Tuesday, 25 May 2021

उपोसथ - व्रत




🌹🌹🌹🌹 "उपोसथ-व्रत" 🌹🌹🌹🌹
                 ( पूर्णिमा/अमावस )
         🙏उपासक/उपासिका-विधि🙏

🙏 प्रात:काल उठकर नहा-धोकर घर में बुद्ध-प्रतिमा या चित्र, या बुद्ध-प्रतीक (पीपल-वृक्ष या बरगद-वृक्ष) के सम्मुख जाकर बैठे, अपने साथ - मोमबत्ती/दीया, अगरबत्ती, धूपबत्ती, फूल व फूल-माला, पानी सहित एक लोटा, सफेद-मोटा-धागा अवश्य रखे । 

🔸मोमबत्ती/दीया को प्रज्वलित करके बुद्ध प्रतीक के सम्मुख रखें, 
🔸अगरबत्ती-धूपबत्ती को जला-बुझाकर सुगंध फैलाने के लिये बुद्ध प्रतीक के सम्मुख रखें, 
🔸पानी से भरे लोटे में तीन/पॉच-पीपल/बर्गद-वृक्ष-की-पत्तियों को डाल दें, 
🔸अब सफेद-मोटे-धागे के एक सिरे को पानी के लोटे से बांध/डाल दें और सफेद-मोटे-धागे को सबसे पहले बुद्ध-प्रतीक के आगे से ले जाकर बुद्ध-प्रतीक के पीछे से घुमाते हुये समस्त उपस्थित, इच्छुक उपासकों/उपासिकाओं के कर-बद्ध 🙏 हाथों के अंगुठे व अंगुलिओं के बीच से मे पकडा़ते हुये सफेद मोटे धागे के दूसरे सिरे को भी पानी से भरे उसी लोटे में डाल दें ।

🔸अब बुद्ध-प्रतीकों को नमन 🙏 करें ।
🔸नमन-विधि (उच्चारण करें) - 

नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।।
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स ।। 

                  साधु!साधु!!साधु!!!
                       🙏🙏🙏 

🙏 बुद्धानुस्सति 🙏 

"इतिपि सो भगवा अरहं सम्मासम्बुद्धो विज्जाचरणसम्पन्नो सुगतो लोकविदू अनुत्तरो पुरिस-दम्म-सारथी सत्था देवमनुस्सानं बुद्धो भगवा'ति ।" 

🙏 धम्मानुस्सति 🙏 

"स्वाक्खातो भगवता धम्मो सन्दिट्ठिको अकालिको एहिपस्सिको ओपनेय्यिको पच्चत्तं वेदितब्बो विञ्ञूही'ति ।" 

🙏 संघानुस्सति 🙏 

"सुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो, उजुप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो, ञायप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो, सामीचिप्पटिपन्नो भगवतो सावकसङ्घो, यदिदं चत्तारि पुरिसयुगानि अट्ठपुरिसपुग्गला एस भगवतो सावकसङ्घो, आहुनेय्यो पाहुनेय्यो दक्खिणेय्यो अञ्जलिकरणीयो अनुत्तरं पुञ्ञक्खेत्तं लोकस्सा'ति।" 

                  साधु!साधु!!साधु!!!
                       🙏🙏🙏 

                       🌹ति सरणं🌹
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा समबुद्धस्स ।  
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा समबुद्धस्स ।  
नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मा समबुद्धस्स । 

               बुद्धं सरणं गच्छामि । 
               धम्म सरणं गच्छामि । 
               संघं सरणं गच्छामि । 
  दुतियं-पि बुद्धं सरणं गच्छामि । । 
  दुतियं-पि धम्म सरणं गच्छामि । ।
  दुतियं-पि संघं सरणं गच्छामि । । 
  ततियं-पि बुद्धं सरणं गच्छामि । । । 
  ततियं-पि धम्म सरणं गच्छामि । । । 
  ततियं-पि संघं सरणं गच्छामि । । । 

                    🌹पञ्च सीलं🌹 

पाणा-ति-पाता वेरमणी सिक्खापदं समादियामि। 
अदिन्ना-दाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामि । 
कामेसु-मिच्छा-चारा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि । 
मुसा-वादा वेरमणी सिक्खापदं समादियामी । 
सुरा-मेरय-मज्ज पमाद-अट्ठाना वेरमणी सिक्खापदं समादियामी । 

🔸साधु ! 🔸साधु ! ! 🔸साधु ! ! ! 

