🌷 अधिष्ठान का माहात्म्य 🌷
🙏 मेरी प्यारी धर्म-पुत्रियो! मेरे प्यारे धर्म-पुत्रो! 🙏
तुम्हारे भीतर जो धर्म जागा है वह पुष्ट होता जाय, बलवान होता जाय! तुम्हारे भीतर जो प्रज्ञा जागी है, वह पुष्ट होती जाय, बलवती होती जाय!
लेकिन धर्म कैसे पुष्ट होता है? प्रज्ञा कैसे पुष्ट होती है ? केवल चाहने मात्र से नहीं होती। चाहते तो सभी हैं। हर समझदार आदमी, हर समझदार साधिका/साधक यह चाहता है कि मेरा धर्म पुष्ट हो जाय, मेरी प्रज्ञा पुष्ट हो जाय, मैं प्रज्ञा में स्थित हो जाऊं, स्थितप्रज्ञ हो जाऊं। लेकिन केवल चाहने से तो दो वक्त का भोजन भी नहीं मिलता। दो वक्त के भोजन के लिए भी मेहनत करनी होती है, परिश्रम करना होता है, पुरुषार्थ करना होता है। और धर्म में पक जाय! प्रज्ञा में पक जाय! और चाहे कि कामना करने से ही पक जायगा तो धोखे की बात हुई भाई! मेहनत करनी है, बहुत मेहनत करनी है।
देखता हूं, अनेक साधक-साधिकाएं किसी शिविर में शामिल होते हैं, बड़े प्रसन्न होते हैं। धर्मरस की एक बूंद भी चख लें तो प्रसन्नता आयेगी ही। धर्म चखा है न! दस दिन के लिए बुद्धिविलास करने नहीं आते, वाणी-विलास करने नहीं आते, छुट्टियां मनाने नहीं आते, पिकनिक करने नहीं आते, तपने आते हैं। तो हर व्यक्ति जो दस दिन के शिविर में आता है, वह कम या अधिक मेहनत करता ही है। और मेहनत करता है तो धर्म का रस चखता है। जो भी धर्मरस चखेगा, उसे बड़ी प्रसन्नता होगी। उसके मन में बड़ा मोद जागेगा।
लेकिन दस दिन शिविर कर लेने के बाद फिर उसे भुला दें, घर आकर सुबह-शाम, सुबह-शाम जो पुरुषार्थ करना है, वह करना बंद कर दें, तो धर्म कैसे पुष्ट होगा, प्रज्ञा कैसे पुष्ट होगी? कुछ दिनों के बाद कोई साधक मिलता है, कोई साधिका मिलती है, तो मेरे पास तो एक ही प्रश्न होता है - पूछता हूं, क्यों भाई! साधना हो रही है? क्यों बेटी! साधना चल रही है? तो उनमें से अनेक मुँह लटकाकर जबाब देते हैं - नहीं, कुछ दिन तो चली, फिर छूट गयी; कुछ दिन तो चली, फिर छूट गयी। झूठ बोलते हैं। छूट नहीं गयी, छोड़ दिया। कुछ दिन तो किया, फिर छोड़ दिया। सच्चाई यह है - छोड़ दिया, छूटी नहीं। अपने आप नहीं छूटती। हम छोड़ देते हैं तो छूटती है।
जब शिविर में आते हैं, तो समझते हैं कि भाई, यह जो दिन में तीन बार एक-एक घंटे का अधिष्ठान ले कर बैठते हो, कितना कठिन मालूम होता है। पहले दिन का अधिष्ठान, विपश्यना देते ही पहला-पहला अधिष्ठान कितनी पीड़ा पैदा करता है! एक घंटे निकालना पांव टूट बड़ा कठिन मालूम होता है। सबका अनुभव है। और फिर भी मन को मजबूत करता है - बैठना ही है मुझे घंटे भर।
और मान लो - नहीं बैठ पाया, पांव खुल गया तो अच्छा, एक बार खुल गया, दो बार खुल गया। अगली बैठक में नहीं खुलने दूंगा। फिर प्रयत्न करता है। फिर कठिनाई आती है। अगली बैठक में फिर प्रयत्न करता है, फिर कठिनाई आती है। यूं करते-करते आंठवें नौवें दिन तक पहुँचते-पहुँचते घंटे भर बैठने लगता है न! पहले ही दिन कह दें कि बहुत कठिन काम है, हमसे नहीं होता, हम तो नहीं करेगें; तो ऐसा व्यक्ति कभी घंटे भर अधिष्ठान में बैठ ही नहीं पायगा, जीवन भर नहीं बैठ पायगा।
जब शिविर में आते हैं तो दसवें दिन समझाते हैं न कि एक बरस का अधिष्ठान लेना पड़ेगा। बड़ी कठिनाई आयगी। फिर भी एक वर्ष का व्रत है मेरा, चाहे जो कुछ हो जाय, दुनियादारी के क्षेत्र में चाहे जितना नुकसान हो जाय - और नुकसान होता नहीं, कभी होता नहीं। केवल मन को दृढ़ करने की बात है। जैसे नया-नया साधक विपश्यना की शाम को पालथी मार कर बैठता है और कहता है - चाहे मेरा पांव टूट ही क्यों न जाय, मैं नहीं बदलता। टूटता नहीं न! आज तक किसी का टूटा नहीं। टूट जाय तो हम बैठाये नहीं न!
