।
यदि संज्ञा का स्थान प्रज्ञा ले ले तो गलत मूल्यांकन करना छूट जाय। फिर सभी संवेदनाओं का सही मूल्यांकन होगा जो कि अनुभूतियों के स्तर पर उनके सही गुण-धर्म स्वभाव को जानकर ज्ञानपूर्वक होगा। तब राग द्वेष की प्रतिक्रिया करनी बंद कर देंगे। यदि प्रज्ञा का सही मूल्यांकन होगा तो यही होगा कि चाहे सुखद है या दुःखद अथवा असुखद-अदुःखद; स्थूल है या सूक्ष्म; प्रिय है या अप्रिय, सभी संवेदनाएं अनित्य-धर्मा हैं, भंगुर-धर्मा हैं, विपरिणाम धर्मा हैं, परिवर्तन-धर्मा हैं।
आकाश में वायु की तरह, सराय में मुसाफिर की तरह आती हैं तो जाने के लिए, रुके रहने के लिए नहीं। और इन संवेदनाओं पर अपना कोई अधिकार नहीं, कोई प्रभुत्व नहीं। किसी विशेष संवेदना का आवाहन करें तो वह आती नहीं, किसी को रोके रखना चाहें तो रुकती नहीं; किसी को निकालना चाहें तो निकलती नहीं। जो होता है अपने स्वभाव से होता है; कुदरतन होता है।
तो जो अनित्य है, जो अनात्म है उसके प्रति स्थापित किया गया तादात्म्य-भाव, उसके प्रति की गई राग या द्वेष की प्रतिक्रिया दुःखद ही है।
प्रज्ञा का यह मूल्यांकन सही मूल्यांकन है। इसकी वजह से साधक समता में स्थिर रहता है और सभी दुःखों से छुटकारा पाने का रास्ता पा लेता है। यही विपश्यना है। यही चित्त विशोधनी धर्म-गंगा है। यही मुक्ति-दायिनी धर्म-गंगा है।
आओ साधको! विपश्यना की इस धर्म-गंगा में डुबकी लगाकर सारे दुःखों से मुक्ति पा लें, और सही माने में अपना मंगल साध लें! कल्याण साध लें!
क्रमश:......(भाग-2)
🙏🌸🙏🌸🙏
विपश्यना पत्रिका संग्रह (भाग-4)
विपश्यना विशोधन विन्यास ॥
भवतु सब्ब मंङ्गलं !!
🙏🙏🙏
૬૬)
🙏🙏🙏
[समय-समय पर साधकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में पूज्य गुरुजी द्वारा किये गये समाधान के कुछ अंश!]
👍विपश्यना से स्वास्थ्य में सुधार होता ही है, परंतु विपश्यना को केवलमात्र शारीरिक स्वास्थ्य के सुधार के मापदंड से ही नहीं मापना चाहिए अन्यथा शुद्ध धर्म का अवमूल्यन होता है।
👍स्वास्थ्य मनोनुकूल न हो तो भी उसको लेकर मन अपनी समता न खो बैठे, संतुलन न बिगाड़ बैठे, यही विपश्यना का बहुत बड़ा लाभ है। विश्वास है विपश्यना तुम्हें यथोचित मानसिक क्षमता प्रदान करेगी और उससे ही स्वास्थ्य में भी लाभ होगा।
👍यह आवश्यक नहीं है कि अनुभूति सदा बदलती ही रहे। अरसे तक एक जैसी ही अनुभूति होती रहे तो उसमें कोई दोष नहीं। वस्तुतः कोई भी अनुभूति अपने आप में ही अनित्यता की बोधक है। जहां कुछ ठोस मालूम होता है वहां कभी-कभी देर तक रुक सकते हैं, परंतु बीच-बीच में सारे शरीर की यात्रा करते रहना चाहिए।
👍भिन्न-भिन्न प्रकार से ही साधना का अभ्यास कर सकते हैं जिससे कि साधना यंत्रवत न हो जाय। समय कम लगे या अधिक, इसका भी कोई महत्त्व नहीं है। मुख्य बात यह है कि मन को शरीर के भीतर होने वाली संवेदनाओं के प्रति जागरूक रखे और किसी भी प्रकार की स्थिति को लेकर समता न खो बैठे। उसका संतुलन बना ही रहे । यही विपश्यना का अभ्यास है।
👌मैत्री भावना : मंगल भावना में शरीर के जिस किसी भाग में सूक्ष्म तरंगें महसूस होती हों, उस पुलक-रोमांच को ही मैत्रीभावों से भर कर साधना करनी चाहिए। यदि हृदयक्षेत्र में भी ऐसी पुलकावलियां महसूस होती हों तो विशेषरूप से यहां से कर सकते हैं।
👍किसी भी बात को अंधविश्वास से मान लेना धर्म के विरुद्ध होता है। स्वयं अपनी अनुभूतियों से किसी बात को जान लेना और जान कर उसे स्वीकार करना यही धर्म की बात होती है।
👍एक साथ एक से अधिक साधना पद्धतियों को सम्मिलित करते रहने की प्रवृत्ति दूर हो और विपश्यना के प्रति अनन्यभाव पुष्ट हो तो ही साधक को लंबे अरसे तक इस साधनापद्धति की गहराइयों तक ले जाने का अभ्यास कराया जा सकता है।
👍तुम्हें भी नित्यप्रति सुबह-शाम साधना करके अपनी साधना का पुण्य अपने माता-पिता तथा परिवार के अन्य लोगों को बांटना चाहिए जिससे उनका धर्मबल बढ़े और साथ-साथ तुम्हारा भी।
👍जिस समय मन अधिक बेचैन हो, बार-बार उचट जाता हो, उसी समय तो साधना की आवश्यकता है। ऐसे समय साधना सहायक न होगी तो वह हमारे किस काम की?
👍वासना की तरह भय भी हमारे अंतर्मन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विकार है। बड़े धीरज के साथ अभ्यास करते हुए इस विकार से भी छुटकारा लेना है। जब-जब भय का संचार हो तब जिन कारणों को लेकर भय के विकार उत्पन्न हुए हैं, उन कारणों को महत्त्व न देकर इस बात को महत्त्व देना चाहिए कि इस समय मेरी चित्त-धारा पर भय का विकार उत्पन्न हुआ है और उसके साथ-साथ शरीर में इस प्रकार की संवेदनाएं हो रही हैं। जो मन में जागा है यह भी अनित्य है: परिवर्तनशील है: सदा रहने वाला नहीं है। यों इसे साक्षीभाव से देखेंगे तो इसका प्रभाव भी क्षीण होता चला जायगा, इसकी जड़ें उखड़ती चली जायेंगी। विपश्यना द्वारा विकारों के उन्मूलन का यही तरीका है।
👍जब कोई विकार मन में उठे, चाहे वह वासना का ही क्यों न हो, तत्काल चित्त का एक भाग उसे साक्षीभाव से देखने लगे और साथ-साथ शरीर के किसी हिस्से में जो संवेदना हो रही है, उस संवेदना को भी साक्षीभाव से देखे। सिर से पांव तक जहां कहीं भी संवेदना हो रही है, उसके अनित्यभाव को समझते हुए यह भी समझे कि मन में जो यह विकार उठा है वह इन संवेदनाओं की तरह ही उदय-व्यय स्वभाव वाला है। ध्रुव और शाश्वत नहीं है। देखें कि इसका प्रभाव भी कितनी देर रहता है? जैसे ही यों दृढ़तापूर्वक साक्षीभाव से देखने लगेंगे वैसे ही हर विकार का चाहे वह वासना हो या और उसका शमन होगा ही।
👍जब कभी मन इस बात (किसी प्रिय जन के देहांत) को लेकर विह्वल हो उठे तो इस विह्वलता को कुछ देर साक्षीभाव से देखते रहना चाहिए और उस समय जो भी शारीरिक संवेदना हो उसे भी। इससे विह्वलता का यह भावावेश बहुत गहरा असर नहीं पैदा कर सकेगा।
✍ संपादक
पुस्तक : विपश्यना लोकमत (भाग-1)
विपश्यना विशोधन विन्यास ।।
भवतु सब्ब मगंलं !!
🙏🙏🙏
૬૫) 🌹
प्रश्न गुरुजी हमारे पीछे शनि का जो प्रकोप चल रहा हैं उससे कैसे बचें?
उत्तर अरे भाई,शनि देवता से या शनि नक्षत्र से तुम्हारी कोई दुश्मनी तो है नही, फिर वह तुम पर क्यों प्रकोप करने लगा।
प्रकोप अपने पूर्व दुष्कर्मों के परिणाम का है।
आत्ममुखी साधना द्वारा उसके प्रति समता से सामना करना आ जाए तो जिसे प्रकोप कहते हो वह शीघ्र दूर होगा।और रहे तो भी उतना कष्टदायक नही होगा।
मन विचलित नहीं होगा।
इन ग्रह नक्षत्रों के चक्कर में पड़कर उनको संतुष्ट करने के जंजाल से बचना ही उचित है।
૬૪) 🌹
प्रश्न गुरुजी इस जीवन में हमारे साथ जो भी हो रहा है, क्या वह हमारे पूर्व कर्मो का ही परिणाम है।
उत्तर यह सच है तो भी हम इसके कारण अपने आप को निष्क्रिय(inactive) न बना लें।
यह सोचकर कि हमारे पूर्व कर्म के अनुसार जो होने वाला है सो तो होगा ही,हम उसमे क्या कर सकते हैं।
यह धर्म के,प्रकृति के नियमो के बिलकुल विरुद्ध चिंतन होगा।
यह सच है कि पुराने कर्म हमारे इस जीवन की धारा को सुखद या दुखद मोड़ देते हैं,परंतु हमारा वर्तमान कर्म बहुत महत्वपूर्ण है,क्योंकि वर्तमान के हम मालिक हैं।
और यह मिल्कियत अगर हमने धारण कर ली तो हम इस धारा को अगर वह दुखद है तो उसे मोड़ने में सफल हो जाते हैं।
पहले तो उसका सामना करना सीखेंगे,समता स्थापित करेंगे,फिर देखेंगे की मोड़ने के काम में लग गए।दुख सुख में बदलने लगा।
लेकिन अगर यह मान कर बैठ गए की दुख तो आने ही वाला है क्योंकि हमारे पुराने कर्म ही ऐसे हैं तो गलत चिंतन हो जाएगा।
और यदि जीवनधारा सुखमय है तो भी हम सत्कर्मों में लगे रहेंगे तो यह सुखद धारा और अधिक सुखद बनेगी।
तो हर हाल में वर्तमान कुशल कर्म को अधिक से अधिक महत्व देने में ही समझदारी है।
૬૩) 🌹
प्रश्न गुरुजी अगर हमारे सामने लक्ष्य न हो तो हम दिशाहीन नही बन जायेंगे? और फल की अपेक्षा ना करें तो काम में उत्साह,शक्ति कैसे लगाएंगे?
उत्तर लक्ष्य तो होना ही चाहिए पर लक्ष्य सही हो।
और सही लक्ष्य यही है कि प्रकृति ने जो मनुष्य को विशिष्ट शक्ति दी है कि वह अपने भीतर जाकर यथाभूत सच्चाई को देखकर अपने दूषित स्वभावÜ को बदलकर निर्मल कर ले, और इसके द्वारा अपने वर्तमान के और भविष्य के दुखों से छुटकारा पा ले।
अंतर्मुखी होकर सत्य को देख सकने की यह शक्ति पशु में नहीं है। मनुष्य को यह अपनी सोई हुई ऊर्जा जगा कर प्रकृति की इस देन का पूरा लाभ उठाना है।
यही लक्ष्य है।
फल पाने का लक्ष्य होगा परंतु उसके प्रति आसक्ति नही होगी।
आसक्ति होती है तो मन अपना संतुलन खो देता है।फल के लिए जो काम करना चाहिए वह सही ढंग से नहीं हो पाता।
आसक्ति होगी तो मनचाहा फल नही मिलने पर निराशा आएगी,डिप्रेशन आएगा।
फिर प्रयत्न करने की हिम्मत नही जुटा पाएगा।
अनासक्त(detached) होगा तो असफल होने पर दुगने उत्साह से फिर काम में लग जाएगा।
૬૨) 🌹
प्रश्न गुरुजी मुझमें बहुत ही करुणा है,जब भी मैं किसी दुख्यारे को देखता हूं तो मुझे रोना आता है, क्या करूं?
उत्तर करुणा जागनी तो उचित है परंतु यह करुणा कहीं आसक्ति न बन जाए जिसके कारण रोना पड़े।
साधना के नियमित अभ्यास द्वारा आसक्ति के पक्ष को दूर करो और शुद्ध करुणा का अभ्यास करो।
जिससे दुखयारे को देखकर रोने की बजाय उसकी मदद में लग जाओ।
यदि इसके लिए तुम्हारे में सामर्थ्य नहीं है तो मन ही मन उसके लिए मंगल मैत्री जगाओ।
रोना धरम के विरुद्ध है।
૬૧)🌹
प्रश्न गुरुजी अगर किसी को दुनिया की हर मनचाही चीज मिल जाए तो क्या वह पूर्ण सुखी हो जाएगा?
उत्तर न किसी को हर मनचाही प्राप्त होती है और न ही इसे प्राप्त कर कोई पूर्ण सुखी होता है।
मनचाही की तृष्णा बिन पैंदे की बाल्टी है जो कभी भरी नही जा सकती।
एक मनचाही पूरी होते ही दूसरी अपना सिर उठाती है। यों मनचाही की तृष्णा अनंत बन जाती है।
किसी संत ने ठीक ही कहा है कि
जो चाह है वह सारी नीच वृत्तियों में सबसे नीच है। इसे खुश करने के सारे प्रयास विफल होते हैं।
कबीर ने कहा है
चाह गई,चिंता मिटी
मनुआ बेपरवाह।
जिसको कुछ ना चाहिए,
सोई शहंशाह।।
૬૦)🌹
प्रश्न कोई व्यक्ति मधुर भाषा समझता ही नहीं तो चिल्लाना पड़ता है, गुरुजी क्या करें?
उत्तर। जब कोई मृदु भाषा नही समझे तो कठोर भाषा का प्रयोग करना ही चाहिए,पर पहिले यह जांच लें कि हमने मृदु भाषा का प्रयोग करके देखा है और उसमे असफल रहे हैं।
और दूसरे जब कठोर भाषा का प्रयोग करें तो उसमे रंच मात्र भी कटुता न आने पाए।अन्यथा हम अपनी हानि करने लगेंगे।
जब जब आदमी गुस्से में चिल्लाता है तो पहले अपने आप को ही व्याकुल करता है।
जो अपने आप को नहीं सुधार सका वह दूसरों को क्या सुधारेगा।
तो ऐसी परिस्थिति में कुछ क्षणों तक अपने भीतर संवेदनाओं को देखकर समता स्थापित करें और फिर कठोर शब्द कह सकते हैं।
समता होगी तो कटुता रह नही पाएगी।करुणा ही रहेगी।
૫૯) यदि समता कमजोर है तो आनापान का काम करें।
जैसे समुद्र में कोई बड़ा तूफान आता है तो आपको अपना लंगर (anchor) डालकर तूफान के गुजरने की प्रतीक्षा करनी होती है।
🌷 सांस आपका लंगर है।
इस पर काम कीजिये तूफान गुजर जाएगा, और जो नकारात्मकता (negativity) ऊपरी सतह पर आ गयी है उसका उन्मूलन (eradication) हो जाएगा।
🌻गुरूजी जब मन बहुत अधिक अशांत हो जाए तो क्या करें?