भवतु सब्ब मङ्गलं रक्खन्तु सब्ब देवता 
सब्ब बुद्धानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तु'ते ।। 

भवतु सब्ब मङ्गलं रक्खन्तु सब्ब देवता 
सब्ब धम्मानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तु'ते ।। 

भवतु सब्ब मङ्गलं रक्खन्तु सब्ब देवता 
सब्ब संघानुभावेन सदा सोत्थि भवन्तु'ते ।। 

                  साधु!साधु!!साधु!!!
                       🙏🙏🙏
🌷
न'त्थि मे सरणं अञ्ञं, बुद्धो मे सरणं वरम् ,
ऐतेन सच्च-वज्जेन वढ्ढेय्यं सत्थु-सासने ।
बुद्धं मे वन्दमानेन यं पुण्णं पसुतं इध ,
सब्बे पि अन्तराया मेमाहेसुं तस्स तेजसा ।। 

न'त्थि मे सरणं अञ्ञं, धम्मो मे सरणं वरम् ,
ऐतेन सच्च-वज्जेन वढ्ढेय्यं सत्थु-सासने ।
धम्मं मे वन्दमानेन यं पुण्णं पसुतं इध ,
सब्बे पि अन्तराया मेमाहेसुं तस्स तेजसा ।। 

न'त्थि मे सरणं अञ्ञं, संघो मे सरणं वरम् ,
ऐतेन सच्च-वज्जेन वढ्ढेय्यं सत्थु-सासने ।
संघं मे वन्दमानेन यं पुण्णं पसुतं इध ,
सब्बे पि अन्तराया मेमाहेसुं तस्स तेजसा ।। 

                  साधु!साधु!!साधु!!!
                       🙏🙏🙏 

(तदुपरांत उच्चारण करते हुए उपासथ-व्रत कि शपथ लें 👇👇👇) -
            
भगवान् तथागत गोतम बुद्ध ने कहा है -
"अब मैं तुम्हें गृहस्थ-धम्म बताता हूं, जैसा कि करने वाला सावक अच्छा होता है। जो सम्पूर्ण भिक्खु धम्म है, उसका पालन सपरिग्रही (गृहस्थ=उपासक/उपासिका) से नहीं किया जा सकता ।। 

संसार में जो स्थावर और जंगम प्राणी हैं, न उनको जान से मारे, न मरवाये, और न तो उन्हें मारने की अनुमति दे। सभी प्राणियों के प्रति दण्ड त्यागी हो।। 

तब दूसरे की समझी जाने वाली किसी चीज को चुराना त्याग दे, न चुराये, और न चुराने वाले को अनुमति ही दे। सभी प्रकार की चोरी को त्याग दे।। 

जानकार पुरुष जलती हुई आग के गड्ढे की तरह अपब्बजित जीवन को छोड़ दे। पब्बजित जीवन का पालन न कर सकने पर भी पर (पराई) स्त्री/पुरूष का सहवास न करे।। 

सभा या परिषद् में जाकर एक दूसरे के लिए झूठ न बोले, न तो (स्वयं झूठ) बोले और न बोलने वाले को अनुमति दे। सब प्रकार के असत्य-भाषण को त्याग दे।। 

जो गृहस्थ इस धम्म को पसन्द करता हो, वह 'यह उन्मादक है' ऐसा जानकर शराब का पान न करे, न पिलावे और न पीने वाले के लिए अनुमति दे।। 