किसी का पांव तोड़ने के लिए थोड़ी विपश्यना सिखाते हैं। जानते हैं, नहीं टूटता इसीलिए कहते हैं - साल भर तक का अधिष्ठान हो और मन में यह दृढ़ संकल्प हो कि चाहे जितनी हानि हो जाय हमारी, दुनियादारी के क्षेत्र में चाहे जितनी हानि हो जाय, हम अपना अधिष्ठान नहीं तोड़ेंगे, बैठेंगे ही। तो जैसे पांव टूटता नहीं, केवल मन के संकल्प करने की बात है; ऐसे ही दुनियादारी में हानि होती नहीं।
धर्म जब हम धारण करते हैं, तो केवल परलोक के लिए नहीं करते। जो धर्म हमें केवल यह वायदा करता है कि मरने के बाद तुम्हें ये मिल जायगा, तुम्हें वो मिल जायगा; इस जीवन में तो कुछ नहीं मिलेगा, पर मरने के बाद मिल जायगा, तो समझ लेना चाहिए - धर्म-वर्म नहीं, धोखा है। सचमुच धर्म होगा तो पहले लोक सुधरेगा, परलोक बाद में सुधरेगा।
लोक सुधारने के लिए धर्म। यहीं हमारा जीवन सुधर रहा है कि नहीं? इसी जीवन में सुख-शांति आ रही है कि नहीं? हमारा लोकीय क्षेत्र अच्छा हो रहा है कि नहीं? इस मापदंड से धर्म मापा जाता है। जिसका लोक सुधरने लगा, उसका परलोक अपने आप सुधर जायगा। धर्म भी पालन करें और लोक भी बिगड़े, ऐसा होता नहीं, कभी होता नहीं।
तो बस, मन को दृढ़ करने की बात है कि चाहे जो कुछ हो जाय, यह वर्ष भर का अधिष्ठान है; मुझे वर्ष भर सुबह-शाम साधना करनी ही है। और अनेकों का अनुभव हमारे सामने है। जिस-जिस व्यक्ति ने इस प्रकार अधिष्ठान लेकर के वर्ष भर घर में अभ्यास कायम रखा, वह नहीं कहता कि छूट गया, छूट गया, क्योंकि वह छोड़ता नहीं। फिर छोड़ेगा भी नहीं, कभी नहीं छोड़ेगा। और जिसने छोड़ा उसने यह बारह महीने के भीतर ही छोड़ दिया।
दस दिन में छोड़ दिया, बीस दिन में छोड़ दिया, महीने में छोड़ दिया, दो महीने में छोड़ दिया ... तो छोड़ ही दिया। तो भाई! यह अधिष्ठान जो वर्ष-भर का लेते हो, ऐसा अधिष्ठान लेकर किसी पर एहसान तो नहीं कर रहे न! न अपने मार्गदर्शक पर एहसान करते हैं, न किसी भगवान बुद्ध पर एहसान करते हैं, न किसी अन्य देवी पर, देवता पर, ईश्वर पर, ब्रह्म पर, अल्लाहमियां पर एहसान करते हैं कि देखो! हम अधिष्ठान पूरा कर रहें हैं। भाई, एहसान अपने आप पर करते हैं न! अपने भले के लिए करना है न!
हर समझदार आदमी को समझना चाहिए कि जब मैं धर्म धारण करता हूं, तो जो लोक मंगल होगा सो तो होगा ही, मेरा मंगल तो होने ही लगा, तत्काल होने लगा। लोक कल्याण होगा सो तो होगा ही, पर मेरा कल्याण तो होने ही लगा; तत्काल होने लगा। आत्ममंगल होने लगा तो सर्व मंगल होने ही लगेगा। आत्मोदय होने लगा तो सर्वोदय होने ही लगेगा। तो किसी पर एहसान नहीं कर रहे, अपने मंगल के लिए, अपने कल्याण के लिए मन को दृढ़ करना है।
कल्याण मित्र,
✍ सत्य नारायण गोयनका
(लक्खमसी नप्पू हॉल, बम्बई - जुलाई २०, १९८६)
विपश्यना पत्रिका संग्रह, मार्च 2017 में प्रकाशित।
भवतु सब्ब मगंलं !!