उत्तर--जब मन बहुत अशांत हो जाए तो हथेली- पगथली पर ध्यान करें। बीच बीच में आनापान करें, मन शांत हो जाएगा।
🌹जब कोई बहुत गहरा संस्कार साधना करते हुए छिड़ जाता है तो वह एक तूफ़ान के रूप में प्रकट होता है और उसका सामना करना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में आनापान सहायता करेगा।
૫૮)🌷 भव-बंधन टूट गये 🌷
"मरणे मे भयं नत्थि, निकन्ति नत्थि जीविते ।
सन्देहं निक्खिपिस्सामि, सम्पजानो पटिस्सतो ॥"
[ न मुझे मरने का भय है, न जीने की कामना । (जब समय आयगा) मैं इस देह को स्मृति और संप्रज्ञान (जागरूकता और तटस्थता) के साथ त्याग दूंगा। ]
"रूपसोखुम्मतं ञत्वा, वेदनानं च सम्भवं ।
सञ्ञा यतो समुदेति, अत्थं गच्छति यत्थ च ।
सङ्खारे परतो ञत्वा, दुक्खतो नो च अत्ततो॥
स वे सम्मदसो भिक्खू, सन्तो सन्तिपदे रतो।
धारेति अन्तिमं देहं, जेत्वा मारं सवाहिनिं ॥"
[ रूपकलापों की सूक्ष्मता को जानकर, संवेदनाओं की उत्पत्ति को जानकर, संज्ञा की जहां उत्पत्ति होती है और जहां उसका निरोध होता है उसको जानकर, सभी संस्कारों से तादात्म्य दूरकर, उन्हें दुःख-स्वरूप समझकर और उनके प्रति अनात्मभाव रखकर जो शांत सम्यकदर्शी साधक भिक्षु (परम) शांतिपद निर्वाण रत होता है वह सेना-सहित मार को जीत कर अंतिम देहधारी बन जाता है। (उसके लिये अगला जन्म नहीं होता।)
"खन्धा दिट्ठा यथाभूतं, भवा सब्बे पदालिता ।
विक्खीणो जातिसंसारो, नत्थि दानि पुनभवो ॥"
[ शरीर और चित्त स्कंधों की यथाभूत सच्चाइयों का सम्यक दर्शन कर लिया। मेरे सारे भव विदीर्ण हो गये। बार बार का जन्म-संसरण क्षय हो गया। अब मेरे लिये पुनर्भव नहीं है। ]
"नाभिनन्दामि मरणं, नाभिनन्दामि जीवितं ।
कालञ्च पटिकङ्खामि, सम्पजानो पतिस्सतो ॥"
[ न मृत्यु का अभिनंदन करता हूं, न जीने का ही। संप्रज्ञ और सजग रहकर अपने समय की प्रतीक्षा करता हूं। ]
"अप्पमादरतो भिक्खु, पमादे भयदस्सि वा।
सयोजनं अणुं थूलं, डहं अग्गीव गच्छति ॥"
[ जो साधक अप्रमाद में रत रहता है, या प्रमाद से भय खाता है, वह अपने छोटे-बड़े सभी (कर्म-संस्कारों के) बंधनों को आग की भांति जलाते हुए चलता है। ]
"परिचिण्णो मया सत्था, कतं बुद्धस्स सासनं ।
ओहितो गरुको भारो, भवनेत्ति समूहता ॥"
[ मैंने अपने शास्ता को, धर्मगुरु को, पहचान लिया है। मैंने बुद्ध का शासन पूरा कर लिया है, उनकी शिक्षा का पूरा पालन कर लिया है। मैंने अपना भारी बोझ उतार लिया है। भवनेत्री (भवतृष्णा) को दूर कर दिया है। ]
"भग्गरागो भग्गदोसो, भग्गमोहो अनासवो ।
भग्गास्स पापका धम्मा, भगवा तेन वुच्चती ॥"
[ राग, द्वेष और मोह को भग्न कर दिया है जिन्होंने, जो आश्रवरहित हैं, जिनके सभी पाप-स्वभाव भग्न हो गये हैं, इस कारण वे भगवान कहलाते हैं।"
"अथ निब्बिन्दहं रूपे, निब्बिन्दञ्च विरज्जहं।
मा पुन जातिसंसारं, सन्धावेय्यं पुनप्पुनं ॥"
[ इस शारीरिक रूप-सौंदर्य के प्रति मेरे मन में निर्वेद जागा । मैं इसके प्रति मोहमुक्त और विरक्त हो गयी। (इस अवस्था में विपश्यना करती हुई और मैं उस अवस्था पर पहुंची जहां नितांत विमुक्त हो गयी।) अब मृत्यु जन्म के चक्कर में बार-बार भटकना न होगा। संसार में फिर मेरा जन्म नहीं होगा। ]
🌸🙏🌸🙏🌸
पुस्तक: धम्मवाणी संग्रह ।
विपश्यना विशोधन विन्यास ॥
भवतु सब्ब मंङ्गलं !!
🙏🙏🙏
૫૭) 🌹
प्रश्न: गुरुजी जीवन में अच्छे और सच्चे इंसान को दूसरे के द्वारा बहुत कष्ट और तकलीफ होती है।
ऐसा क्यों होता है और इसका निराकरण कैसे करें?
उत्तर: कष्ट तो अपने पूर्व कर्मो के फलस्वरूप होते हैं। इसके लिए यदि कोई व्यक्ति निमित्त बन गया तो उसपर करुणा जागनी चाहिए।
कष्ट आए और हम किसी व्यक्ति को उसका कारण मान कर उसके प्रति दुर्भावना जगाएं तो अपनी समता नष्ट करके अपनी ही हानि करते हैं।ऐसी हर अवस्था में समता को पुष्ट करना चाहिए।
यह दुख हमारे लिए धर्म में पकने का साधन बन जाय।
૫૬) 🌹
प्रश्न:गुरुजी मेरी जिंदगी में कई तूफान आए हैं।मेरा एकमात्र बेटा मेरी परवाह नही करता।भटक गया है।मेरे पति को मार डाला गया है।
मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?
उत्तर: जिस किसी कारण से यह अप्रिय स्थिति पैदा हुई है,समझदारी के साथ उसका सामना करना चाहिए।
समझदारी यही है की मन को विचलित नहीं होने दें।
मन विचलित होगा तो व्याकुलता के बीज बोयेगा।
व्याकुलता के बीज कई गुना व्याकुलता का ही फल लेकर आएंगे।यही प्रकृति का नियम है।
मन को विचलित नहीं होने देने वाली समता की विद्या का अभ्यास करके संकट के दिनों का सामना करना आ जाएगा तो तुम व्याकुलता से भी बचोगी और भविष्य के लिए भी व्याकुलता दूर होगी।आज की स्थिति में भी सुधार आ सकेगा।
૫૫)🌹
प्रश्न: गुरुजी आधुनिक युग को कलयुग क्यों कहते है?
उत्तर:आधुनिक युग को कलयुग कहना और पूर्वकालीन युग को सतयुग कहना गलत है।
मनुष्य के मन में जब कभी कालिमा जागती है तब वह उसके लिए कलयुग ही है।
जब मन में धवलीमा जागती है तो सतयुग ही है।
ऐसा कभी नहीं होता कि किसी युग में हर मनुष्य चित्त की धवलिमा ही लिए होता है।या किसी अन्य युग में हर मनुष्य चित्त की कालिमा ही लिए होता है।
सभी युगों में कमोबेश दोनो स्थितियां देखने को मिलती है।
समय कोई सा भी हो प्रयत्न इसी बात का हो की अधिक से अधिक लोगो में चित्त की कालिमा को दूर करते हुए उसे निर्मल बनाए जाने का प्रशिक्षण दिया जाए।
जिसे कलयुग कहते हैं उसे सतयुग में बदलने का पुरुषार्थ सतत किया जाय।
૫૪) #सुप्रबुद्ध_कोढ़ी_की_कथा
#धम्मपद_गाथा_66
स्थान : #वेणुवन , #राजगृह
राजगृह में #सुप्रबुद्ध नामक एक #कोढ़ी (Leper) रहता था। उदान ग्रंथ में उसकी कथा का विस्तृत ढंग से जिक्र आता है। एक दिन सुप्रबुद्ध धर्म सभा में एक किनारे बैठा हुआ धर्म प्रवचन सुन #स्रोतापन्न को प्राप्त हो गया। उसका मन पुलकित हो उठा और वह शास्ता को अपनी सफलता के विषय में बताने के लिए चल पड़ा।
#देवराज_इन्द्र ने इसे देखा तो सोचा कि सुप्रबुद्ध की परीक्षा लेनी चाहिए। अतः वह सुप्रबुद्ध के सम्मुख प्रकट हुआ तथा उससे कहा, "सुप्रबुद्ध! तुम बहुत ही गरीब हो। अतः दया के पात्र हो। तुम सिर्फ इतना कह दो कि तुम्हें तथागत के #त्रिरत्न- बुद्ध, धर्म एवं संघ में कोई श्रद्धा नहीं है। मैं तुम्हें धन से मालामाल कर दूंगा।"
सुप्रबुद्ध इस बात से खुश नहीं हुआ, वरन् नाराज होते हुए कहा, अरे मूर्ख! निर्लज्ज! तुमने सोचा कैसे कि मैं दरिद्र, कृपा एवं दया का पात्र हूँ? मेरे पास जब त्रिरत्न का धन उपलब्ध है, तब मैं कृपण कैसे हुआ? मैं तो बहुत ही सुखपूर्वक जीवन जी रहा हूँ। मेरे पास प्रचुर मात्रा में धन है क्योंकि जिसके पास श्रद्धा, शील, हृई, पापभीरुता, श्रुत, त्याग एवं प्रज्ञा का धन है वह दरिद्र कैसे हुआ ?
उसका जीवन तो पूर्णत: सफल जीवन है। मेरे पास ये सातों आर्योचित धन हैं। जिनके पास ये सात धन उपलब्ध हों उन्हें बुद्ध या प्रत्येक बुद्ध भी दरिद्र नहीं कह सकते।
यह उत्तर सुन देवराज वहाँ से चला गया तथा शास्ता के पास जाकर बताया कि किस प्रकार उसने सुप्रबुद्ध की परीक्षा ली थी और किस प्रकार सुप्रबुद्ध परीक्षा में खरा उतरा। तब #तथागत ने इन्द्र को समझाया कि सुप्रबुद्ध जैसे उपासक की त्रिरत्न में श्रद्धा को डिगाना असंभव है।
बाद में सुप्रबुद्ध भी शास्ता के पास पहुंचा और उसने अपनी सफलता की चर्चा की। वहाँ से जब वह लौट रहा था तो रास्ते में एक #तरुण_गौ ने उसे टक्कर मार दी और उसकी मृत्यु हो गई ।
भिक्षुओं ने शास्ता से सुप्रबुद्ध के मृत्यु का कारण पूछा । बुद्ध ने बताया कि वह गौ वस्तुतः एक #यक्षिणी थी जो अनेक जन्मों से चार पुरुषों को, जिनमें सुप्रबुद्ध भी एक था, टक्कर मारकर मृत्यु के घाट पहुँचा दिया करती थी।
वास्तव में एक पूर्व जन्म में वह यक्षिणी एक #वैश्या थी और एक बार ये चार युवक उसके साथ मौज-मस्ती करने जंगल गए। दिन भर उसके साथ मौज-मस्ती किया और फिर संध्या होने पर सोचा कि क्यों न इस वैश्या के सारे #आभूषण छीन लिए जायें तथा उसकी हत्या कर दी जाय। वैश्या को जब वे मार रहे थे तब उसने भी प्रण लिया कि मैं भी अनेक जन्मों तक यक्षिणी का रूप लेकर इनके मृत्यु का कारण बनकर इनसे बदला लेती रहूँगी।
उसके अगले जन्म के विषय में पूछे जाने पर बुद्ध ने बताया कि उसका अगला जन्म #तावतिंस_देव लोक में हुआ है।
वह किस कर्म के कारण कोढ़ी हुआ, इसका स्पष्टीकरण करते हुए बुद्ध ने बताया कि एक पूर्व जन्म में #तगरशिखी प्रत्येक बुद्ध को देखकर उन पर थूकते हुए उसने कहा था, "यह कौन कोढ़ी जा रहा है?" अपने इसी कर्म के कारण वह नरक में पैदा हुआ और इस जन्म में कोढ़ी हुआ।
“चरन्ति बाला दुम्मेधा,
अमित्तेनेव अत्तना।
करोन्ता पापकं कम्मं,
यं होति कटुकप्फल”न्ति॥
अर्थ: दुष्ट बुद्धि वाले व्यक्ति स्वयं ही अपने शत्रु हैं। वे अपने ही शत्रु बनकर घूमते रहते हैं और पापमय कर्म करते रहते हैं। उन पापमय कर्मों का कडुआ फल मिलना सुनिश्चित है।
🙏🙏🌹🙏🙏
૫૩) 🌷सही बुद्ध वंदना
साधको !