मूर्ख लोग मद के कारण बुरे कर्म करते हैं और दूसरे प्रमादित लोगों से कराते भी हैं। बुरे कर्म के घर को त्याग दो, जो उन्मादक है, मोहक है, और मूर्खों को प्रिय है।। 

जीव-हिंसा न करे, चोरी न करे, झूठ न बोले और न शराब पिये। अपब्बजित जीवन और मैथुन से विरत रहे और रात्रि में विकाल भोजन न करे।। 

आठ अंगों वाला (अट्ठांगिक-उपोसथ) न माला धारण करे, न गंध का सेवन करे, चौकी, भूमि या जमीन पर सोये । इसे उपोसथ कहते हैं। दुख पारंगत बुद्ध द्वारा यह प्रकाशित किया गया है।। 

प्रत्येक पक्ष की चतुदशी, पूर्णिमा, अट्ठमी और प्रतिहार्य पक्ष को प्रसन्न मन से अट्ठांग उपोसथ का पूर्णरूप से पालन करना चाहिए।। 

तब जानकार पुरुष सुबह उपोसथ ग्रहण कर अपनी शक्ति के अनुसार सद्धापूर्वक अनुमोदन करते हुए प्रसन्नता से भिक्खुसंघ को अन्न और पेय का दान दे।। 

धम्म से माता-पिता का पोषण करे, किसी धम्मिक कार्य में अपने को लगाये। जो अप्रमत्त गृहस्थ इस व्रत का पालन करता है, वह स्वयंपभ नामक (स्वर्ग) लोक में उत्पन्न होता है।" 

(फिर उच्चारण करें) -
"मैं अट्ठंगिक-उपोसथ-व्रत को धारण-कर पूर्ण-रूप से पालन करने की शपथ लेता/लेती हूँ" । 

(अट्ठंगिक-उपोसथ-व्रत को धारण करने के बाद महामङ्गल-सुत्त का उच्चारण करें) -
👇
                 🌹महामङ्गल सुत्तं🌹 

भगवन्तं गाथाय अज्झभासि - 

" बहू देवा मनुस्सा च , मङ्गलानि अचिन्तयु ।
आकङ्घमाना सोत्थानं , ब्रूहि मङ्गलम् उत्तमं"। 

" बहु देवा मनुस्सा च , मगलानि अचिन्तयुं । 
आकंखमाना सोत्थानं , ब्रूहि मङ्गलम् उत्तमं " ।। 

" असेवना च बालानं , पण्डितानं च सेवना । 
पूजा च पूजनीयानं , एतं मङ्गलम् उत्तम ।। 

"पति-रूप-देस-वासो च , पुब्बे च कतपुञ्ञता ।
अत्त-सम्मा-पणिधि च , एतं मङ्गलम् उत्तमं । । 

"बाहु-सच्चं च सिप्पं च, विनयो च सु-सिक्खितो। 
सु-भासिता च या-वाचा , एतं मङ्गलम् उत्तम । । 

"माता-पितु उपट्ठानं , पुत्त-दारस्स सङ्गहो । 
अनाकुला च कम्मन्ता , एतं मङ्गलम् उत्तमं । । 

"दानं च धम्म-चरिया च , ञातकानं च सगहो । 
अनवज्जानि कम्मानि , एतं मङ्गलम् उत्तमं । । 

"आ-रति वि-रति पापा , मज्ज-पाना च संयमो ।
अप्पमादो च धम्मेसु , एतं मङ्गलम् उत्तमं । । 

"गारवो च निवातो च , सन्तुट्ठी च कतञ्ञुता ।
कालेन धम्म-सवणं , एतं मङ्गलम् उत्तमं । । 

"खन्ती च सोव-चस्सता , समणानं च दस्सनं । 
कालेन धम्म-साकच्छा , एतं मङ्गलम् उत्तमं । । 

"तपो च ब्रह्मचरियं च , अरिय-सच्चान दस्सनं । 
निब्बाण-सच्छि-किरिया च, एतं मङ्गलम् उत्तमं। 

"फुट्ठस्स लोक-धम्मे-हि , चित्तं यस्स न कम्पति ।
असोकं विरजं खेमं , एतं मङ्गलम् उत्तम । । 

