जी हाँ, दोस्तों । स्वामी अनंत श्री ने बताया है कि भय से भी मनुष्य नीखरता है । ईस दुनिया में सबसे खतरनाक चीज है- भय । लेकिन हम किसी न किसी चीज़ का भय रखते हैं, तो हम सजग रहते है । हमसे बेहतरीन काम होते हैं ।हम न चाहने पर भी सच्ची दिशा में गति करते हैं । एक बार सोच लो, अगर हमें किसीका भी भय न हो तो?,,,हमारी मनमानी बढ जाती है ।
ये प्रकृति सब कुछ ठीक करती ही रहती है । अगर हम बराबर नहीं समजते तो ये प्रकृति
' प्यार से नहीं तो मार से '
समजाती है ।हमारी भारतीय संस्कृति की प्रणाम करने की बात हैं । लेकिन हम ये बात भूल गए और समझ नहीं पाये तो प्रकृति ने हमें समजा दिया!!
भारत की सबसे पुरानी विपस्यना साधना के गुरुजी श्री गोएन्काजी बताते हैं कि, एक बार आपको किसी एक वस्तु का भय लगा । जैसे कि आपको स्कूल की परीक्षा में अच्छे नंबर नहीं मिले तो? या आपको बिमारी में बडा रोग लग गया तो? ईसके बाद जब आपको परीक्षा में अच्छे नंबर मिलें और आप स्वस्थ भी हो गए । ईसके बाद आपका भय भी खत्म हो जाता है । थोडे दिन बाद आप ओर कोई डर में लिपट जाते हैं । तो यह क्या है?
गुरुजी बता रहे हैं कि हमें , भय की जड़ों को ही नष्ट करना है जो फिर से न ऊभरें । हमारें चित्तमें जन्म-जन्मांतर से भय के बीज हम साथ लेकर आए हैं, ऊसको ही खत्म करना है । ये कैसे और कबतक खत्म होगी? ईसका उत्तर बताते हैं- निरंतर साधना से ही ये बीज जलकर भस्म हो जाएगा । हम साधना से हमारे संस्कारों को बदल सकते हैं ।
' वैराग्य शतक ' में बताया है कि, सभी भय का मूल कारण है - आसक्ति । हम हमारी आसक्तियों से ईतने चिटके हैं कि, चाहे कुछ भी हो जाय हम आसक्ति नहीं छोडना चाहते और आसक्ति से, हमें डर पेदा होता है ।
वैराग्यशतक में 9 प्रकार के भय बताये हैं ।
1) असफल होने का डर ।
2) इन्द्रियसुख खोने का डर ।
3) धन खो जाने का डर ।
4) मान - सम्मान खोने का डर ।
5) बलवान शत्रु का डर ।
6) बुढ़ापे का डर ।
7) ज्ञानी को शास्त्रार्थ-विरोधी का डर ।
8) गुणवान व्यक्ति को ईर्ष्यालुओं का डर ।
9) रोग और मृत्यु का डर ।
ये सारे डर का समाधान भी वैराग्यशतक में बताया है ।सभी भय से कैसे बच सकते है? गीताजी में भी बताया गया है कि आसक्ति से भय पेदा होता है ।
तो ये आसक्ति से कैसे छुटकारा मिले?
एक ही ऊपाय है - वैराग्य ।
वैराग्यभाव से ही आसक्तिओं का निर्मूलन होता है ।
श्रीमद भागवतम् में बताया है,
' वासुदेव भवति भक्तियोग प्रयोजिता
जनेति आशुवैराग्य ज्ञानं ज अहेतुकम् ।। '
जो भक्त भगवान की भक्ति करता है, ये दो चीजें उसमें आ जाती हैं । एक है- ज्ञान । दुसरा है - वैराग्य ।
श्रीमद भगवद्गीता में ,
' हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स ज मे प्रिय: ।
जो भक्त भयसे मुक्त है,वो ही भगवान को प्रिय है ।भगवान पर अतूट श्रध्दा रखो ।
भगवान हमें तारे या डुबाए इसमें हमारी भलाई ही होगी ।
मित्रों अंत में एक छोटी-सी कहानी,
एकबार एक गुरु अपने शिष्यों के साथ नाव में बैठकर जा रहे थे ।अचानक एक बडा तुफान आया । नाव हिलने लगी ।सभी शिष्य गभरा गए । मौत सामने दिखाई दी। जोर जोर से चिल्लाने लगे ।अपने गुरूदेव के पास आकर बोले,
गुरुजी,
शिष्यों : आप को डर नहीं लगता?
गुरुजी एकदम जोर से खडे हो गये ।
कमर में से कटार निकालकर एक शिष्य के गले पे रखकर बोले ,
क्या रे!
शिष्य गभराकर,
गुरुजी,, ये ये, ये आ आ आ प क्या कर रहे हैं?
गुरुजी: तुझे क्या डर लगता है?
शिष्य: जी हाँ , गुरुजी
गुरुजी: किसका डर?
शिष्य: ये चाकु का डर ।
गुरुजी: और मेरा? मेरा डर नहीं लगता?
शिष्य: नहीं गुरुजी, ये चाकु खतरनाक है ।
गुरुजी: और में? में खतरनाक नहीं लगता?
शिष्य: नहीं गुरुदेव, आप तो हमारे है ।हमें आप पर पुरा भरोसा है ।आप हमारा कभी बूरा नहीं कर सकते । आप हमें बचाएंगे ही ।
बस बस बस ,,
शिष्यों,
मुझे यहीं आपको बताना था ।भगवान पर पूरा भरोसा रखो ।
ये लहरें खतरनाक है जानलेवा है, लेकिन हमारा ईश्वर की प्रति भरोसा अतूट है । हमारे प्रभु बहोत दयालु है ।हमें बचायेंगे ही । हमारी रक्षा करेंगे ही ।
मित्रों,
ये कोरोना वाईरस हमारा कुछ भी नहीं बिगाडेगा । आज आप सब देख रहे हैं कि, कोरोना से मुक्त होने के लिए, हमारे देश के सारे धर्मों के लोग कितनी प्रार्थनाएं, साधनाए, तप,व्रत-उपवास और दुआएं भेज रहे हैं । हमारें धर्मगुरुओ भी हमसे हररोज ओनलाईन धर्म की बातें सुना रहे हैं ।
तो क्या?
ईसकी कोई असर नहीं होगी?
जरूर होगी । और आज हम अन्य देशों की तुलना में कितने सलामत है ।हम जानते हैं । और आगे भी हमें अपने अपनें घरों में रहकर कोरोना से लडना है, हराना है ।
अबसे एक भी पोजिटिव केस न निकले, ये हमारे ही हाथों में है ।
जय हिंद
जय भारत ।
जागृति पंड्या
आणंद ।
વાહ....શાશ્વત સુંદર
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