कोई व्यक्ति किसी बुद्ध मंदिर में जाकर बुद्ध की मूर्ति को पंचांग या साष्टांग प्रणाम करे या न करे, उसके सामने धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प आदि चढ़ाए या न चढाए परंतु यदि वह:-
• प्राणि-हत्या करने से विरत रहता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• चोरी करने से विरत रहता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• व्यभिचार से विरत रहता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• झूठ बोलने से, कड़वी, कटु, निंदा, चुगली की बात बोलने से विरत रहता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• नशे-पते के सेवन से विरत रहता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• शस्त्र, मदिरा, विष, मांस और जीवों के क्रय-विक्रय की आजीविका से विरत रहता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• हिंसा और काम-क्रोध के चिंतन-मनन से विरत रहता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• जाति-जन्म के आधार पर मानव मानव में ऊंच-नीच का भेदभाव करने से विरत रहता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• अपने सहज स्वाभाविक आश्वास-प्रश्वास के प्रति सजग रहकर एकाग्रता का अभ्यास करता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• अपने चित्त पर उठे विकार और तज्जनित शारीरिक संवेदनाओं के प्रति सजग रहने का अभ्यास करता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• शारीरिक संवेदनाओं के अनुभव के आधार पर शरीर और चित्त के अनित्य स्वभाव का दर्शन करता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• सुखद से सुखद संवेदना भी अनित्य होने के कारण दुःख में ही परिणत होने वाली है; अतः वस्तुतः दुःख ही है। इस सत्य का स्वयं दर्शन करता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• सारे शरीर स्कन्ध में जब सुखद, सूक्ष्म संवेदनाओं का प्रवाह ‘चलने लगता है तो उनका आस्वादन भयावह है, खतरनाक है, भवचक्र बढ़ाने वाला है- यूं समझकर उनके प्रति निर्वेद उत्पन्न करता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• शरीर और चित्त प्रपंच कार्य-कारणों के नियमों के अनुसार अनुप्रवर्तित हो रहा है। इसमें मैं, मेरा, मेरी आत्मा का आभास मात्र होता है, जो प्रवंचक है-इस सत्य का दर्शन करता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• जैसे भीतर वैसे बाहर यह आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा और मन तथा रूप, गंध, शब्द, रस, स्पर्श और चिंतन का सारा प्रपंच अनित्य ही है, दुःख ही है, अनात्म ही है इस सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा दर्शन करता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• शरीर और चित्त अथवा इंद्रियां और उनके विषय अनित्य, दुःख, अनात्म हैं; ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव करके तज्जन्य किसी भी सुखद अनुभूति के प्रति राग नहीं जगाता, किसी भी दुखद अनुभूति के प्रति द्वेष नहीं जगाता, किसी असुखद-अदुखद अनुभूति के प्रति मोह नहीं जगाता तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• जो आंतरिक संवेदनाओं के प्रति अनित्य बोध जगाकर राग-द्वेष और मोह के नये संस्कार नहीं बनाता और अविचल उपेक्षा समता में स्थित रहकर पुराने कर्मसंस्कारों का उन्मूलन करता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• जो व्यक्ति उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते, नहाते-पीते, सोते-जागते हर अवस्था में सति याने सजगता और संप्रज्ञान में स्थित रहता है तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• जो निरंतर स्मृति और संप्रज्ञान में स्थित रहने का अभ्यास करते करते श्रोतापन्न के मार्ग-फल का साक्षात्कार करके सगदागामी अनागामी और अर्हन्त अवस्था के मार्ग-फल का स्वयं साक्षात्कार कर लेता है, तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
• जो सदा मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा का जीवन जीता है। और लोक सेवा में निरत रहता है, तो बुद्ध की वंदना ही करता है।
साथकों ! ऐसा व्यक्ति अपने आपको बौद्ध कहे अथवा न कहे, वह मुक्ति-मार्ग का पथिक अपना मनुष्य जीवन सार्थक कर ही लेता है। अपने तथा अनेकों के कल्याण का कारण बन ही जाता है।
आओ! हम भी इसी प्रकार सही बुद्ध वंदना करें और अपना कल्याण साध लें ! औरों के कल्याण में सहायक बनें!
कल्याणमित्र
सत्य नारायण गोयन्का
🌷🌹🌷
૫૨) 📮📮📮📮📮📮📮📮📮📮📮📮📮📮📮📮📮
🌷 धर्मचक्र 🌷
हमारे भीतर प्रतिक्षण जो लोकचक्र चल रहा है, इससे छुटकारा पाने के लिए धर्मचक्र प्रवर्तित करना होगा । लोकचक्र हमारे समस्त दुखों का मूल है। धर्मचक्र सभी दुखों का निरोधक है।
लोकचक्र क्या है?
लोकचक्र मोह, मूढ़ता है। लोकचक्र अज्ञान, अविवेक, अविद्या है जिसके कारण हम निरंतर राग और द्वेष की चक्की में पिसते रहते हैं। हमारी छह इंद्रियां - आंख, नाक, कान, जिह्वा, शरीर की त्वचा और मन तथा इन इंद्रियों के छह विषय - रूप, गंध, शब्द, रस, स्पर्शव्य और कल्पनाएं; इनका परस्पर संस्पर्श होता रहता है। नाक का गंध से, कान का शब्द से, जिह्वा का रस से, काया का किसी भी स्पर्शव्य पदार्थ से, मन का कल्पना से ।
संस्पर्श होते ही तत्क्षण हमारे चित्त में कोई संवेदना जागती है। यदि वह संवेदना हमें प्रिय लगी तो हम तत्संबंधी विषय में चिपकाव यानी राग पैदा कर लेते हैं। यदि अप्रिय लगी तो दुराव यानी द्वेष पैदा कर लेते हैं। चाहे राग उत्पन्न हो अथवा द्वेष, दोनों ही हमारे मन में तनाव-खिंचाव और उत्तेजना पैदा करते हैं। इससे समता नष्ट होती है। विषमता आरंभ होती है। दुख संधि होती है। दुख आरंभ होता है। यही लोकचक्र का आरंभ हो जाना है।
नासमझी से हम जो उत्तेजना पैदा कर लेते हैं, वह गहरी आसक्तियों में परिवर्तित होकर दूषित भवचक्र के रूप में बढ़ती है और हमें व्याकुल, व्यथित बनाती और हमारा दुख संसार बढ़ाती है। इसी भवचक्र को काटने के लिए हमारे भीतर धर्मचक्र जागते रहना बहुत आवश्यक है।
यदि धर्मचक्र जागता है तो विवेक, विद्या और होश जागता है। जैसे ही किसी इंद्रिय और उसके विषय के संस्पर्श से चित्त में कोई संवेदना पैदा हो, प्रिय या अप्रिय, सुखद या दुखद - वैसे ही पागलों की तरह उस विषय के प्रति राग-रंजित और द्वेष-दूषित होने के बजाय उसके नश्वर-निस्सार स्वभाव को समझकर प्रज्ञा जागे, अनासक्तिभाव जागे। इसी से लोकचक्र का प्रवर्तन रुकता है। उसका विस्तार नहीं हो पाता। यही धर्मचक्र प्रवर्तन है।
धर्मचक्र प्रवर्तन का यह प्रत्यक्ष लाभ है। विपश्यना साधना के सतत अभ्यास द्वारा अपने अंतर्मन में अनुभूत होने वाली प्रत्येक संवेदना को जानें और जानकर उसमें उलझें नहीं। तटस्थ बने रहें। यों धर्मचक्र प्रवर्तित रखें। धर्मचक्र प्रवर्तित रखने में हमारा मंगल-कल्याण है।
💐 बंधन खुलते जायें 💐
राग सदृश ना रोग है, द्वेष सदृश ना दोष।
मोह सदृश ना मूढ़ता, धर्म सदृश ना होश ॥
राग द्वेष की मोह की, जब तक मन में खान।
तब तक सुख का, शांति का, जरा न नाम निशान ॥
तीन बात बंधन बँधे, राग द्वेष अभिमान।
तीन बात बंधन खुले, शील समाधि ज्ञान ॥
धर्मचक्र चालित करें, प्रज्ञा लेय जगाय।
जिससे सारी गंदगी, मन पर की हट जाय ॥
सुख दुख आते ही रहें, ज्यों आवें दिन रैन।
तू क्यूं खोवे बावला! अपने मन की चैन ।
भोक्ता बन कर भोगते, बंधन बँधते जायें।
द्रष्टा बन कर देखते, बंधन खुलते जायें ॥
✍ सत्य नारायण गोयनका
पुस्तक: "धर्म" आदर्श जीवन का आधार।
विपश्यना विशोधन विन्यास ।।
भवतु सब्ब मगंलं !!
🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟🌟
🙏 कोरोना संक्रमण में गुरुजी का यह लेख विपश्यी साधकों को अदम्य साहस, उत्साह एवं धर्मबल प्रदान करता है, जिसमें रोगी फेफड़ों को रोगमुक्त करने के लिये एक धर्मोचित उपाय भी बताया है 🙏
✍ ....उसे चाहिए कि अपने रोगी फेफड़े पर कुछ देर ध्यान करके और वहां का चैतन्य जाग्रत करके, उस संवेदना के प्रवाह को बार-बार कभी दाहिने हाथ में से निकालती रहे और कभी दाहिने पांव में से निकालती रहे.....
तुम्हारा 29 जुलाई का पत्र मिला। बेटी कमला को जिन शारीरिक अवस्थाओं में से गुजरना पड़ रहा है, उसकी जानकारी मिली। उसकी यथावश्यक चिकित्सा कराते रहो। उसे चाहिए कि सारे संकटों को साहसपूर्वक धर्म-बुद्धि के साथ झेले। संकट का समय ही धर्म की परीक्षा का समय है।
चिकित्सकों ने उसे विश्राम करने के लिए कहा है तो उनके आदेश के अनुसार विश्राम करना ही चाहिए। विश्राम के समय मन में किसी प्रकार की निराशा या आशंका नहीं आने देना चाहिए। जिसके भीतर विपश्यना जागने लगी, उसे भय किस बात का?
"धम्मो हवे रक्खंति धम्मचारी" जहां धर्मचारी हुए वहीं धर्म अपने आप हमारी रक्षा करने लगता है।
किन्हीं कारणोंवश हमारे सामने कष्ट की घड़ियां आती हैं, तो उसके साथ-साथ उसे सहन कर सकने का धर्म-बल भी आता है। जैसे ही हम अपने शारीरिक अथवा मानसिक कष्टों को धर्मप्रज्ञा के साथ देखने लगते हैं, वैसे ही उन कष्टों का बढ़ावा रुक जाता है और अपने आप धीरे-धीरे घटाव होना शुरू हो जाता है।
कमला को चाहिए कि बिस्तर पर लेटे, विश्राम करते हुए विपश्यना जगाये रखे और इस बात को समझती रहे कि भगवान का तो मार्ग ही दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा है। सब प्रकार के दुःखों को क्षीण करने वाला धर्म है। और जब यह शील, समाधि तथा प्रज्ञा वाला धर्म हमारे भीतर जागने लगा तो दु:खों के निरोध का आरंभ हो ही गया।
धर्म के इस आशाभरे आलंबन के साथ विपश्यना करती रहे, पीड़ा कम होती जायगी। रोग का शमन होते जायगा, मन शांत, स्थिर और स्वच्छ होता जायगा। उसे चाहिए कि अपने रोगी फेफड़े पर कुछ देर ध्यान करके और वहां का चैतन्य जाग्रत करके, उस संवेदना के प्रवाह को बार-बार कभी दाहिने हाथ में से निकालती रहे और कभी दाहिने पांव में से निकालती रहे।
जब कभी अवकाश मिले तो काश्यप को भी चाहिए कि उसके पास बैठकर स्वयं विपश्यना साधना करते हुये उसकी प्रज्ञा जगाने में सहायता करता रहे। और कभी-कभी भुवंग केन्द्र पर मन लगाकर वहीं से मैत्री तरंगें प्रसारित करता रहे, निश्चितरूप से लाभ होगा।
यह जानकर प्रसन्नता हुई कि संकट के समय तुमने अपनी विपश्यना के बल पर धर्म धैर्य बनाये रखा। पिछले 10 दिनों की बैठक में तुम्हारी प्रज्ञा और अधिक पुष्ट और सजग बनी, यह तुम्हारा बड़ा बल है, बड़ा लाभ है। सेक्स को लेकर तुम्हारे अंतर्मन में व्याप्त रहने वाली बैचेनियां दूर हुई हैं और तुम अब सुख से सोने लगे हो, यह प्रज्ञा धर्म का प्रत्यक्ष लाभ है।
तुम्हारी सफलता अन्य साधकों के लिए प्रेरणा का कारण बनेगी। तुम और कमला धर्म के इस पावन मार्ग पर उत्तरोत्तर प्रगति करते रहो, यही मंगल कामना है।
यहां का शिविर संतोषजनक ढंग से चल रहा है। 56 लोगों ने भाग लिया है, जिनमें 6 भिक्षु है, शेष एक-दो को छोड़कर सभी विभिन्न देशों के विदेशी हैं। 8 को यह शिविर पूरा करके मैं वाराणसी होता हुआ बम्बई के लिए रवाना हो जाऊंगा, जहां कि 12 को अगला शिविर आरंभ हो रहा है। सभी साथी साधकों के प्रति मंगल मैत्री है।
दि. 24-11-1971
तुम्हारा 21 नवम्बर का धर्म भावना से परिपूर्ण पत्र मिला। पढ़कर मन संतुष्ट प्रसन्न हुआ। बीमारी की हालत में भी तुम्हारी धर्मबुद्धि जागृत रही और तुमने धैर्य और हिम्मत के साथ उस कष्ट को सहा, विपश्यना का अभ्यास करती रही, यह तुम्हारी धर्म-निष्ठा का ही परिणाम है। धर्म का प्रभाव बड़ा बलशाली होता है। जैसे-जैसे हम धर्म धारण करते जाते हैं, वैसे-वैसे धर्म आप ही हमें अपना बल देता है, और इस प्रकार रक्षा करता रहता है।
हमारा तो केवल इतना ही काम है कि हम धर्मचारी बनें। धर्म हमारे आचरण में आ जाय, हमारे जीवन का अंग बन जाय, हमारे स्वभाव का अंग बन जाय। ऐसा होने पर उसका सुखदायी फल अपने आप आयेगा ही। तुमने संकट के समय अपना धर्मबल मंद नहीं पड़ने दिया और इसके परिणाम स्वरूप तुम्हें अपने रोग में लाभ हुआ, यह प्रसन्नता का विषय है।