एतादिसानि कत्वान , सब्बत्थम-पराजिता ।
सब्बत्थ सोत्थिं गच्छन्ति , तं तेसं मङ्गलम् उत्तमन्ति "।। 

            🌲महामङ्गलसुत्तं निट्ठितं🌲 

(तदुपरांत) सफेद-मोटे-धागे को उपस्थित इच्छुक उपासक/उपासिकाओं के कर-बद्ध हाथों से निकाल कर समेट लें, व 

🌹सब्बीतियो विवज्जन्तु , 
                         🌹सब्ब-रोगो विनस्सतु । । 
🌹मा ते भवत्वन्त-रायो , 
                        🌹सुखी दीघायु-को भव । ।
(अनुवाद)
🌹आपकी सभी विपदायें समाप्त हों, 
       🌹आपके सभी रोग विनाश को प्राप्त हों,
🌹आपके मार्ग कि बांधाओं का अंत हो, 
              🌹आप सुखी-दिर्घायू को प्राप्त हों।)
सुत्त का उच्चारण करते हुए, उपोसथ में सम्मिलित समस्त इच्छुक उपासक/उपासिका के दाया (सीधे) हाथ में उस सफ़ेद-मोटा-धागा (परित्त-बंधन = रक्षा-बंधन) को बांधकर कैंची से काटते जाये । ताकि उपासक/उपासिका का ध्यान जब भी अपने दायें हाथ पर बंधे परित्त-बंधन पर जाये, तो उसे "उपोसथ" में लिए गये आठ-सील स्मृत हो जाऐं । 

(अंत में) "महामङ्गल-सुत्त" का प्रादेशिक में, अनुवाद अवश्य सुनाऐं ! 

(अनुवाद - )
                🌹महा-मङ्गल-सूत्त🌹 

🙏 यह निवेदन किया - 

1. " बहुत से देवता एवं मनुष्य , 
      अपने कल्याण हेतु , 
      मङ्गलकामना किया करते हैं , 
      कृपया ( उन पर अनुकम्पा करते हुए )
      किसी उत्तम मङ्गलपाठ का निर्देश करें " । 

( भगवान् बोले - ) 
२ . " मूर्खों की संगत न कर ,
        पण्डित (बुद्धिमान्) की संगत करना, 
        पूजनीय की ही पूजा करना - 
                   - यही उत्तम मङ्गल है
३ . अनुकूल देश में रहना , 
      पूर्वजन्म में किया हुआ पुण्य , 
       किसी भी विषय पर अपना उचित निश्चय
       करने की क्षमता प्राप्त करना - 
                    - यही उत्तम मङ्गल हैं । । 
४ . बहुश्रुत होना (अतिशय विद्वत होना) 
     शिल्प (आजीविका के सम्मानित साधन
     प्राप्त करने हेतु) सीखना ,  
     सुशिक्षित होना , 
     मधुर एवं प्रिय वाणी बोलना -
                  - यही उत्तम मङ्गल हैं । 
५ . माता - पिता की सेवा करना , 
     बच्चों एवं पत्नी/पति आदि का संरक्षण
     करना ,
     कुल-विनास के कर्म न करना - 
                  - यही उत्तम मङ्गल हैं । 
६ . दान देना , धर्माचरण करना ,
     ज्ञातिजनों ( परिजनों ) का संरक्षण करना ,
    आजीविका के साधनों को समाप्त न करना
     (निर्दोष कार्य करना) -
                  - यही उत्तम मङ्गल हैं । 
७ . पापों से दूर रहना , पापों का त्याग करना , 
   मद-पान में संयम , आलस/भूल न करना
   ( धर्माचरण में सदा सावधान रहना)- 
                     - यही उत्तम मङ्गल हैं । 
८ . वृद्धों का सम्मान ( गौरव ) , एकान्तवास ,
   अपने कृत एवं प्राप्त पर सन्तोष करना , 
   किसी के द्वारा किये उपकार के प्रति कृतज्ञता
   प्रकट करना , 
   समय पर धर्म-प्रवचन सुनना तथा उसका
   अभ्यास करना - 
                    - यही उत्तम मङ्गल हैं । 
९ . किसी के द्वारा कृत अपकार (दोष) को
    क्षमा करना , सबके सम्मुख विनम्रता , 
    समण (बौद्ध-भिक्खु) के दर्शन , 
     समय समय पर धर्म का साक्षात्कार करना-
                  - यही उत्तम मङ्गल हैं । 
१० . तपस्या , ब्रह्मचर्य का पालन करना , 
      चार अरिय-सच्चं (आर्य-सत्यों) का
      दर्शन करना (मनन एवं निदिध्यासन), 
     निब्बान का साक्षात्कार करना - 
                 - यही उत्तम मङ्गल हैं ।
११ . जिस पुरुष का चित्त लोकधर्म ( सुख -
         दुःख , यश - अपयश , हानि - लाभ ,
         निन्दा प्रशंसा ) से सम्पर्क होने पर भी
         कुछ भी विचलित नहीं होता ; 
         शोकरहित , 
         निर्मल एवं आनन्दमय ही रहता है - 
                      - यही उत्तम मङ्गल है । 
१२ . ऐसे ( उपर्युक्त ) कर्म करने वाले सत्पुरुष
       स्वयं को सर्वत्र अपराजित ( विजयी )
       अनुभव करते हैं , 
       उनका सर्वत्र कल्याण होता है ;
       यह उनके लिए -
                              - उत्तम मङ्गल है " । 

