*गुरुदेव के साथ प्रश्नोत्तर*
कोल्हापुर (महाराष्ट्र) के एक साधक ने अपने पत्र में कुछ सामान्य प्रश्न उठाए हैं जो सभी साधकों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। अतः प्रश्नोत्तर नीचे प्रस्तुत है-
*प्रश्न:- साधना के दौरान विचार तो मन में आते ही हैं - कभी चिन्ताओं के, कभी अपने कर्तव्यों के संबंध में, कभी जीवन के किसी अन्य भाग पर अथवा किसी ज्वलंत समस्या पर - इनकी अवहेलना कर दें या इन पर गहनता से चिंतन-मनन करें? मेरी समझ में तो इनमें अधिक रस लेना अथवा दमन करना दोनों ही भूल होगी। इस पर प्रकाश डालने की कृपा करें!*
उत्तर:- साधना करते समय जो भी विचार आय उसे गौण मान कर उपेक्षा करें। उस समय साधना यानी संवेदनाओं के प्रति समताभाव रखने को ही प्रमुखता दें। यदि कोई विचारणीय प्रश्न हो तो उस पर साधना के पश्चात चिंतन कर सकते हैं।
*प्रश्न:- शरीर के किसी अंग में संवेदनाओं का निरीक्षण करते समय शरीर के भीतर भी कुछ होता हुआ प्रतीत होता है। क्या इनकी अवहेलना करें? अथवा उस समय की प्रतीक्षा करें जब वहां की संवेदनाएं और प्रत्यक्ष हो जायँ?*
उत्तर:- संवेदनाओं का निरीक्षण करते समय शरीर की गहराई में कोई अनुभूति हो तो थोड़ी देरके लिए रुककर उसकी स्पष्ट जानकारी कर सकते हैं और फिर अपने निश्चित क्रम में लग सकते हैं। बहुत देर तक रुके रह जायँ तो चित्त में अस्थिरता आने का खतरा रहता है। अतः उस ओर से सजग रहें।
*प्रश्न:- विपश्यना वैसे तो शरीर में संवेदनाओं को देखना ही है। पर मान लें कि मुझे किसी समस्या का समाधान करना है। तो क्या मैं सामान्य विपश्यना करने के पश्चात उसी आसन पर बैठे-बैठे समस्या पर गहराई से चिंतन कर लूँ? जब मैं ऐसा करता हूँ तब शरीर के किसी अंग में, साधारणतः सिर में संवेदनाएं मालूम होती रहती हैं। तो क्या इन संवेदनाओं को ध्यानपूर्वक गहराई से देखते हुए संबंधित समस्या के विचार को मन में आने दें?*
उत्तर:- साधना के पश्चात किसी समस्या पर चिंतन करने में कोई दोष नहीं। उस समय संवेदनाएं मालूम होंगी परंतु उनकी उपेक्षा कर मूल समस्या के चिंतन-मनन को ही प्राथमिकता दें।
*प्रश्न:- ध्यानमें किसी अंग-विशेष पर संवेदनाओं का निरीक्षण करते-करते किसी नजदीकी अथवा दूरस्थ अंग में भी संवेदना उठे तो ऐसे में क्या करना चाहिए?*
उत्तर:- साधना के समय किसी अंग-विशेष का निरीक्षण करते समय अन्य अंगों में हो रही संवेदना की उपेक्षा करें और उसकी बारी आने पर ही उसे महत्त्व दें। अन्यथा क्रमबद्ध निरीक्षण कर पाना असंभव हो जायगा।
*प्रश्न:-कभी जीवन के किसी प्रश्न पर खुली आंखों विचार-विमर्श करते समय या किसी गंभीर समस्या पर किसी की बातें सुनते समय सिर में इतनी तीव्र
संवेदनाएं प्रकट होती हैं कि कभी-कभी तो समस्या के स्थान पर उन्हीं पर मन खिंच जाता है। कृपया बताएं कि उस वक्त क्या करें?
उत्तर:- दैनिक जीवन की जिम्मेदारी का काम करते समय यदि संवेदना महसूस होने लगे तो उसकी उपेक्षा करें और सारा ध्यान काम पूरा करने में ही लगाएं। इससे कठिनाई दूर होगी और काम में सफलता मिलेगी। मन दोनों ओर रहेगा तो काम में सफलता मिलने में कठिनाई होगी।
*प्रश्न:- मुझे शरीर के किसी छोटे से भाग पर मन एकाग्र करना अधिक आसान प्रतीत होता है। जैसे पूरे कान की बजाय कान के किसी एक भाग पर । क्या ऐसा करना ठीक है?*
उत्तर:- सामान्यतः किसी छोटे भाग पर मन टिकाना कठिन होता है। मन ऊबने लगता है। परंतु यदि टिका सकते हों तो अच्छी बात है, अवश्य टिकाएं।
- वर्ष १० मुंबई: बुद्धवर्ष २५२४ आषाढ (अधिक) पूर्णिमा (शक) दि. २८-६-१९८० अंक १३
पुस्तक: विपश्यना पत्रिका संग्रह (भाग-3)
विपश्यना विशोधन विन्यास ।।