अब एक आसन पर बैठकर घंटे भर विपश्यना कर पाती हो, यह तुम्हारे मंगल का लक्षण है। दुःखद वेदनाओं को भी शांति से अनुभव करना, यही तो विपश्यना है। तुम दोनों धर्म निष्ठ होकर एक-दूसरे को उत्साहित करते रहो। सचमुच तुम्हारा बड़ा सौभाग्य है जो तुम्हें काश्यप जैसा धर्म प्रेमी जीवन साथी मिला और यह काश्यप का भी सौभाग्य है कि उसे तुम जैसी धर्मविहारिणी जीवन संगिनी मिली।
इस मंगलमय धर्म पथ पर तुम दोनों कदम मिलाकर एक दूसरे की सहायता करते हुये दिन-पर-दिन प्रगति करती जाओ और अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सको, यही मंगल कामना है।
Note : इस प्रकार पूज्य गुरुजी और पूज्य माताजी ने न केवल स्वास्थ्यलाभ में मदद की बल्कि धर्मपथ पर आगे बढ़ने का सन्मार्ग दिखाया। धर्मसेवा की अनेकों जिम्मदारियां देकर धर्म में खूब पुष्ट किया। बहुत उपकार है उन दोनों का। हम अत्यंत कृतज्ञ और धन्य हैं।
पुस्तक: पूज्य गुरुजी एवं माताजी के बारे में साधको के संस्मरण, विपश्यना विशोधन विन्यास ।।
कई वर्षों से गुरुदेव मुझे विपश्यना शिक्षण की ट्रेनिंग दे रहे थे। यद्यपि मुझे इसका रंचमात्र भी भान नहीं था। मैं तो वर्षों तक यही समझता रहा कि मैं महज एक भाषा अनुवादक की तरह उनकी सेवा कर रहा हूं, जिससे कि उनके द्वारा बरमी में दिए गए आदेश भारतीय शिष्य हिंदी में समझ सकें।
बहुत वर्षों बाद पता चला कि वे मुझे भावी जिम्मेदारियों के लिए तैयार कर रहे हैं। वह मुझे अपने साथ उत्तरी बर्मा के मांडले और मेम्यो शहरों में शिविर लगाने के लिए ले गए। वहां कोई तपे हुए विपश्यना केंद्र तो थे नहीं, जहां धर्म की पावन तरंगे मिल सकें। मुझे भारत जाकर स्कूल, धर्मशाला, होटल आदि- आदि कामचलाऊ स्थानों पर ही शिविर लगाने पड़ेंगे, जहां विपश्यना केंद्रों की धर्म-तरंगे जरा भी नहीं मिलेंगी। मानो इसी की पूर्व ट्रेनिंग देने के लिए साथ ले गए थे। साधना केंद्र के बाहर विपश्यना शिविर कैसे लगाया जाय, शायद इसका पूर्वाभास कराना चाहते थे।
उत्तरी बर्मा का पहला शिविर मांडले में लगा। इसमें सभी साधक-साधिकाएं हिंदी भाषी भारतीय थे। यकायक गुरुजी ने मुझे आदेश दिया कि सायंकालीन धर्मप्रवचन मैं दूं और हिंदी में दूं। अब लगता है कि वह भी भावी जिम्मेदारियों की तैयारियां करवाने के लिए था। वैसे सार्वजनिक प्रवचन देने का यथेष्ट अनुभव था। परंतु विपश्यना धर्म पर प्रवचन देना और वह भी पूज्य गुरुदेव की उपस्थिति में, यह बड़ा अटपटा लगा और झिझक भी हुई। परंतु गुरुदेव का आदेश था । अतः पूरा किया और झिझक मिटी।
उत्तरी बर्मा की इस धर्मचारिका के कुछ दिनों बाद ही रंगून के विपश्यना केंद्र में एक शिविर लगा, जिसमें केवल ३ साधक शामिल हुए और तीनों ही हिंदी भाषी भारतीय। जब आनापान देने का समय आया तो सदा की भांति मैं गुरुदेव के साथ चैत्य के केंद्रीय कक्ष में गया। वहां गुरुदेव ने प्रारंभिक बुद्ध वंदना पूरी की और फिर यकायक मुझे कहा कि अब इन्हें त्रि-रत्न शरण, पंचशील और आनापान तुम दो! इस सर्वथा अप्रत्याशित आदेश से मैं चौंका। उन्होंने मुझे जरा घबराया हुआ देखा तो आश्वासन भरे शब्दों में हिम्मत बँधायी कि तुम मत घबराओ। मैं तो यहीं तुम्हारे पास हूं। मैंने अपनी झिझक दूर की और उनकी उपस्थिति में पहली बार प्रारंभिक धर्म-शिक्षण का गंभीर उत्तरदायित्व निभाया। गुरुदेव बहुत संतुष्ट प्रसन्न हुए।
चौथे दिन विपश्यना थी। यह तो अनुमान था कि विपश्यना भी शायद गुरुजी मुझसे ही दिलवाएंगे। पर घबराहट तब हुई जब गुरुजी विपश्यना देने का आदेश देकर स्वयं अपने निवास कक्ष में विश्राम करने चले गए। उनकी अनुपस्थिति में मैं अकेला विपश्यना कैसे दूंगा? परंतु शायद वे यही सिखाना चाहते थे। उन्होंने जाते-जाते हिम्मत बँधायी कि वे उपस्थित नहीं रहेंगे तो क्या हुआ? उनकी मैत्री और धर्म की तरंगें तो रहेंगी ही; जो मुझे सुरक्षा और सफलता देंगी।
उनके आश्वासन भरे शब्दों से बल प्राप्त करके मैंने पहली बार तीन शिविरार्थियों को स्वयं अकेले विपश्यना दी। सिर से पांव तक विपश्यना की यात्रा अभी आधी भी नहीं हो पाई थी कि उन तीनो में से एक साधक बड़ी तीव्र गति से धूजने लगा। क्षण प्रतिक्षण उसका कांपना और धूजना तेज हुआ जा रहा था। मानो उस पर कोई प्रेत-प्राणी सवार हो गया हो। कुछ क्षणों के लिए मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। अब क्या करूं? जी में आया कि आवाज देकर गुरुजी को बुलाऊं। पर ऐसा करने से विपश्यना का सारा वातावरण ही नष्ट हो जाता। मैं किंकर्तव्य-विमूढ़ हो उठा।
तत्काल मेरे मन में गुरुदेव का मुसकराता हुआ चेहरा जागा। फिर कानों में उनके आश्वासन भरे शब्द गूंजे और चारों ओर उनकी मैत्री की धर्म-तरंगें महसूस होने लगीं। बड़ा बल मिला। मैं समझ गया कि उन्हें आवाज देकर बुलाने की आवश्यकता नहीं है। वे तो इन धर्म-तरंगों के रूप में मेरे साथ हैं ही। बस इसी से मन शांत हुआ और संतुलित प्रशांत चित्त से उस साधक को मैत्री दी तो कुछ मिनिटों में ही वह शांत हो गया। उसका धूजना बंद हो गया। मेरे द्वारा दी गई पहली विपश्यना सफल हुई। गुरुदेव अत्यंत प्रसन्न हुए।
तब से आज तक जब किसी शिविर में धर्म सिखाता हूं तो मुझे मैत्रीपूर्ण तरंगों के रूप में उनकी उपस्थिति महसूस होती है और मैं यह एहसास करता हूं कि मैं तो उनका प्रतिनिधि मात्र हूं। जगह-जगह-दुखियारों को धर्म बांट कर उनके शुभ संकल्पों को पूरा करते हुए महज उनकी सेवा कर रहा हूं। काम तो उन्हीं का है। बल तो उन्हीं का है!
49)
🌷 कष्ट के साथ धर्मबल भी आता है 🌷
🍂पत्र - 1🍂
पड़ाव बोधगया -- 03-08-1971
प्रिय काश्यप और कमला धर्मदर्शी, सप्रेम आशीः।
तुम्हारा 29 जुलाई का पत्र मिला। बेटी कमला को जिन शारीरिक अवस्थाओं में से गुजरना पड़ रहा है, उसकी जानकारी मिली। उसकी यथावश्यक चिकित्सा कराते रहो। उसे चाहिए कि सारे संकटों को साहसपूर्वक धर्म-बुद्धि के साथ झेले। संकट का समय ही धर्म की परीक्षा का समय है।
चिकित्सकों ने उसे विश्राम करने के लिए कहा है तो उनके आदेश के अनुसार विश्राम करना ही चाहिए। विश्राम के समय मन में किसी प्रकार की निराशा या आशंका नहीं आने देना चाहिए। जिसके भीतर विपश्यना जागने लगी, उसे भय किस बात का?
"धम्मो हवे रक्खति धम्मचारी"
जहां धर्मचारी हुए वहीं धर्म अपने आप हमारी रक्षा करने लगता है।
किन्हीं कारणोंवश हमारे सामने कष्ट की घड़ियां आती हैं, तो उसके साथ-साथ उसे सहन कर सकने का धर्म-बल भी आता है। जैसे ही हम अपने शारीरिक अथवा मानसिक कष्टों को धर्मप्रज्ञा के साथ देखने लगते हैं, वैसे ही उन कष्टों का बढ़ावा रुक जाता है और अपने आप धीरे-धीरे घटाव होना शुरू हो जाता है।
कमला को चाहिए कि बिस्तर पर लेटे, विश्राम करते हुए विपश्यना जगाये रखे और इस बात को समझती रहे कि भगवान का तो मार्ग ही दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा है। सब प्रकार के दुःखों को क्षीण करने वाला धर्म है। और जब यह शील, समाधि तथा प्रज्ञा वाला धर्म हमारे भीतर जागने लगा तो दुखों के निरोध का आरंभ हो ही गया।
धर्म के इस आशाभरे आलंबन के साथ विपश्यना करती रहे, पीड़ा कम होती जायगी। रोग का शमन होते जायगा, मन शांत, स्थिर और स्वच्छ होता जायगा। उसे चाहिए कि अपने रोगी फेकड़े पर कुछ देर ध्यान करके और वहां का चैतन्य जाग्रत करके, उस संवेदना के प्रवाह को बार-बार कभी दाहिने हाथ में से निकालती रहे और कभी दाहिने पांव में से निकालती रहे।
जब कभी अवकाश मिले तो काश्यप को भी चाहिए कि उसके पास बैठकर स्वयं विपश्यना साधना करते हुये उसकी प्रज्ञा जगाने में सहायता करता रहे। और कभी-कभी भुवंग केन्द्र पर मन लगाकर वहीं से मैत्री तरंगें प्रसारित करता रहे, निश्चितरूप से लाभ होगा।
🍂पत्र - 2🍂
यह जानकर प्रसन्नता हुई कि संकट के समय तुमने अपनी विपश्यना के बल पर धर्म धैर्य बनाये रखा। पिछले 10 दिनों की बैठक में तुम्हारी प्रज्ञा और अधिक पुष्ट और सजग बनी, यह तुम्हारा बड़ा बल है, बड़ा लाभ है। सेक्स को लेकर तुम्हारे अंतर्मन में व्याप्त रहने वाली बैचेनियां दूर हुई हैं और तुम अब सुख से सोने लगे हो, यह प्रज्ञा धर्म का प्रत्यक्ष लाभ है।
तुम्हारी सफलता अन्य साधकों के लिए प्रेरणा का कारण बनेगी। तुम और कमला धर्म के इस पावन मार्ग पर उत्तरोत्तर प्रगति करते रहो, यही मंगल कामना है। यहां का शिविर संतोषजनक ढंग से चल रहा है। 56 लोगों ने भाग लिया है, जिनमें 6 भिक्षु है, शेष एक-दो को छोड़कर सभी विभिन्न देशों के विदेशी हैं। 8 को यह शिविर पूरा करके मैं वाराणसी होता हुआ बम्बई के लिए रवाना हो जाऊंगा, जहां कि 12 को अगला शिविर आरंभ हो रहा है। सभी साथी साधकों के प्रति मंगल मैत्री है।
🍂पत्र - 3🍂
दि. 24-11-1971
🌼 हम धर्मचारी बनें 🌼
बेटी कमला, सप्रेम आशीः।।
तुम्हारा 21 नवम्बर का धर्म भावना से परिपूर्ण पत्र मिला। पढ़कर मन संतुष्ट प्रसन्न हुआ। बीमारी की हालत में भी तुम्हारी धर्मबुद्धि जागृत रही और तुमने धैर्य और हिम्मत के साथ उस कष्ट को सहा, विपश्यना का अभ्यास करती रही, यह तुम्हारी धर्म-निष्ठा का ही परिणाम है। धर्म का प्रभाव बड़ा बलशाली होता है। जैसे-जैसे हम धर्म धारण करते जाते हैं, वैसे-वैसे धर्म आप ही हमें अपना बल देता है, और इस प्रकार रक्षा करता रहता है।
हमारा तो केवल इतना ही काम है कि हम धर्मचारी बनें। धर्म हमारे आचरण में आ जाय, हमारे जीवन का अंग बन जाय, हमारे स्वभाव का अंग बन जाय। ऐसा होने पर उसका सुखदायी फल अपने आप आयेगा ही। तुमने संकट के समय अपना धर्मबल मंद नहीं पड़ने दिया और इसके परिणाम स्वरूप तुम्हें अपने रोग में लाभ हुआ, यह प्रसन्नता का विषय है।
अब एक आसन पर बैठकर घंटे भर विपश्यना कर पाती हो, यह तुम्हारे मंगल का लक्षण है। दुःखद वेदनाओं को भी शांति से अनुभव करना, यही तो विपश्यना है। तुम दोनों धर्म निष्ठ होकर एक-दूसरे को उत्साहित करते रहो। सचमुच तुम्हारा बड़ा सौभाग्य है जो तुम्हें काश्यप जैसा धर्म प्रेमी जीवन साथी मिला और यह काश्यप का भी सौभाग्य है कि उसे तुम जैसी धर्मविहारिणी जीवन संगिनी मिली। इस मंगलमय धर्म पथ पर तुम दोनों कदम मिलाकर एक दूसरे की सहायता करते हुये दिन-पर-दिन प्रगति करती जाओ और अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सको, यही मंगल कामना है।
साशिष,
(सत्य नारायण गोयन्का)
Note : इस प्रकार पूज्य गुरुजी और पूज्य माताजी ने न केवल स्वास्थ्यलाभ में मदद की बल्कि धर्मपथ पर आगे बढ़ने का सन्मार्ग दिखाया। धर्मसेवा की अनेकों जिम्मदारियां देकर धर्म में खूब पुष्ट किया। बहुत उपकार है उन दोनों का। हम अत्यंत कृतज्ञ और धन्य हैं।
पुस्तक: पूज्य गुरुजी एवं माताजी के बारे में साधको के संस्मरण, विपश्यना विशोधन विन्यास
🙏🙏🙏
48) PART -- II ---- -- - - - - - - - - - - - - -
मैत्री-भावना कैसे करें?
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यह “मंगल-मैत्री” की साधना है इसे “पुण्य-वितरण” की साधना भी कहते हैं. जब भी कोई साधक धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है, तो दो-चार बातें अनुभूतियों से स्पष्ट हो जाती है. एक तो यह कि मै जब-जब मन में विकार जगाता हूँ, तब-तब बड़ा व्याकुल हो जाता हूँ और ये व्याकुलता अपने तक सीमित न रखकर औरों को भी बांटता हूँ सारे वातावरण को और जो मेरे संपर्क में आये उसको व्याकुल बना देता हूँ. जीवन भर स्वयं भी दुखी रहा औरों को भी दुखी बनाया. इसका प्रमुख कारण मेरी (मेरे अहंकार के प्रति) आसक्ति है.
साधना करने पर अहंकार थोडा-थोडा पिघलता है, चित्त का मैल थोडा-थोडा उतरता है, चित्त में थोड़ी-भी निर्मलता आती है तो औरों के प्रति प्यार उमड़ता है, अपना अहंकार जो टूटता है. भीतर से थोड़ी-सी भी सुख शांति महसूस होती है, तो जी चाहता है कि अपना यह सुख औरों को भी बांटू, मेरी सुख शांति में सभी भागिदार हों, जो पुण्य हासिल किया है उसका वितरण करूँ, ऐसा औरों के प्रति मंगल-भाव जागता जागता है, मैत्री जागती है, करुणा जागती है.