🔸तदुपरांत अन्न-दान सामर्थ्य-अनुसार कर सकते हैं ।
🔸स्वयं भी भोजन ग्रहण करें ।
🔸दान किसी गरीब-निर्धन-असहाय-बृद्धजन व भिक्खु को कर सकते हैं ।
🔸खीर व खिचड़ी बना कर दान कर सकते हैं । 

{खीर-दान व यवागू-दान (खिचड़ी-दान)} 

🔸खीर व खिचड़ी में औषधिय तत्व होते हैं। जाऊर या तस्मई या यवागू या यागू या खिचड़ी सब पर्यायवाची शब्द हैं। पतली खिचड़ी में दस-गुण देखकर, अन्धकविन्द, राजगह में भगवान् तथागत गोतम बुद्ध ने यवागू (यागू = खिचड़ी) की अनुज्ञा की थी । इसलिए इनका दान करना चाहिए । 

भगवान् ने कहा :-
"उपासक! खिचड़ी के दस महात्म्य हैं। दस गुण हैं- 

🔸1. खिचड़ी देने वाला आयु का दाता होता है।
🔸2. खिचड़ी देने वाला वर्ण, रूप का दाता होता है।
🔸3. खिचड़ी देने वाला सुख का दाता होता है।
🔸4. खिचड़ी देने वाला बल का दाता होता है।
🔸5. खिचड़ी देने वाला प्रतिभा का दाता होता है।
🔸6. उसकी दी खिचड़ी से क्षुधा शान्त होती है।
🔸7. उसकी दी खिचड़ी प्यास का शमन करती है।
🔸8. उसकी दी खिचड़ी वायु को अनुकूल करती है।
🔸9. खिचड़ी पेट को साफ करती है।
🔸10. खिचड़ी न पचे को पचाती है।"
" खिचड़ी के ये दस गुण हैं। जो संयमी, श्रद्धालु दूसरे के दिये भोजन करने वालों को समय पर सत्कारपूर्वक यवागू का दान करता है, उसे ये दस फल मिलते हैं- 

🔹1. आयु
🔹2. रूप-वर्ण 
🔹3. सुख 
🔹4. बल
🔹5. प्रतिभा उत्पन्न होती है।
🔹6. क्षुधा शान्त होती है।
🔹7. प्यास शान्त होती है।
🔹8. वायु विकार नहीं होता, वायु अनुकूल रहती है।
🔹9. पेट का शोधन होता है।
🔹10. पाचन ठीक रहता है।" 