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શીલ....! સમાધિ....! પ્રજ્ઞા...!
"छोटी सी यह तस्तरी भरे बुद्ध का ज्ञान ।
फैले सारे विश्व में होय परम कल्याण।।"
2600 વર્ષ પુરાણી ભગવાન બુદ્ધની સાધના જે કાળક્રમે ભારતવર્ષમાં વિલુપ્ત થઈ ગયેલી પરંતુ બર્મામાં એ થોડા લોકો પાસે ટકી રહેલી.એ "વિપશ્યના "સાધનાને..... કલ્યાણમિત્ર ગુરુજી સત્યનારાયણ ગોયેન્કા 1955 શીખ્યા. અને 14 વર્ષની તપશ્ચર્યા પછી 1969માં ભારતમાં લાવ્યા.એનો પહેલો શિબિર મુંબઈમાં લગાવ્યો.1976માં ઈગતપુરીમાં નિવાસી સાધનાકેન્દ્ર બન્યું.અને અત્યારે વિશ્વમાં 1500 આચાર્યશ્રીઓ દ્વારા 51 ભાષાઓમાં 206 નિવાસી સાધનાકેન્દ્રો કાર્યરત છે.જેમાં 10,20,30,45,અને 60 દિવસીય નિવાસી શિબિરોમાં એક લાખથી વધારે સાધકો સાધના કરે છે.
સવારે 4-00 થી રાતે 9-30 સુધીની દિનચર્યામાં 10 કલાક તો ફક્ત પલાંઠી વાળીને બેસીને ધ્યાન કરવાનું છે."પંચશીલ"નું કડકાઈ પૂર્વક પાલન કરવાનું હોય છે.જૂઠું ન બોલવું,ચોરી ન કરવી,બ્રહ્મચર્ય પાળવું,વ્યસન ના કરવું અને જીવહિંસા ન કરવી.દસ દિવસીય હોય કે વીસ દિવસની મૌન તો પાળવાનું જ હોય છે.
ચોથા દિવસે' વિપશ્યના' અપાય છે.એનો પૂરતો અભ્યાસ થયા પછી દસમાં દિવસે.'મંગલ મૈત્રી' આપે ત્યાર પછી સાધકનું મૌન પુરું થાય છે.
આપણને મનની ભીતર શાંતિ અને સમતાનો અનુભવ થાય તથા મનને નિર્મળ બનાવે છે.મનની વ્યાકુળતા અને અશાંતિ દૂર થતાં ઘણી જાતના મનોશારીરિક રોગો દૂર થાય છે.અને સુખની પ્રાપ્તિ થાય છે.
15/3 થી 26/3 દરમિયાન આ સાધનાનો ભરપૂર લાભ લીધો.કોઈ પણ દાર્શનિક પરંપરા,ધર્મ કે સંપ્રદાયની માન્યતાઓથી મુક્ત આ સાધના કોઈ પણ કરી શકે.
દસદિવસીય શિબિર પછી મૌન ખુલ્યું અને મોબાઇલ હાથમાં આવ્યો છે, ત્યારે મારી અંતરયાત્રાનો થોડો આનંદ તમને પણ વહેંચું.
મારી એક ગઝલમાં ત્રણેક નાનકડા સુધારા સાથે વિષયને સુસંગત છે એટલે મૂકું છું.
¤¤¤¤!! ભવતુ સબ્બ મંગલં !!¤¤¤¤
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અભ્યાસ કર ને જો પછી.
જાત સાથે વાત કર,વિશ્વાસ કર ને જો પછી,
આ રમત તો છે કઠિન,અભ્યાસ કર ને જો પછી.
એમ અર્થો ના મળે તું ધ્યાન કર, સંવાદ કર,
ભીતરે આતમ તરફ જઇ વાસ કર ને જો પછી.
આપણી અંદર વસે છે હું અને મારું બધું,
એ ફગાવી દે પછી વનવાસ કર ને જો પછી.
જો જરી ચૂકી ગયા તો, ત્યાં નિરાશા પરહરી,
એ યથાતથ જો ફરીથી,પ્રાસ કર ને પછી.
આમ જો સમ્યકપણાંથી મોજ છલકાતી મળે,
ભાવ મૈત્રીનો બધા પર ગ્રાસ કર ને જો પછી.
નાદ ગુંજે જો સતત ભીતર જરા સંભાળ કર,
બસ પરમનો હરપળે અહેસાસ કર ને જો પછી.
@ નૈષધ મકવાણા ~વડોદરા.
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