प्राणी जगत का सर्वोच्च प्राणी ब्रह्मा सदैव अनन्त मैत्री में विहार करता है, अनन्त करुणा में विहार करता है, अनन्त मुदिता में विहार करता है, अनन्त उपेक्षा (समता-भाव) में विहार करता है. यह उसका स्वभाव है. इसलिए इन चारों को ब्रह्मविहार कहते हैं. सभी मनुष्यों के भीतर भी ये सद्गुण समाये हुए हैं, लेकिन वे विकसित नहीं हुए हैं, बीजरूप में समाये हुए हैं. ये विकसित इस कारण नहीं होते, क्योंकि चित्त पर मैल की परतें पड़ी हुयी है. साधना करने से मैल की परत पर परत उतरती जाती है, मैल उतरते-उतरते एक समय ऐसा भी आएगा कि गहराई में मोटी-मोटी चट्टानों की तरह चढ़ा हुआ मैल भी टूटता जाएगा – तब भीतर से प्यार का एक झरना फूटेगा और इसी प्रेम के स्फुरण से प्रतिक्षण ‘मैत्री ही मैत्री’ ‘करुणा ही करुणा’ जागेगी. इस स्फुरण को - इन्हीं तरंगों को - पुलक-रोमांच को - प्यार के भावों से - मंगल के भावों से भरेंगे – सब का मंगल हो – सब का कल्याण हो – सारे प्राणी सुखी हों – विकारों से मुक्त हों. सारे प्राणी – दृश्य हों, अदृश्य हों, मनुष्य हों, मनुष्येत्तर हों सब का मंगल हो, कल्याण हो - इन भावों से - इन तरंगों से अपने मानस को भर लेंगे.
साधक देखेगा की सारा शरीर तरंगों से, पुलक रोमांच से भरने लगा, और जल्दी ही ऐसी स्थिति भी आएगी कि ये तरंगें शरीर की सीमा तक ही सीमित नहीं रहेगी. शरीर के पोर-पोर से तरंगे फूटेंगी और आस-पास के वातावरण में व्याप्त हो जाएगी. ऐसे वातावरण में व्याकुल व्यक्ति भी शांति महसूस करेगा. कुछ समय पश्चात मैत्री की तरंगें दूरस्थ व्यक्ति को भी प्रेषित की जा सकेगी. प्रिय जन, आचार्य, समाज, देश, विदेश, दसों दिशाएं सभी को मैत्री भेजें. वैरी व्यक्ति पर और नीचे के लोक नरक-लोक, प्रेत-लोक जिन्हें सबसे अधिक मैत्री की आवश्यकता है – मैत्री भेजनी चाहिए.
कोई परिवार इतना भाग्यशाली हो जिसके सभी सदस्य सामूहिक साधना कर “मंगल मैत्री” का अभ्यास करते हों, तो बड़ा कल्याण होगा. जीवन के मार्ग में चलते-चलते परस्पर मनमुटाव भी हो ही जाता है, मैत्री के अभ्यास से उठेंगे तो सारा मनोमालिन्य धुल जाता है – वैरभाव दूर हो जाता है. प्यार ही प्यार उमड़ता है – ऐसे घरों में सही मायने में देवता रमण करते हैं. इति ... (स ना गो वि वि वि).
47)"शांति का मार्ग"
बिना कारण के कुछ भी नही होता।
बिना जाने-बुझे अकारण ही कोई शिविर में नही आता है।
सम्भवत् कुछ लोगो ने अपने पूर्वजन्म में मेरे साथ कुछ कुशल कर्म किये हैं जिनके परिणामस्वरूप उन्हें धर्म के बीज को प्राप्त करने का अवसर मिला है।
दुसरो ने पहले ही धर्म के बीज की प्राप्ति कर ली है। अब वे उसके संवर्धन के लिये आये हैं।
🍁आप चाहे धर्म बीज की प्राप्ति के लिये आएं हो अथवा पहले से प्राप्त धर्म बीज के संवर्धन के लिये आये हों, अपने मंगल के लिये, अपने कल्याण के लिये, अपनी स्वस्ति- मुक्ति के लिये धर्म में पुष्ट होते रहें।
आप देखेंगे की कैसे इससे दुसरो को भी लाभ पहुँचने लगा है।
धर्म सबके लिये लाभकारी है।
🌻शांति का यह मार्ग सर्वत्र, सभी दुःखी लोगो को प्राप्त हो।
उन सबको दुःखो से, बंधनो से मुक्ति मिले।
वे सभी विकारो और अशुभ कर्मो से अपने चित्त को मुक्त कर सकें।
विश्व के सभी प्राणी सुखी हों!!
सभी प्राणियो को शान्ति मिले!!!
सभी प्राणियो की स्वस्ति-मुक्ति हो!
46) 💐💐 साधना पथ पर प्रगति 💐💐
मन प्रतिक्षण सक्रिय रहता है। साधना के समय मन पर बार-बार विचारों का आक्रमण होता रहता है।
ऐसे में यदि एक क्षण भी वर्तमान में स्थापित होता है तो बड़ा आराम महसूस होता है उसमें शक्ति है, मौन है, परम आनंद है।
उसके बाद ऐसे क्षणों की अवधि बढ़ाने की कोशिश करनी होती है।
वह कैसे करनी होगी ?
इस समय हम जो काम कर रहें हैं उसके प्रति जागरूक रहना होगा।
जैसे की हम चल रहें हैं तो चल रहे हैं, खा रहे हैं तो खा रहे हैं, लिख रहें हैं तो लिख रहें है, पढ़ रहें हैं तो पढ़ रहें हैं।
यों हर क्रिया के प्रति जागरूक रहना होगा। यह एक मानसिक व्यायाम ही है। परंतु साधना के लिये आवश्यक है।
चित्त में पुराने दबे हुए संस्कारों के अनेक आवरण हैं और प्रतिक्षण नए संस्कारों की वृद्धि के बीच ऐसे वर्तमान के क्षण में स्थिर रहना बहुत ही कठिन है। फिर भी बहुत महत्त्व का है।
ऐसे तूफ़ान में से वर्तमान क्षण पर स्थिर होने के प्रति प्रस्थान करना, आरूढ़ होना इसी का नाम सतिपठान है।
स्मृति में स्थापित होने पर भीतर चोर की भाँति छिप कर बैठे हुए वासना आदि के सारे विकार आहिस्ता-आहिस्ता बाहर निकल जाते हैं।
साधना करते करते कितने सारे विक्षेप साधक के अंदर में उठते हैं। उस समय समता धारण करना जरुरी है।
थोड़ी सी बैचनी, क्रोध या राग-द्वेष किये बिना समता को पुष्ट करने से, विक्षेपों की उपेक्षा करने से, साधना पथ पर प्रगति होती रहती है।
🌹🌹🌹 सबका मंगल हो 🌹🌹🌹
45)🌕🙏🌹 *धम्म प्रभात* 🌹🙏🌕
बुद्ध धम्म में चार मनोविहार का बड़ा महत्व है।
*मैत्री, करूणा, मुदिता और उपेक्षा।*
तथागत गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश में करूणा और मैत्री पर जोर दिया है। *बुद्ध ने कहा जो करूणा और मैत्री रखते हैं, दान देते हैं, उनको कुदरत उपहार में अनेक लाभ देते हैं।*
बुद्ध ने कहा-
"दानं ददन्तु सद्धाय।"
बुद्ध ने कहा-
भिक्षुओ !
*दान देने के ये पांच शुभ-परिणाम होते हैं।*
कौन से पांच?
*दाता बहुत जनों का प्रिय होता है, अच्छा लगने वाला होता है, सन्तपुरूष सज्जनों की संगति रहती है, यश-कीर्तिकी वृद्धि होती है, गृहस्थ-धर्म (पंचशीलों ) के पालन करने वाला होता है तथा शरीर छुटने पर, मरने पर सुगति को प्राप्त होता है (तथा स्वर्ग में उत्पन्न होता है।)*
भिक्षुओ !
दान के ये पाँच शुभ-परिणाम हैं।
"ददमानो पियो होति सतं धम्मं अनुक्कम,
सन्तो भजन्ति सप्पुरिसा सञ्ञता ब्रह्मचारयो ।।
ते तस्स धम्मं देसेन्ति सब्बदुक्खा पमुदनं ।
यं सो धम्मं इधज्ञाय परिनिब्बाति अनासवो ।।"
अर्थात-
*दानी जन-प्रिय होता है, वह सत्पुरूषों के धर्मका अनुगमन करने वाला होता है, सज्जन सत्पुरूष,संयत ब्रह्मचारी-जन उसकी संगति करते हैं। वे सत्पुरूष उसे सभी दुःखोंका नाश करने वाले धर्म का उपदेश देते हैं। उस धर्म को जानकर, वह आश्रवो का क्षयकर, परिनिर्वाण (रागादि अग्निकी शान्ति ) को प्राप्त होता है।*
भिक्षुओ !
ये पाँच समयोचित दान है।
कौन से पाँच ?
*आनेवाले अतिथि को दान देना, जाने वाले पथिक को दान देना, रोगी को दान देना, दरिद्र को दान देना तथा जो नई उपज हो वा नये फल हों वे पहले शीलवानों की सेवा में उपस्थित करना।*
भिक्षुओ !
ये पाँच समयोचित दान हैं।
कौन-से पांच?
"काले ददन्ति सप्पा वदनू वीतमच्छरा,
कालेन दिन्नं अरियेसु उजुभूतेसु तादिसु ।।
विप्पसन्नमुना तस्स विपुला होति दक्खिणा,
ये तत्थ अनुमोदन्ति वेय्यावच्चं करोन्ति वा ।।
न तेन दक्खिणा ऊना तेपि पुञ्जस्स भागिनो,
तस्मा ददेव अप्पटिवानचित्तो यत्यदिन्नं महप्फलं ॥
पुआनि परलोकस्मि पतिट्ठा होन्ति पाणिनं ।।"
अर्थात-
*प्रज्ञावान, पन्डित-जन, निर्लोभी भाव से समयोचित दान देते हैं। जो आर्यजन हैं, जो ऋजु-चरित हैं, जो स्थिरमति हैं, ऐसे श्रेष्ठजनों को प्रसन्न मन से जो दान दिया जाता है, वह महादान होता है। जो उस दान का अनुमोदन करते हैं, अथवा कामकाज करके सहायक होते हैं, उससे वह 'महादान' किसी भी प्रकार छोटा दान नही होता; वे भी 'पुण्य के भागी होते हैं। इसलिये अनुत्कण्ठित चित्त से वहाँ दान दे, जहाँ दान देने का महान फल होता है। ‘पुण्य' ही परलोक में प्राणियों का सहायक सिद्ध होते हैं।*
भिक्षुओ !
*जो दाता भिक्षुओं को भोजन कराता है, वह भोजन स्वीकार करने वाले भिक्षुओं को पाँच चीजों का दान देता है।*
कौन सी पाँच ?
*आयु देता है, वर्ण देता है, सुख देता है, बल देता है तथा प्रतिभा देता है। आयु का दाता होने से वह मानुषी वा दिव्य आयु का भागी होता है, वर्ण का दाता होने से वह मानुष वा दिव्य वर्ण का भागी होता है, सुख का दाता होने से वह मानुष वा दिव्य सुख का भागी होता है, बल का दाता होने से वह मानुष वा दिव्य बल का भागी होता है तथा प्रतिभा का दाता होने से वह मानुषी वा दिव्य प्रतिभा का भागी होता है। भिक्षुओ, जो दाता भिक्षुओं को भोजन कराता है, वह भोजन स्वीकार करने वाले भिक्षुओं को इन पाँच चीजों का दान देता है।*
"आयुदो बलदो धीरो वण्णदो पटिभाणदो,
सुखस्स दाता मेधावी सुखं सो अधिगच्छति ।।
आयुं दत्वा वलं वण्णं सुखं च पटिभाणकं
दीघायु यसवा होति यत्थ यत्युपपज्जति ।।"
अर्थात-
*जो धैर्यवान आयु, बल, वर्ण, प्रतिभा तथा सुख का दाता होता है, वह मेधावी पुरुष 'सुख' प्राप्त करता है। जो आयु, बल, वर्ण, सुख तथा प्रतिभा का दाता होता है, वह जहाँ जहाँ उत्पन्न होता है, वहाँ वहाँ दीर्घायुको प्राप्त करता है और यशस्वी होता है।*
वर्तमान में कोरोना वायरस के कारण संकट में पड़े लोगों को मुक्त हस्त से दान देना धम्म है।
यही बुद्ध की शिक्षा है।
नमो बुद्धाय
*Ref: दान वर्ग : अन्गुतरनिकाय*
🙏🌹 *भवतु सब्ब् मंगलम्* 🌹🙏
44)🌕🙏🌹 *धम्म प्रभात* 🌹🙏🌕
बुद्ध धम्म में चार मनोविहार का बड़ा महत्व है।
*मैत्री, करूणा, मुदिता और उपेक्षा।*
तथागत गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश में करूणा और मैत्री पर जोर दिया है। *बुद्ध ने कहा जो करूणा और मैत्री रखते हैं, दान देते हैं, उनको कुदरत उपहार में अनेक लाभ देते हैं।*
बुद्ध ने कहा-
"दानं ददन्तु सद्धाय।"
बुद्ध ने कहा-
भिक्षुओ !
*दान देने के ये पांच शुभ-परिणाम होते हैं।*
कौन से पांच?
*दाता बहुत जनों का प्रिय होता है, अच्छा लगने वाला होता है, सन्तपुरूष सज्जनों की संगति रहती है, यश-कीर्तिकी वृद्धि होती है, गृहस्थ-धर्म (पंचशीलों ) के पालन करने वाला होता है तथा शरीर छुटने पर, मरने पर सुगति को प्राप्त होता है (तथा स्वर्ग में उत्पन्न होता है।)*
भिक्षुओ !
दान के ये पाँच शुभ-परिणाम हैं।
"ददमानो पियो होति सतं धम्मं अनुक्कम,
सन्तो भजन्ति सप्पुरिसा सञ्ञता ब्रह्मचारयो ।।
ते तस्स धम्मं देसेन्ति सब्बदुक्खा पमुदनं ।
यं सो धम्मं इधज्ञाय परिनिब्बाति अनासवो ।।"
अर्थात-
*दानी जन-प्रिय होता है, वह सत्पुरूषों के धर्मका अनुगमन करने वाला होता है, सज्जन सत्पुरूष,संयत ब्रह्मचारी-जन उसकी संगति करते हैं। वे सत्पुरूष उसे सभी दुःखोंका नाश करने वाले धर्म का उपदेश देते हैं। उस धर्म को जानकर, वह आश्रवो का क्षयकर, परिनिर्वाण (रागादि अग्निकी शान्ति ) को प्राप्त होता है।*
भिक्षुओ !
ये पाँच समयोचित दान है।
कौन से पाँच ?
*आनेवाले अतिथि को दान देना, जाने वाले पथिक को दान देना, रोगी को दान देना, दरिद्र को दान देना तथा जो नई उपज हो वा नये फल हों वे पहले शीलवानों की सेवा में उपस्थित करना।*
भिक्षुओ !