भगवान ने यह भी कहा कि यह औषधि तुल्य है। दिव्य सुख की चाह रखने वाले और सौभाग्य की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को खिचड़ी का दाता होना चाहिए। 

🙏 उपरोक्त समस्त विधि को प्रात: 11:00 बजे से पूर्व पूर्ण कर लेना चाहिए, ताकि पूर्वाह्ण से पूर्व ही उपोसथ-व्रत लेने वाले लोग भोजन ग्रहण करके बाकी बचे समय में, 

उपोसथ वाले दिन -
🔸"सिगालोवाद सुत्त" , 
🔸"महानाम सुत्त" , 
🔸"हत्थक सुत्त" , 
🔸"व्यग्घपज्ज" ,
🔸"माघ सुत्त" ,
🔸"दान सुत्त" ,
🔸"पराभव सुत्त" ,
🔸"थपति सुत्त" ; 
🔸आदि-आदि सुत्त जो 
🔹उपासकों/उपासिकाओं को कहें गये सुत्तं हैं उनको दिन-रात मनोसात करते हुए गुजारें । 

🙏रात्रि में भोजन न करें, रात्रि में कुछ पेय-पदार्थ आवश्यकता होने पर ले सकते हैं । 

सबका मंगल हो 👌👌👌 

भवतु सब्ब मंङ्गलं !! 
🙏🙏🙏

પણ, તમે મારા પપ્પા છો એટલે !!! તો ,એ પણ મારા બાપ છે : તે કેમ ભૂલી ? 🌺🙏( માસિક શ્રધ્ધાંજલી)🙏🌺





પણતમે મારા પપ્પા છો એટલે. તો ,એ પણ મારા બાપ છે : તે કેમ ભૂલી ?


        આજે સ્વ. શ્રી નરેન્દ્ર પંડ્યાની પ્રથમ માસિક શ્રધ્ધાંજલી અર્પણ અર્થે,,,, કોરોનાનો ભોગ બનેલાં અને અંતિમ શ્વાસ સુધી ઝઝુમેલા સ્વ. જાદુગર પંડ્યાજીની  સારવાર અર્થે હોસ્પિટલ માં હતાં તે સમયની વાતો યાદ કરીને શ્રધ્ધાંજલી અર્પણ કરું છું.


      અશ્રુઓ સારો નહીં, આગ થૈ ને વાગશે,

      ને કફનમાં યાદ ના , ગૂંગળાવે છે કબર,

      મોત ની કોને ખબર?, તા-કયામત બોલશે,

       ના અઝાબો છોડશે, મોત પરવારી જશે.


                           -   ડો.ફિરદૌસ દેખૈયા


        અચાનક જ ભાભીનો કૉલ  આવ્યો કે પપ્પાને કોરોના પોઝિટિવ રિપોર્ટ આવ્યો છે. આટલું સાંભળતાં  મને ખૂબ જ ગભરામણ થઈ ગઈ, હૃદયના ધબકારા અને કાનના અવાજો વધી ગયાં સાથે સાથે શરીર એકદમ જ ઢીલું અને અશક્ત બની ગયું. શાળામાં છૂટવાના સમયે સમાચાર જાણ્યા તો ખૂબ જ કઠણ હ્રુદય રાખી સ્ટાફનાં બધાંને વાત કરી , ઝડપથી ઘરે આવી તરત જ મમ્મીને કૉલ કર્યો. મમ્મી સાથે વાત કરી પછી થોડી શાંતિ થઈ પણ ચિંતા તો હતી જ કારણકે મોટો ભાઈ પપ્પાને સી. ટી. સ્કેન રિપોર્ટ કરાવી પપ્પા માટે કોઈ હોસ્પિટલમાં એક બેડ ની સગવડમાં હતો. સવારની વાત આખો દિવસ મોટો ભાઈ આકરા તાપમાં અને બધાં જ ભૂખ્યાં - તરસ્યાં એક દવાખાને થી બીજે દવાખાને લઈને ફરતો. કોઈને જમવાનો કે પાણી પીવાનો પણ મોકો ન મળ્યો. બસ , એક જ લક્ષ્ય, એક બેડ મળી જાય. સાથે સાથે મમ્મીની અને ભાઈની પણ ચિંતા કે પપ્પા ને લઈને ફરતાં બંને બિમાર ન પડે ! અંતે ઘણી બધી ઓળખાણો અને ઓળખીતાઓ ને ફોન કરીને મોડાસા સાંજે પાંચ વાગ્યે પપ્પાને એડમિટ કર્યાં. પછી બધાંને હાશ થઇ. 


      બીજી બાજુ નાનો ભાઈ પણ આખા ગુજરાતમાં ફર્યો અને રેમડેસિવિર ઇન્જેક્શન ની સગવડ કરી, રાત્રે મોડાસા આવી તાત્કાલિક ઇન્જેક્શન આપી  રાત્રે ને રાત્રે જ પાલનપુર બીજા ઇન્જેક્શન માટે ગયો, બીજા દિવસે પરત મોડાસા.


       કોરોના પેશન્ટ સાથે રહી ન શકાય, મળી પણ ના શકાય છતાં પણ બંને દીકરાઓ કોરોના પોઝિટિવ બાપની સાથે સતત ખડે પગે ઊભા રહ્યાં. કેમ ? કેમ કે પપ્પાને તકલીફ હતી , દવાઓ લેવાનું અને બધું જ સમય સરની દવાઓ લેવાનું ભૂલી જતાં. પપ્પા પાસે રહેવું પડશે તે ખ્યાલ આવતાં, અમારાં  ફેમિલીની ડૉ. જૈના પંડ્યા, મોટાભાઈની દીકરીએ  તરત જ તેના પપ્પા, કાકા અને બા પણ અવારનવાર જતાં હોઇ હેન્ડ ગલોઝ,ppe kit અને ફેસ શિલ્ડની સાથે અન્ય દવાઓ અને જરૂરી સામગ્રી મોકલી આપી.


      દાદા સાથે સતત સંપર્કમાં રહેતાં બન્ને ભાઈઓની બધાં જ ચિંતિત રહેતાં. વિડિયો કૉલ અને કૉલ વખતે પણ સૌ કુટુંબીજનો બન્ને ભાઈઓને કેર લેવાની સલાહો આપ્યાં કરતાં.


       નાના ભાઈની દીકરી ઋચા પણ એક્વાર સ્પેશિયલ ગાડી લઈને ઇન્જેક્શન આપવા આવી હતી. બધાં જ બધું જ કામ ખૂબ જ સાચવીને અને કોરોના વાઇરસ માટેનાં પ્રોટેક્શન સાથે કરતાં. 


       ઉંમર લાયક હોવા છતાં પણ, મમ્મી દર આંતરે દિવસે દવાખાને પ્રોટેક્શન સાથે જતી.


        એ જ રીતે ઋચા અવારનવાર તેના પપ્પા ને ટોક્યા કરતી, " પપ્પા માસ્ક બરાબર નાક ઉપર ચઢાવો, સેનીટા ઇઝર લગાવો, ppe કીટ કેમ નથી પહેરી ? જાઓ પહેરી આવો, હું તમારી સાથે વાત નહીં કરું ! " અને ગુસ્સો કરી ફોન કટ કરી દેતી. આ રીતે સતત જ આ દિકરીઓ તેમના પપ્પાની ચિંતામાં  સખત ટોક્યા કરતી. ( બંને ભાઈઓને દવાખાને પપ્પાની રિકવરી નું ટેન્શન, અન્ય જે સમસ્યાઓ ઊભી થતી તેનું ટેન્શન , પોતાની જાતને સાંભળીને કામ કરવાનું ટેન્શન અને આ દીકરીઓએ તેમના પપ્પાને સાચવવા માટે કરી મૂકેલ કાગારોળ નું પણ ટેન્શન !!!! ) 