ये पाँच समयोचित दान हैं।
कौन-से पांच?
"काले ददन्ति सप्पा वदनू वीतमच्छरा,
कालेन दिन्नं अरियेसु उजुभूतेसु तादिसु ।।
विप्पसन्नमुना तस्स विपुला होति दक्खिणा,
ये तत्थ अनुमोदन्ति वेय्यावच्चं करोन्ति वा ।।
न तेन दक्खिणा ऊना तेपि पुञ्जस्स भागिनो,
तस्मा ददेव अप्पटिवानचित्तो यत्यदिन्नं महप्फलं ॥
पुआनि परलोकस्मि पतिट्ठा होन्ति पाणिनं ।।"
अर्थात-
*प्रज्ञावान, पन्डित-जन, निर्लोभी भाव से समयोचित दान देते हैं। जो आर्यजन हैं, जो ऋजु-चरित हैं, जो स्थिरमति हैं, ऐसे श्रेष्ठजनों को प्रसन्न मन से जो दान दिया जाता है, वह महादान होता है। जो उस दान का अनुमोदन करते हैं, अथवा कामकाज करके सहायक होते हैं, उससे वह 'महादान' किसी भी प्रकार छोटा दान नही होता; वे भी 'पुण्य के भागी होते हैं। इसलिये अनुत्कण्ठित चित्त से वहाँ दान दे, जहाँ दान देने का महान फल होता है। ‘पुण्य' ही परलोक में प्राणियों का सहायक सिद्ध होते हैं।*
भिक्षुओ !
*जो दाता भिक्षुओं को भोजन कराता है, वह भोजन स्वीकार करने वाले भिक्षुओं को पाँच चीजों का दान देता है।*
कौन सी पाँच ?
*आयु देता है, वर्ण देता है, सुख देता है, बल देता है तथा प्रतिभा देता है। आयु का दाता होने से वह मानुषी वा दिव्य आयु का भागी होता है, वर्ण का दाता होने से वह मानुष वा दिव्य वर्ण का भागी होता है, सुख का दाता होने से वह मानुष वा दिव्य सुख का भागी होता है, बल का दाता होने से वह मानुष वा दिव्य बल का भागी होता है तथा प्रतिभा का दाता होने से वह मानुषी वा दिव्य प्रतिभा का भागी होता है। भिक्षुओ, जो दाता भिक्षुओं को भोजन कराता है, वह भोजन स्वीकार करने वाले भिक्षुओं को इन पाँच चीजों का दान देता है।*
"आयुदो बलदो धीरो वण्णदो पटिभाणदो,
सुखस्स दाता मेधावी सुखं सो अधिगच्छति ।।
आयुं दत्वा वलं वण्णं सुखं च पटिभाणकं
दीघायु यसवा होति यत्थ यत्युपपज्जति ।।"
अर्थात-
*जो धैर्यवान आयु, बल, वर्ण, प्रतिभा तथा सुख का दाता होता है, वह मेधावी पुरुष 'सुख' प्राप्त करता है। जो आयु, बल, वर्ण, सुख तथा प्रतिभा का दाता होता है, वह जहाँ जहाँ उत्पन्न होता है, वहाँ वहाँ दीर्घायुको प्राप्त करता है और यशस्वी होता है।*
वर्तमान में कोरोना वायरस के कारण संकट में पड़े लोगों को मुक्त हस्त से दान देना धम्म है।
यही बुद्ध की शिक्षा है।
नमो बुद्धाय
*Ref: दान वर्ग : अन्गुतरनिकाय*
🙏🌹 *भवतु सब्ब् मंगलम्* 🌹🙏
🌕🙏🌹 *धम्म प्रभात* 🌹🙏🌕
बुद्ध धम्म में चार मनोविहार का बड़ा महत्व है।
*मैत्री, करूणा, मुदिता और उपेक्षा।*
तथागत गौतम बुद्ध ने अपने उपदेश में करूणा और मैत्री पर जोर दिया है। *बुद्ध ने कहा जो करूणा और मैत्री रखते हैं, दान देते हैं, उनको कुदरत उपहार में अनेक लाभ देते हैं।*
बुद्ध ने कहा-
"दानं ददन्तु सद्धाय।"
बुद्ध ने कहा-
भिक्षुओ !
*दान देने के ये पांच शुभ-परिणाम होते हैं।*
कौन से पांच?
*दाता बहुत जनों का प्रिय होता है, अच्छा लगने वाला होता है, सन्तपुरूष सज्जनों की संगति रहती है, यश-कीर्तिकी वृद्धि होती है, गृहस्थ-धर्म (पंचशीलों ) के पालन करने वाला होता है तथा शरीर छुटने पर, मरने पर सुगति को प्राप्त होता है (तथा स्वर्ग में उत्पन्न होता है।)*
भिक्षुओ !
दान के ये पाँच शुभ-परिणाम हैं।
"ददमानो पियो होति सतं धम्मं अनुक्कम,
सन्तो भजन्ति सप्पुरिसा सञ्ञता ब्रह्मचारयो ।।
ते तस्स धम्मं देसेन्ति सब्बदुक्खा पमुदनं ।
यं सो धम्मं इधज्ञाय परिनिब्बाति अनासवो ।।"
अर्थात-
*दानी जन-प्रिय होता है, वह सत्पुरूषों के धर्मका अनुगमन करने वाला होता है, सज्जन सत्पुरूष,संयत ब्रह्मचारी-जन उसकी संगति करते हैं। वे सत्पुरूष उसे सभी दुःखोंका नाश करने वाले धर्म का उपदेश देते हैं। उस धर्म को जानकर, वह आश्रवो का क्षयकर, परिनिर्वाण (रागादि अग्निकी शान्ति ) को प्राप्त होता है।*
भिक्षुओ !
ये पाँच समयोचित दान है।
कौन से पाँच ?
*आनेवाले अतिथि को दान देना, जाने वाले पथिक को दान देना, रोगी को दान देना, दरिद्र को दान देना तथा जो नई उपज हो वा नये फल हों वे पहले शीलवानों की सेवा में उपस्थित करना।*
भिक्षुओ !
ये पाँच समयोचित दान हैं।
कौन-से पांच?
"काले ददन्ति सप्पा वदनू वीतमच्छरा,
कालेन दिन्नं अरियेसु उजुभूतेसु तादिसु ।।
विप्पसन्नमुना तस्स विपुला होति दक्खिणा,
ये तत्थ अनुमोदन्ति वेय्यावच्चं करोन्ति वा ।।
न तेन दक्खिणा ऊना तेपि पुञ्जस्स भागिनो,
तस्मा ददेव अप्पटिवानचित्तो यत्यदिन्नं महप्फलं ॥
पुआनि परलोकस्मि पतिट्ठा होन्ति पाणिनं ।।"
अर्थात-
*प्रज्ञावान, पन्डित-जन, निर्लोभी भाव से समयोचित दान देते हैं। जो आर्यजन हैं, जो ऋजु-चरित हैं, जो स्थिरमति हैं, ऐसे श्रेष्ठजनों को प्रसन्न मन से जो दान दिया जाता है, वह महादान होता है। जो उस दान का अनुमोदन करते हैं, अथवा कामकाज करके सहायक होते हैं, उससे वह 'महादान' किसी भी प्रकार छोटा दान नही होता; वे भी 'पुण्य के भागी होते हैं। इसलिये अनुत्कण्ठित चित्त से वहाँ दान दे, जहाँ दान देने का महान फल होता है। ‘पुण्य' ही परलोक में प्राणियों का सहायक सिद्ध होते हैं।*
भिक्षुओ !
*जो दाता भिक्षुओं को भोजन कराता है, वह भोजन स्वीकार करने वाले भिक्षुओं को पाँच चीजों का दान देता है।*
कौन सी पाँच ?
*आयु देता है, वर्ण देता है, सुख देता है, बल देता है तथा प्रतिभा देता है। आयु का दाता होने से वह मानुषी वा दिव्य आयु का भागी होता है, वर्ण का दाता होने से वह मानुष वा दिव्य वर्ण का भागी होता है, सुख का दाता होने से वह मानुष वा दिव्य सुख का भागी होता है, बल का दाता होने से वह मानुष वा दिव्य बल का भागी होता है तथा प्रतिभा का दाता होने से वह मानुषी वा दिव्य प्रतिभा का भागी होता है। भिक्षुओ, जो दाता भिक्षुओं को भोजन कराता है, वह भोजन स्वीकार करने वाले भिक्षुओं को इन पाँच चीजों का दान देता है।*
"आयुदो बलदो धीरो वण्णदो पटिभाणदो,
सुखस्स दाता मेधावी सुखं सो अधिगच्छति ।।
आयुं दत्वा वलं वण्णं सुखं च पटिभाणकं
दीघायु यसवा होति यत्थ यत्युपपज्जति ।।"
अर्थात-
*जो धैर्यवान आयु, बल, वर्ण, प्रतिभा तथा सुख का दाता होता है, वह मेधावी पुरुष 'सुख' प्राप्त करता है। जो आयु, बल, वर्ण, सुख तथा प्रतिभा का दाता होता है, वह जहाँ जहाँ उत्पन्न होता है, वहाँ वहाँ दीर्घायुको प्राप्त करता है और यशस्वी होता है।*
वर्तमान में कोरोना वायरस के कारण संकट में पड़े लोगों को मुक्त हस्त से दान देना धम्म है।
यही बुद्ध की शिक्षा है।
नमो बुद्धाय
*Ref: दान वर्ग : अन्गुतरनिकाय*
🙏🌹 *भवतु सब्ब् मंगलम्* 🌹🙏
समता को छोड़कर कोई विकल्प (choice) नहीं है। क्योंकि आप न तो संवेदनाओ को बदल सकते हैं, और न ही उनका निर्माण कर सकते हैं।जो कुछ भी होता है, अपने आप होता है।
यह सुखद या दुखद, ऐसा या वैसा हो सकता है, परंतु यदि आप अपनी समता बनाये रखते हैं, तो निश्चित रूप से मार्ग पर प्रगति कर रहें हैं।
जब हम मन से, वाणी से या शरीर से कोई कुशल कर्म करते हैं तो प्रकर्ति के बंधे बंधाये अटूट नियमो के अनुसार उसके परिणाम स्वरुप देर सबेर कुशल परिणाम ही मिलते हैं।
🍁इसके विपरीत यदि हम अकुशल कर्म करें तो प्रकर्ति के अटूट नियमो के अनुसार उसके परिणाम अकुशल ही होते हैं। हमारा अमंगल ही होता है।
जिस दिन, जिस क्षण, जिस मुहर्त में हमने शुभ कर्म किया वह हमारे लिये शुभ मुहर्त हो गया।
अतः महत्त्व अपने कर्मो को देना चाहिये। अपनी जीवनचर्या सुधारे। मंगल उसी में समाया हुआ है।
પ્રભુ સમક્ષ નમ્રતા આધ્યાત્મિક જીવનનું અનિવાર્ય તત્વ છે, અને આધ્યાત્મિક અભિમાન, ઘમંડ કે મિથ્યાભિમાન અને પોતાનો જ કક્કો ખરો કરવાની વૃતિ હંમેશા નીચે ધકેલે છે; પરંતુ માર્ગની મુશ્કેલીઓ ધ્યાનમાં લેતા પ્રભુમાં વિશ્વાસ અને પોતાના આધ્યાત્મિક ભાવિમાં શ્રદ્ધા ( એટલે કે મારું હૃદય અને આત્મા પ્રભુને ખોજે છે તેથી એક દિવસ હું એમને પામવામાં નિષ્ફળ નહિ જાઉં ) ખૂબ જ જરૂરી છે.
ખાસ કરીને પ્રભુ સર્વમાં છે અને તેથી બીજાઓ માટેના ધિક્કારને કોઈ સ્થાન નથી.....એકમાત્ર છુટકારો છે ચેતનાનું પરિવર્તન, સત્તના વધુ મહાન, વધુ વ્યાપક અને વધુ પવિત્ર માર્ગમાં પરિવર્તન, અને એ પરિવર્તન ઉપર મંડાયેલું જીવન અને કર્મ. તેથી એકવાર આધ્યાત્મિક અભિમુખતા પૂર્ણ થાય, પછી શક્તિઓને તરફ વાળવી જોઈએ...
- શ્રી અરવિંદ.
🍁हर अवस्था में से मन गुजर रहा है। अलग अलग अनुभूतिओं में से मन गुजर रहा है और उन अवस्थाओं को, उन अनुभूतिओं को दृष्टा भाव से देख रहा है। ज्ञाताभाव से जान रहा है।
🌻उन परिस्थितियों को, उन अनुभूतिओं को न तो अच्छा मानकर खुशिओं से नाचने लगता है, न बुरा मानकर व्याकुल होने लगता है। अपना संतुलन कायम रखता है।समता बनाये रखता है। यह समझते हुए की जो अनुभूति हो रही है वह स्थाई नही है, स्थिर नही है, शाश्वत नही है।जो सुबह हो रहा था वह शाम को नही है।
🌺इतना ही नही सूक्ष्म स्तर पर देखता है कि प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। तन मन में कहीं कुछ ऐसा नही है जो स्थिर है, अचल है। जरा सा प्रकम्पन भी है तो इस बात का द्योतक है की उसमे कोई परिवर्तन हो रहा है। कहीं स्थायित्व नही है। सारा ऐंद्रिय जगत अनित्य है, नश्वर है, भंगुर है।
☸तथागत बुद्ध ने 38 प्रकार के "मंगल कर्म" बताये है जो "महा मंगलसुत्त" के नाम से जाना जाता है, जो निम्नलिखित है -
...अगर कोई इन 38 मंगल कर्म का पालन करने लग जाये तो समझो उसके जिंदगी से दुःख एवं परेशानियां दूर हो ही जायेंगे।।।
लोक- धर्म का स्पर्श होने पर- क्या है लोक-धर्म? जीवन के ये ही उतार- चढ़ाव, वसंत-पतझड़, सुख- दुःख, यश- अपयश, लाभ-हानि, जय-पराजय है लोक-धर्म।
🌷 इनका स्पर्श होने पर जिसका चित्त कम्पायमान नही होता, डांवाडोल नही होता, समता में रहता है, 'अशोकं' शोक-रहित रहता है, 'विरजं' विरज विमल रहता है, 'खेमं' योग- क्षेम से भरपूर रहता है, अगले क्षण के लिए निश्चिन्त रहता है, पूर्ण सुरक्षित महसूस करता है, यों समता में रहता है तो उत्तम मंगल सधने लगता है।
The Buddha’s teaching was not merely for monks and nuns, but also for householders, many of whom used to come to him to learn Dhamma.
One group came and said: “Sir, we are not prepared to become monks or nuns; we have to live as householders. Will the technique work for us? Can we also get liberated?”
Monks and nuns do not have any worldly responsibilities. So they can give their whole life to this purpose, and the results come sooner. Householders cannot avoid their multifarious responsibilities towards their family members, relatives, and society but the teaching also works for them.
🌷The Buddha gave a discourse to this group, explaining how to live a wholesome life. He listed thirty-eight welfares to be acquired by a family man or woman, each higher than the last. When he came to the highest, he said:
Facing the vicissitudes of life the mind is not shaken; it is without grief, without impurity, without insecurity: this is the highest welfare.
Everyone has to meet vicissitudes in life but the mind should not get agitated; it should remain stable and balanced. Then there is no crying, no unhappiness, no impurity nor any feeling of insecurity in your mind. One always feels secure because one is on the path of Dhamma; nothing can go wrong. This is the highest welfare: equanimity with all the vicissitudes of life.
S. N. Goenka.
lābha (profit) and alābha (loss), yaso (fame) and ayaso (ill repute), pasaṃsā (praise) and nindā (criticism), sukha (pleasure) and dukkha (pain).
यह मौसम, बैठने की मुद्रा, किसी पुरानी बीमारी, शारीरिक कमजोरी, या जो भोजन खाया है उससे भी उत्पन्न हो सकती हैं।
कारण महत्वहीन है और हमारी चिंता के बाहर है(the reason is unimportant and beyond our concern).
🌷 प्रारम्भ में केवल स्थूल(intense) संवेदनाओ का ही अनुभव करते हैं पर हम शरीर के प्रत्येक भाग पर क्रम से ध्यान ले जाना जारी रखते हैं। ऐसा करते हुए हम केवल प्रमुख संवेदनाओ पर ही अनावश्यक रूप से ध्यान नहीं देते बल्कि एकाग्रता को सिलसिलेवार ढंग से (systematic order) शरीर के हर अंग पर होने वाली संवेदना को जागरूक होकर देखने में करते हैं।
जहाँ संवेदना स्पष्ट नहीं है वहां से छलांग लगाकर हम वहां नहीं जाते जहाँ वह स्पष्ट है। और न हम कुछ संवेदनाओ को देर तक देखते रहते हैं , और न अन्य की उपेक्षा(avoid) करते हैं।
🌷 हम इस प्रकार धीरे धीरे उस बिंदु पर पहुँचते हैं जहाँ से शरीर के हर अंग पर होने वाली संवेदनाओ का अनुभव कर सकते हैं।
🌷 परंतु संवेदनाए चाहे सुखद हों या दुखद, स्थूल हो या सूक्ष्म(intense or subtle) साधना के लिये यह सब अप्रासंगिक(irrelevant) है।
दुखद संवेदनाओ से जो भी कष्ट हो, सुखद संवेदनाओ का जो भी आकर्षण हो, हम अपना काम रोकते नहीं, हम किसी संवेदना विशेष से न तो आकर्षित होते हैं और न विकर्षित(repelled)।
हमारा काम अपने आपको केवल उसी प्रकार, उसी तटस्थता के साथ (detachment) निरीक्षण करना है जिस प्रकार एक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में निरीक्षण करता है।
यह मौसम, बैठने की मुद्रा, किसी पुरानी बीमारी, शारीरिक कमजोरी, या जो भोजन खाया है उससे भी उत्पन्न हो सकती हैं।
कारण महत्वहीन है और हमारी चिंता के बाहर है(the reason is unimportant and beyond our concern).
🌷 प्रारम्भ में केवल स्थूल(intense) संवेदनाओ का ही अनुभव करते हैं पर हम शरीर के प्रत्येक भाग पर क्रम से ध्यान ले जाना जारी रखते हैं। ऐसा करते हुए हम केवल प्रमुख संवेदनाओ पर ही अनावश्यक रूप से ध्यान नहीं देते बल्कि एकाग्रता को सिलसिलेवार ढंग से (systematic order) शरीर के हर अंग पर होने वाली संवेदना को जागरूक होकर देखने में करते हैं।
जहाँ संवेदना स्पष्ट नहीं है वहां से छलांग लगाकर हम वहां नहीं जाते जहाँ वह स्पष्ट है। और न हम कुछ संवेदनाओ को देर तक देखते रहते हैं , और न अन्य की उपेक्षा(avoid) करते हैं।
🌷 हम इस प्रकार धीरे धीरे उस बिंदु पर पहुँचते हैं जहाँ से शरीर के हर अंग पर होने वाली संवेदनाओ का अनुभव कर सकते हैं।
🌷 परंतु संवेदनाए चाहे सुखद हों या दुखद, स्थूल हो या सूक्ष्म(intense or subtle) साधना के लिये यह सब अप्रासंगिक(irrelevant) है।
दुखद संवेदनाओ से जो भी कष्ट हो, सुखद संवेदनाओ का जो भी आकर्षण हो, हम अपना काम रोकते नहीं, हम किसी संवेदना विशेष से न तो आकर्षित होते हैं और न विकर्षित(repelled)।
हमारा काम अपने आपको केवल उसी प्रकार, उसी तटस्थता के साथ (detachment) निरीक्षण करना है जिस प्रकार एक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में निरीक्षण करता है।
सभी सुख एवं शांति चाहते हैं, क्यों कि हमारे जीवन में सही सुख एवं शांति नहीं है। हम सभी समय समय पर द्वेष, दौर्मनस्य, क्रोध, भय, ईर्ष्या आदि के कारण दुखी होते हैं। और जब हम दुखी होते हैं तब यह दुख अपने तक ही सीमित नहीं रखते। हम औरों को भी दुखी बनाते हैं। जब कोई व्यक्ति दुखी होता है तो आसपास के सारे वातावरण को अप्रसन्न बना देता है, और उसके संपर्क में आने वाले लोगों पर इसका असर होता है। सचमुच, यह जीवन जीने का उचित तरिका नहीं है।
हमें चाहिए कि हम भी शांतिपूर्वक जीवन जीएं और औरों के लिए भी शांति का ही निर्माण करें। आखिर हम सामाजिक प्राणि हैं, हमें समाज में रहना पडता हैं और समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ पारस्पारिक संबंध रखना है। ऐसी स्थिति में हम शांतिपूर्वक जीवन कैसे जी सकते हैं? कैसे हम अपने भीतर सुख एवं शांति का जीवन जीएं, और कैसे हमारे आसपास भी शांति एवं सौमनस्यता का वातावरण बनाए, ताकि समाज के अन्य लोग भी सुख एवं शांति का जीवन जी सके?
हमारे दुख को दूर करने के लिए पहले हम यह जान लें कि हम अशांत और बेचैन क्यों हो जाते हैं। गहराई से ध्यान देने पर साफ मालूम होगा कि जब हमारा मन विकारों से विकृत हो उठता है तब वह अशांत हो जाता है। हमारे मन में विकार भी हो और हम सुख एवं सौमनस्यता का अनुभव करें, यह संभव नहीं है।
ये विकार क्यों आते है, कैसे आते है? फिर गहराई से ध्यान देने पर साफ मालूम होगा कि जब कोई व्यक्ति हमारे मनचाहा व्यवहार नहीं करता उसके अथवा किसी अनचाही घटना के प्रतिक्रियास्वरूप आते हैं। अनचाही घटना घटती है और हम भीतर तणावग्रस्त हो जाते हैं। मनचाही के न होने पर, मनचाही के होने में कोई बाधा आ जाए तो हम तणावग्रस्त होते हैं। हम भीतर गांठे बांधने लगते है। जीवन भर अनचाही घटनाएं होती रहती हैं, मनाचाही कभी होती है, कभी नहीं होती है, और जीवन भर हम प्रतिक्रिया करते रहते हैं, गांठे बांधते रहते हैं। हमारा पूरा शरीर एवं मानस इतना विकारों से, इतना तणाव से भर जाता है कि हम दुखी हो जाते हैं।
इस दुख से बचने का एक उपाय यह कि जीवन में कोई अनचाही होने ही न दें, सब कुछ मनचाहा ही हों। या तो हम ऐसी शक्ति जगाए, या और कोई हमारे मददकर्ता के पास ऐसी ताकद होनी चाहिए कि अनचाही होने न दें और सारी मनचाही पूरी हो। लेकिन यह असंभव है। विश्व में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसकी सारी ईच्छाएं पूरी होती है, जिसके जीवन में मनचाही ही मनचाही होती है, और अनचाही कभीभी नहीं होती। जीवन में अनचाही होती ही है। ऐसे में प्रश्न उठता है, कैसे हम विषम परिस्थितियों के पैदा होने पर अंधप्रतिक्रिया न दें? कैसे हम तणावग्रस्त न होकर अपने मन को शांत व संतुलित रख सकें?
भारत एवं भारत के बाहर भी कई ऐसे संत पुरुष हुए जिन्होंने इस समस्या के, मानवी जीवन के दुख की समस्या के, समाधान की खोज की। उन्होंने उपाय बताया- जब कोई अनचाही के होने पर मन में क्रोध, भय अथवा कोई अन्य विकार की प्रतिक्रिया आरंभ हो तो जितना जल्द हो सके उतना जल्द अपने मन को किसी और काम में लगा दो। उदाहरण के तौर पर, उठो, एक गिलास पानी लो और पानी पीना शुरू कर दो—आपका गुस्सा बढेगा नहीं, कम हो जायेगा। अथवा गिनती गिननी शुरू कर दो—एक, दो, तीन, चार। अथवा कोई शब्द या मंत्र या जप या जिसके प्रति तुम्हारे मन में श्रद्धा है ऐसे किसी देवता का या संत पुरुष का नाम जपना शुरू कर दो। मन किसी और काम में लग जाएगा और कुछ हद तक तुम विकारों से, क्रोध से मुक्त हो जाओगे।
इससे मदद हुई। यह उपाय काम आया। आजभी काम आता है। ऐसे लगता है कि मन व्याकुलता से मुक्त हुआ। लेकिन यह उपाय केवल मानस के उपरी सतह पर ही काम करता है। वस्तुत: हमने विकारों को अंतर्मन की गहराईयों में दबा दिया, जहां उनका प्रजनन एवं संवर्धन चलता रहा। मानस के उपर शांति एवं सौमनस्यता का एक लेप लग गया लेकिन मानस की गहराईयों में दबे हुए विकारों का सुप्त ज्वालामुखी वैसा ही रहा, जो समया पाकर फूट पडेगा ही।
भीतर के सत्य की खोज करने वाले कुछ वैज्ञानिकों ने इसके आगे खोज की। अपने मन एवं शरीर के सच्चाई का भीतर अनुभव किया। उन्होंने देखा कि मन को और काम में लगाना यानी समस्या से दूर भागना है। पलायन सही उपाय नहीं है, समस्या का सामना करना चाहिए। मन में जब विकार जागेगा, तब उसे देखो, उसका सामना करो। जैसे ही आप विकार को देखना शुरू कर दोगे, वह क्षीण होता जाएगा और धीरे धीरे उसका क्षय हो जाएगा।
यह अच्छा उपाय है। दमन एवं खुली छूट की दोनो अतियों को टालता है। विकारों को अंतर्मन की गहराईयों में दबाने से उनका निर्मूलन नहीं होगा। और विकारों को अकुशल शारीरिक एवं वाचिक कर्मों द्वारा खुली छूट देना समस्याओं को और बढाना है। लेकिन अगर आप केवल देखते रहोगे, तो विकारों का क्षय हो जाएगा और आपको उससे छुटकारा मिलेगा।
कहना तो बड़ा आसान है, लेकिन करना बड़ा कठिन। अपने विकारों का सामना करना आसान नहीं है। जब क्रोध जागता है, तब इस तरह सिर पर सवार हो जाता है कि हमें पता भी नहीं चलता। क्रोध से अभिभूत होकर हम ऐसे शारीरिक एवं वाचिक काम कर जाते हैं जिससे हमारी भी हानि होती है, औरों की भी। जब क्रोध चला जाता है, तब हम रोते हैं और पछतावा करते हैं, इस या उस व्यक्ति से या भगवान से क्षमायाचना करते हैं— हमसे भूल हो गयी, हमें माफ कर दो। लेकिन जब फिर वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ता है तो हम वैसे ही प्रतिक्रिया करते हैं। बार-बार पश्चाताप करने से कुछ लाभ नहीं होता।
हमारी कठिनाई यह है कि जब विकार जागता है तब हम होश खो बैठते हैं। विकार का प्रजनन मानस की तलस्पर्शी गहराईयों में होता है और जब तक वह उपरी सतह तक पहुंचता है तो इतना बलवान हो जाता है कि हमपर अभिभूत हो जाता है। हम उसको देख नहीं पाते।
तो कोई प्राईवेट सेक्रेटरी साथ रख लिया जो हमें याद दिलाये, देख मालिक, तुझ में क्रोध आ गया है, तू क्रोध को देख। क्यों कि क्रोध दिन के चौबीस घंटों में कभी भी आ सकता है इसलिए तीन प्राईवेट सेक्रेटरीज् को नौकरी में रख लूं। समझ लो, रख लिए। क्रोध आया और सेक्रेटरी कहता है, देख मालिक, क्रोध आया। तो पहला काम यह करूंगा कि उसे डांट दूंगा। मूर्ख कहीं का, मुझको सिखाता है? मैं क्रोध से इतना अभिभूत हो जाता हूं कि यह सलाह कुछ काम नहीं आती।
मान लो मुझे होश आया और मैं ने उसे नहीं डांटा। मैं कहता हूं—बड़ा अच्छा कहा तूने. अब मैं क्रोध का ही दर्शन करूंगा, उसके प्रति साक्षीभाव रखूंगा। क्या यह संभव है ? जब आंख बंद कर क्रोध देखने का प्रयास करूंगा तब जिस बात को लेकर क्रोध जागा, बार-बार वही बात, वही व्यक्ती, वह ही घटना मन में आयेगी। मैं क्रोध को नहीं, क्रोध के आलंबन को देख रहा हूं। इससे क्रोध और भी ज़ादा बढेगा। यह कोई उपाय नहीं हुआ। आलंबन को काटकर केवल विकार को देखना बिल्कुल आसान नहीं होता।
लेकिन कोई व्यक्ति परम मुक्त अवस्था तक पहुंच जाता है, तो सही उपाय बताता है। ऐसा व्यक्ति खोज निकालता है कि जब भी मन में कोई विकार जागे तो शरीर पर दो घटनाएं उसी वक्त शुरू हो जाती हैं। एक, सांस अपनी नैसर्गिक गति खो देता है। जैसे मन में विकार जागे, सांस तेज एवं अनियमित हो जाता है। यह देखना बड़ा आसान है। दोन, सूक्ष्म स्तर पर शरीर में एक जीवरासायनिक प्रक्रिया शुरू हो जाती है जिसके परिणामस्वरूप संवेदनाओं का निर्माण होता है। हर विकार शरीर पर कोई न कोई संवेदना निर्माण करता है।