      આ બધી ચિંતાઓ વચ્ચે એક દિવસ ભાવેશે ઋચાને કહ્યું  :

    

" તું શું કામ આટલી બધી ચિંતા કરે છે ? હું ભણેલો છું કઈ કઈ કાળજી રાખવી તે હું જાણું છુ. ઉપરાંત મેં વેક્સિનના બંને ડોઝ પણ  લીધાં છે. શું કામ તું વધારે પડતી ચિંતાઓ કરી અમને ખલેલ પહોંચાડે છે ? " 


     ઋચાએ કહ્યું : 


         "  કેમકે તમે મારા પપ્પા છો ને માટે !!!! "


તો ,,, ભાવેશે જવાબ આપ્યો : 


      " તને ખબર છે ! બેટા , હું  જીવના જોખમે જેની સેવા કરું છું તે પણ  મારા પપ્પા છે ! " 


   અને ઋચા શાંત થઈ ગઈ. સમજી ગઈ. એ પછી તેણે કદી પપ્પાને એ બાબતે ટોક્યા નથી. સતત દાદા અને પપ્પા/ કાકા  માટે ઋચાર્મી ની સાથે સાથે  માતૃછાયા પરિવાર પ્રાર્થનાઓ કરતાં રહ્યાં.


       હોસ્પિટલમાં અગિયાર દિવસ રહ્યાં, તેનાં ઘણાં સ્મરણો છે. અહીં આજે આટલું જ. 


      માતૃછાયા પરિવાર માટે 25/4/2021 ને રવિવાર નો દિવસ દાદા માટે ભારે લાગ્યો. માતૃછાયા પરિવાર નક્કી કરેલાં સમયે રાત્રે બરાબર આઠ વાગે એક સમૂહ ઑનલાઇન પ્રાર્થના નું આયોજન કરેલું. 


       એમાં અમે સૌ અલગ અલગ જગ્યાએથી જોડાયા.


        બોમ્બે , બેન્ગલોર, આણંદ, મોડાસા , મેઘરજ અને પાલનપુર,,,, એક સાથે ઑનલાઇન મહામૃત્યુંજય મંત્રો અને ગાયત્રી મંત્ર સાથે દાદાના  સ્વાસ્થ્ય અને દીર્ઘાયુષ્ય માટે પ્રાર્થના કરી.


     પણ, અંતે નિયતિમાં જે નિર્માણ થયેલું તે બની ને જ રહ્યું.


       બરાબર નવ વાગ્યે મોટાભાઈ યોગેશ નો ફરીથી એક્વાર માતૃછાયા પરિવાર પર સમૂહ વિડિયો કૉલ પર વાત કરી કે, સત્ય હવે આપને સૌએ  સ્વીકારવું જ પડશે. દાદા હવે જેટલાં કલાક રહે તે ખરું ! હવે દાદા બહુ માં બહુ ચાર કલાક ના મહેમાન છે. અને જૈનુએ ત્યાં જ રડવાનું શરુ કરી દીધું. બધાએ તેને સમજાવી.


      ફરી  બરાબર 9:50 માતૃછાયા પરિવાર માં મોટાભાઇનો મેસેજ આવ્યો. 

          …………….


       25/4/2021 ને રવિવારનો દિવસ હતો અને એ જ અમારો કાળો દિવસ ! પપ્પા માતૃછાયા પરિવાર ને છોડીને સ્વધામ સિધાવી ગયા.


        બધાં માટે  'ૐ શાંતિ ' ,  ' RIP ' લખતી હું ….


    આજે એવું મારા પપ્પા માટે  લખતાં મારા હાથ નહીં સમગ્ર શરીર ધ્રુજી ઉઠ્યું. 


        

  • મારા  બંને ભાઈઓ માટે કંઈ જ કહેવા માટે શબ્દો નથી. પણ એટલું જરુર કહીશ કે શ્રવણ ની વાર્તા મેં સાંભળી છે.  પણ,  સાચૂકલાં શ્રવણ મેં જોયાં!!!  વાંંંં