यह प्रायोगिक उपाय हुआ। एक सामान्य व्यक्ति अमूर्त विकारों को नहीं देख सकता—अमूर्त भय, अमूर्त क्रोध, अमूर्त वासना आदि। लेकिन उचित प्रशिक्षण एवं प्रयास करेगा तो आसानी से सांस एवं शरीर पर होने वाली संवेदनाओं को देख सकता है। दोनों का ही मन के विकारों से सीधा संबंध है।
सांस एवं संवेदनाएं दो तरह से मदत करेगी। एक, वे प्राईवेट सेक्रेटरी का काम करेंगी। जैसे ही मन में कोई विकार जागा, सांस अपनी स्वाभाविकता खो देगा, वह हमे बतायेगा—देख, कुछ गडबड है! और हम सांस को डांट भी नहीं सकते। हमें उसकी चेतावनी को मानना होगा। ऐसे ही संवेदनाएं हमें बतायेगी कि कुछ गलत हो रहा है। दोन, चेतावनी मिलने के बाद हम सांस एवं संवेदनाओं को देख सकते है। ऐसा करने पर शीघ्र ही हम देखेंगे कि विकार दूर होने लगा।
यह शरीर और मन का परस्पर संबंध एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक तरफ मन में जागने वाले विचार एवं विकार हैं और दूसरी तरफ सांस एवं शरीर पर होने वाली संवेदनाएं हैं। मन में कोई भी विचार या विकार जागता है तो तत्क्षण सांस एवं संवेदनाओं को प्रभावित करता ही है। इस प्रकार, सांस एवं संवेदनाओं को देख कर हम विकारों को देख रहे हैं। पलायन नहीं कर रहे, विकारों के आमुख होकर सच्चाई का सामना कर रहे हैं। शीघ्र ही हम देखेंगे कि ऐसा करने पर विकारों की ताकत कम होने लगी, पहले जैसे वे हमपर अभिभूत नहीं होते। हम अभ्यास करते रहें तो उनका सर्वथा निर्मूलन हो जाएगा। विकारों से मुक्त होते होते हम सुख एवं शांति का जीवन जीने लग जाएंगे।
इस प्रकार आत्मनिरिक्षण की यह विद्या हमें भीतर और बाहर दोनो सच्चाईयों से अवगत कराती है। पहले हम केवल बहिर्मुखी रहते थे और भीतर की सच्चाई को नहीं जान पाते थे। अपने दुख का कारण हमेशा बाहर ढूंढते थे। बाहर की परिस्थितियों को कारण मानकर उन्हें बदलने का प्रयत्न करते थे। भीतर की सच्चाई के बारे में अज्ञान के कारण हम यह नहीं समझ पाते थे कि हमारे दुख का कारण भीतर है, वह है सुखद एवं दुखद संवेदनाओं के प्रति अंध प्रतिक्रिया।
अब, अभ्यास के कारण, हम सिक्के का दूसरा पहलू देख सकते हैं। हम सांस को भी जान सकते है और भीतर क्या हो रहा उसको भी। सांस हो या संवेदना, हम उसे मानसिक संतुलन खोये बिना देख सकते हैं। प्रतिक्रिया बंद होती है तो दुख का संवर्धन नहीं होता। उसके बजाय, विकार उभर कर आते हैं और उनकी निर्जरा होती है, क्षय होता है।
जैसे जैसे हम इस विद्या में पकते चले जांय, विकार शीघ्रता के साथ क्षय होने लगते हैं। धीरे धीरे मन विकारों से मुक्त होता है, शुद्ध होता है। शुद्ध चित्त हमेशा प्यार से भरा रहता है—सबके प्रति मंगल मैत्री, औरों के अभाव एवं दुखों के प्रति करुणा, औरों के यश एवं सुख के प्रति मुदिता एवं हर स्थिति में समता।
जब कोई उस अवस्था पर पहुंचता है तो पूरा जीवन बदल जाता है। शरीर एवं वाणी के स्तर पर कोई ऐसा काम कर नहीं पायेगा जिससे की औरों की सुख-शांति भंग हो। उसके बजाय, संतुलित मन शांत हो जाता है और अपने आसपास सुख-शांति का वातावरण निर्माण करता है। अन्य लोग इससे प्रभावित होते हैं, उनकी मदत होने लगती है।
जब हम भीतर अनुभव हो रही हर स्थिति में मन संतुलित रखते हैं, तब किसी भी बाह्य परिस्थिति का सामना करते हुए तटस्थ भाव बना रहता है। यह तटस्थ भाव पलायनवाद नहीं है, ना यह दुनिया की समस्याओं के प्रति उदासीनता या बेपरवाही है। विपश्यना (Vipassana) का नियमित अभ्यास करने वाले औरों के दुखों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, एवं उनके दुखों को हटाने के लिए बिना व्याकुल हुए मैत्री, करुणा एवं समता भरे चित्त के साथ हर प्रकार प्रयत्नशील होते हैं। उनमें पवित्र तटस्थता आ जाती हैं—मन का संतुलन खोये बिना कैसे पूर्ण रूप से औरों की मदत के लिए वचनबद्ध होना। इस प्रकार औरों के सुख-शांति के लिए प्रयत्नशील होकर वे स्वयं सुखी एवं शांत रहते हैं।
भगवान बुद्ध ने यही सिखाया—जीवन जीने की कला। उन्होंने किसी संप्रदाय की स्थापना नहीं की। उन्होंने अपने शिष्यों को मिथ्या कर्म-कांड नहीं सिखाये। बल्कि, उन्होंने भीतर की नैसर्गिक सच्चाई को देखना सिखाया। हम अज्ञानवश प्रतिक्रिया करते रहते हैं, अपनी हानि करते हैं औरों की भी हानि करते हैं। जब सच्चाई को जैसी-है-वैसी देखने की प्रज्ञा जागृत होती है तो यह अंध प्रतिक्रिया का स्वभाव दूर होता है। तब हम सही क्रिया करते हैं—ऐसा काम जिसका उगम सच्चाई को देखने और समझने वाले संतुलित चित्त में होता है। ऐसा काम सकारात्मक एवं सृजनात्मक होता है, आत्महितकारी एवं परहितकारी।
आवश्यक है, खुद को जानना, जो कि हर संत पुरुष की शिक्षा है। केवल कल्पना, विचार या अनुमान के बौद्धिक स्तर पर नहीं, भावुक होकर या भक्तिभाव के कारण नहीं, जो सुना या पढा उसके प्रति अंधमान्यता के कारण नहीं। ऐसा ज्ञान किसी काम का नहीं है। हमें सच्चाई को अनुभव के स्तर पर जानना चाहिए। शरीर एवं मन के परस्पर संबंध का प्रत्यक्ष अनुभव होना चाहिए। इसी से हम दुख से मुक्ति पा सकते हैं।
अपने बारे में इस क्षण का जो सत्य है, जैसा भी है उसे ठीक वैसा ही, उसके सही स्वभाव में देखना समझना, यही विपश्यना है। भगवान बुद्ध के समय की भारत की जनभाषा में पस्सना (पश्यना / passana) कहते थे देखने को, यह जो खुली आंखों से सामान्य देखना होता है उसको। लेकिन विपस्सना (विपश्यना) का अर्थ है जो चीज जैसी है उसे वैसी उसके सही रूप में देखना, ना कि केवल जैसा उपर उपर से प्रतित होता है। भासमान सत्य के परे जाकर समग्र शरीर एवं मन के बारे में परमार्थ सत्य को जानना आवश्यक है। जब हम उस सच्चाई का अनुभव करते हैं तब हमारा अंध प्रतिक्रिया करने का स्वभाव बदल जाता है, विकारों का प्रजनन बंद होता है, और अपने आप पुराने विकारों का निर्मूलन होता है। हम दुखों से छुटकारा पाते हैं एवं सही सुख का अनुभव करने लगते हैं।
विपश्यना साधना के शिविर में दिए जाने वाले प्रशिक्षण के तीन सोपान हैं। एक, ऐसे शारीरिक एवं वाचिक कर्मों से विरत रहो, जिनसे औरों की सुख-शांति भंग होती हो। विकारों से मुक्ति पाने का अभ्यास हम नहीं कर सकते अगर दूसरी ओर हमारे शारीरिक एवं वाचिक कर्म ऐसे हैं जिससे की विकारों का संवर्धन हो रहा हो। इसलिए, शील की आचार संहिता इस अभ्यास का पहला महत्त्वपूर्ण सोपान है। जीव-हत्या, चोरी, कामसंबंधी मिथ्याचार, असत्य भाषण एवं नशे के सेवन से विरत रहना—इन शीलों का पालन निष्ठापूर्वक करने का निर्धार करते हैं। शील पालन के कारण मन कुछ हद तक शांत हो जाता है और आगे का काम करना संभव होता है।
अगला सोपान है, इस जंगली मन को एक (सांस के) आलंबन पर लगाकर वश में करना। जितना हो सके उतना समय लगातार मन को सांस पर टिकाने अभ्यास करना होता है। यह सांस की कसरत नहीं है, सांस का नियमन नहीं करते। बल्कि, नैसर्गिक सांस को देखना होता है, जैसा है वैसा, जैसे भी भीतर आ रहा हो, जैसे भी बाहर जा रहा हो। इस तरह मन और भी शांत हो जाता है और तीव्र विकारों से अभिभूत नहीं होता। साथ ही साथ, मन एकाग्र हो जाता है, तीक्ष्ण हो जाता है, प्रज्ञा के काम के लायक हो जाता है।
शील एवं मन को वश में करने के यह दो सोपान अपने आपमें आवश्यक भी हैं और लाभदायी भी। लेकिन अगर हम तिसरा कदम नहीं उठायेंगे तो विकारों का दमन मात्र हो कर रह जाएगा। यह तिसरा कदम, तिसरा सोपान है अपने बारें में सच्चाई को जानकर विकारों का निर्मूलन द्वारा मन की शुद्धता। यह विपश्यना है—संवेदना के रूप में प्रकट होने वाले सतत परिवर्तनशील मन एवं शरीर के परस्पर संबंध को सुव्यवस्थित विधि से एवं समता के साथ देखते हुए अपने बारे में सच्चाई का अनुभव करना। यह भगवान बुद्ध की शिक्षा का चरमबिंदु है—आत्मनिरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि।
सभी इसका अभ्यास कर सकते हैं। सभी दुखियारे हैं। इस सार्वजनीन रोग का इलाज भी सार्वजनीन होना चाहिए, सांप्रदायिक नहीं। जब कोई क्रोध से पीड़ित होता है तो वह बौद्ध क्रोध, हिंदू क्रोध या ईसाई क्रोध नहीं होता। क्रोध क्रोध है। क्रोध के कारण जो व्याकुलता आती है, उसे ईसाई, यहुदी या मुस्लिम व्याकुलता नहीं कहा जा सकता। रोग सार्वजनीन है। इलाज भी सार्वजनीन होना चाहिए।
विपश्यना ऐसा ही सार्वजनीन उपाय है। औरों की सुख-शांति भंग न करने वाले शील के पालन का कोई विरोध नहीं करेगा। मन को वश करने के अभ्यास का कोई विरोध नहीं करेगा। अपने बारें में सच्चाई जानने वाली प्रज्ञा का, जिससे कि मन के विकार दूर होते है, कोई विरोध नहीं करेगा। विपश्यना सार्वजनीन विद्या है।
भीतर की सच्चाई को देखकर सत्य को जैसा है वैसा देखना—यही अपने आपको प्रत्यक्ष अनुभव से जानना है। धीरजपूर्वक प्रयत्न करते हुए हम विकारों से मुक्ती पाते हैं। स्थूल भासमान सत्य से शुरू करके साधक शरीर एवं मन के परमसत्य तक पहुंचता है। फिर उसके भी परे, शरीर एवं मन के परे, समय एवं स्थान के परे, संस्कृत सापेक्ष जगत के परे—विकारों से पूर्ण मुक्ति का सत्य, सभी दुखों से पूर्ण मुक्ति का सत्य। उस परमसत्य को चाहे जो नाम दो, सभी के लिए वह अंतिम लक्ष्य है।
सभी उस परमसत्य का साक्षात्कार करें। सभी प्राणी दुखों से मुक्त हों। सभी प्राणी शांत हो, सुखी हो।
धर्म की केवल चर्चा होकर रह जाय, धर्म को केवल मनोरंजन का विषय समझ कर रह जायँ तो भाई बहुत कुछ खो दिया ।
इस तरह की धर्म सभाओं में आना, बुरी बात नहीं है लेकिन अगर यह मनोरंजन का विषय हो गया - चलो आज इनको सुन लिया , कल उनकी सुनें , परसों उसकी सुनें . . . । सुनते ही रह जाओगे सारी जिंदगी भर । करोगे कुछ नहीं ।
जिस दिन यह जान लोगे कि मुझे करना है । मुझे सत्य को अनुभूति पर उतार कर स्वयं देखना हैं कि मेरा विकार कहां जागता है ? कैसे संवर्धन करता है ? उसको कैसे रोका जा सकता हैं ? कैसे जड़ों से दूर किया जा सकता हैं ? बस , कल्याण का रास्ता मिल गया ।इस देख ने की विद्या को विपश्यना कहते हैं । यह बहुत प्राचीन , बहुत पुरानी विद्या है ।
भारत का एक महान संत कहता हैं - मैं चारों ओर जिसको देखूं , वही बहुत बोलता हैं । बोलने वाले को बोलने का व्यसन लग गया , बोले जा रहा हैं । बड़ा खुश होता हैं , देखो इतने लोग सुन रहे हैं मुझे । देखो , मैं कितना अच्छा वक्ता हूं , कैसा अच्छा धर्म - गुरु हूं । यही व्यसन लग गया । और सुनने वालों को यह व्यसन लग गया कि आज तो बहुत अच्छा सुना , अरे आज तो धर्म इतना बढ़िया सुना , इतना बढ़िया सुना । दोनों अपनी मस्ती में हैं । तो कहता हैं कि भाई कि भाई , कथे न होई - बोलने से कुछ नहीं होता , सुने न होई - केवल सुनने से कुछ नहीं होता । तो किससे होता हैं ? तो कहता हैं - कीये होई !! करने से होता हैं. ।
करने से होगा भाई । काम करना हैं. । मनुष्य का जीवन बड़ा अनमोल जीवन । अनमोल जीवन इस माने में कि यह काम कोई पशु नहीं कर सकता । कोई पक्षी नहीं कर सकता , कोई प्रेत - प्राणी नहीं कर सकता , कोई कीट - पतंग नहीं कर सकता । यह काम केवल मनुष्य कर सकता हैं । प्रकृति ने या कहो परमात्मा ने इतनी बड़ी शक्ति मनुष्य को दी हैं कि वह अंतर्मुखी हो करके अपने विकारों के उद्गम क्षेत्र में जा करके, उनका निष्कासन कर सकता हैं , उनको निकाल सकता हैं , भव से मुक्त हो सकता हैं । अरे , ऐसा अनमोल जीवन और बाहरी बातों में बिता दें ? नहीं, अब होश जागना चाहिए । अंतर्मुखी होकर सत्य का दर्शन करें और सही माने में अपना कल्याण कर लें !